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24 september 2023 : आज की मुरली के ये हैं मुख्य विचार

vickynedrick@gmail.com | Nedrick News

Published: 23 Sep 2023, 12:00 AM | Updated: 23 Sep 2023, 12:00 AM

24 september ki Murli in Hindi – प्रजापति ब्रह्माकुमारी ईश्वरीय विश्वविद्यालय में रोजाना मुरली ध्यान से आध्यात्मिक संदेश दिया जाता है और यह एक आध्यात्मिक सन्देश है. वहीं इस पोस्ट के जरिये हम आपको 24 सितम्बर 2023 (24 september ki Murli) में दिये सन्देश की जानकारी देने जा रहें हैं.

“सर्व प्राप्ति सम्पन्न जीवन की विशेषता है – अप्रसन्नता मुक्त और प्रसन्नता युक्त”

आज प्यार के सागर बापदादा अपने प्रेम स्वरूप आत्माओं को देख रहे हैं। हर एक के दिल में परमात्म प्यार समाया हुआ है। ये परमात्म प्यार प्राप्त भी एक ही जन्म में होता है। 83 जन्म देव आत्मायें वा साधारण आत्माओं द्वारा मिला। सोचो, याद करो, सारे कल्प का चक्कर लगाओ – स्वदर्शन चक्रधारी हो ना! तो एक सेकेण्ड में सारे कल्प का चक्कर लगाया? 83 जन्मों में परमात्म प्यार मिला था? नहीं मिला। सिर्फ इस संगम पर एक जन्म में परमात्म प्यार प्राप्त हुआ। तो अन्तर को जान लिया ना! आत्माओं का प्यार और परमात्म प्यार – कितना अन्तर है! साधारण आत्माओं का प्यार कहाँ ले गया? क्या प्राप्त कराया – अनुभव है ना? और परमात्म प्यार कहाँ ले जाता? अपने स्वीट होम और स्वीट राजधानी में। आत्म प्यार राज्य-भाग्य गँवाता है और परमात्म प्यार राज्य-भाग्य दिलाता है, और इसी जन्म में। ऐसे नहीं कि सिर्फ भविष्य के आधार पर चल रहे हो। नहीं। डायरेक्ट परमात्म प्राप्ति तो अब है। वर्तमान के आगे भविष्य भी कुछ नहीं है। आप लोग गीत गाते हो ना कि स्वर्ग में क्या होगा और क्या नहीं होगा। और अभी का गीत क्या है? जो पाना था वो पा लिया… वा पाना है? पा लिया। पाण्डवों ने पा लिया? गोपियों का तो गायन है ही। इस समय का गायन है कि अप्राप्त नहीं कोई वस्तु ब्राह्मणों के खज़ाने में। देवताओं के खज़ाने में नहीं, ब्राह्मणों के खज़ाने में। तो अभी ब्राह्मण हो ना? तो अनुभव करते हो कि अप्राप्त नहीं कोई वस्तु? और ये प्राप्तियाँ अविनाशी हैं, अल्पकाल की नहीं हैं। तो जिसको सर्व प्राप्तियाँ हैं उसके जीवन में क्या विशेषता होगी? सब प्राप्तियाँ हैं, एक भी कम नहीं है तो उसकी चलन और चेहरे में क्या विशेषता दिखाई देगी? सदा प्रसन्नता। कुछ भी हो जाये लेकिन सर्व प्राप्तिवान अपनी प्रसन्नता छोड़ नहीं सकता। अप्रसन्नता कभी भी होती है तो चेक करो कि अप्राप्ति का अनुभव होता है या सर्व प्राप्तियों का?

आज बापदादा ने बहुत ही, सेवाकेन्द्र और उप-सेवाकेन्द्र देखे, विदेश में नहीं, देश में सेवाकेन्द्र देखे। सेवाकेन्द्र में विशेष तो सेवाधारी हैं, तो आज चक्कर लगाते हुए सेवाधारी और सेवास्थान, दोनों देखे। हर एक स्थान में, चाहे छोटे, चाहे बड़े, सभी में चेक किया कि सेवाधारी तन से, मन से, धन से और सेवा के सम्बन्ध-सम्पर्क से कितने प्रसन्न हैं? क्योंकि विशेष तो यही बातें हैं ना! तो क्या देखा?

तन तो सबके पुराने हैं ही, चाहे जवान हैं, चाहे बड़े हैं, छोटे और ही बड़ों से भी कहाँ-कहाँ कमज़ोर हैं, चाहे बीमारी बड़ी है लेकिन बीमारी की महसूसता कि मैं कमज़ोर हूँ, मैं बीमार हूँ – ये बीमारी को बढ़ा देती है क्योंकि तन का प्रभाव मन पर आ गया तो डबल बीमार हो गये। तन और मन दोनों से डबल बीमार होने के कारण बार-बार सोल कॉन्सेस के बजाय बीमारी कॉन्सेस हो जाते हैं। तो क्या देखा? कि तन से तो मैजारिटी, बीमार कहो या हिसाब-किताब चुक्तु करना कहो, कर रहे हैं, लेकिन 50 परसेन्ट डबल बीमार और 50 परसेन्ट सिंगल बीमार हैं। बाकी होना क्या चाहिए? कभी भी मन में बीमारी का संकल्प नहीं लाना चाहिये – मैं बीमार हूँ, मैं बीमार हूँ… लेकिन होता क्या है? ये पाठ पक्का हो जाता है कि मैं बीमार हूँ… कभी-कभी किसी समय बीमार होते नहीं हैं लेकिन मन में खुशी नहीं है तो बहाना करेंगे कि मेरे कमर में दर्द है क्योंकि मैजारिटी को या तो टांग दर्द, या कमर का दर्द होता है, कई बार दर्द होता नहीं है फिर भी कहेंगे मेरे को कमर में दर्द है। अभी उसकी चेकिंग कैसे हो? डॉक्टर्स के पास इसका कोई थर्मामीटर है, जो कमर दर्द है या नहीं वो चेक कर सके? एक्सरे कराओ, ये कराओ, वो तो और ही खर्चा लगाओ। तो क्या देखा, तन के बारे में सुनाया। कई सेवाधारी ऐसे दिखाई दिये। सेवाधारी आप सभी हो। ऐसे नहीं समझना सिर्फ टीचर्स की बात है। सेवाधारी आप प्रवृत्ति वाले भी हो ना? कि जो सेन्टर्स पर रहते हैं वो सेवाधारी हैं? आप लोग प्रवृत्ति में रहने वाले भी सेवाधारी हो। कभी आपके घरों का भी चक्कर लगायेंगे। देखेंगे कि कैसे सोते हो, कैसे उठते हो? डबल बेड है, सिंगल बेड है? अच्छा ये तो आज के चक्कर की बात है।

आजकल के हिसाब से दवाइयाँ खाना ये बड़ी बात नहीं समझो क्योंकि कलियुग का वर्तमान समय सबसे शक्तिशाली फ्रूट ये दवाइयाँ हैं। देखो कोई रंग-बिरंगी तो हैं ना। कलियुग के लास्ट का यही एक फ्रूट है तो खा लो प्यार से। दवाई खाना ये बीमारी याद नहीं दिलाता। अगर दवाई को मज़बूरी से खाते हो तो मज़बूरी की दवाई बीमारी याद दिलाती है और शरीर को चलाने के लिये एक शक्ति भर रहे हैं, उस स्मृति में खायेंगे तो दवाई बीमारी याद नहीं दिलायेगी, खुशी दिलायेगी तो बस दो-तीन दिन में दवाई से ठीक हो जायेंगे। आजकल के तो बहुत नये फैशन हैं, कलियुग में सबसे ज्यादा इन्वेन्शन आजकल दवाइयाँ या अलग-अलग थेरापी निकाली है, आज फलानी थेरापी है, आज फलानी, तो ये कलियुग के सीजन का शक्तिशाली फल है इसलिए घबराओ नहीं। लेकिन दवाई कॉन्सेस, बीमारी कॉन्सेस होकर नहीं खाओ। तो तन की बीमारी होनी ही है, नई बात नहीं है इसलिए बीमारी से कभी घबराना नहीं। बीमारी आई और उसको फ्रूट थोड़ा खिला दो और विदाई दे दो। अच्छा ये हुआ तन की रिज़ल्ट। फिर और क्या देखा?

मन, मन में क्या देखा? एक बात खुशखबरी की ये देखी कि मैजारिटी हर एक सेवाधारी के मन में बाप का प्यार और सेवा का उमंग दोनों हैं। बाकी 25 परसेन्ट कोई मज़बूरी से चल रहा है, वो छोड़ो। लेकिन मैजारिटी के मन में ये दोनों बातें देखी। और ये भी देखा कि बाप से प्यार होने के कारण याद में भी शक्तिशाली हो बैठने का, चलने का, सेवा करने का अटेन्शन बहुत देते हैं लेकिन खेल क्या होता है कि चाहते हैं कि याद की सीट पर अच्छी तरह से सेट होकर बैठ जायें लेकिन थोड़ा टाइम तो सेट होते हैं फिर हिलना-डुलना शुरू होता है। जैसे बच्चा होता है, उसको ज्यादा टाइम सीट पर बिठाओ तो हिलेगा जरूर। तो मन भी अगर कन्ट्रोल में, ऑर्डर में नहीं है तो थोड़ा टाइम तो बहुत अच्छे बैठते हैं, चलते हैं, सेवा भी करते हैं लेकिन कभी सेट होते हैं, कभी अपसेट भी हो जाते हैं। कारण क्या है? होना सेट चाहते हैं लेकिन अपसेट क्यों होते हैं? कारण क्या है? एकाग्रता की शक्ति, दृढ़ता की शक्ति, उसकी कमी है। प्लैन बहुत अच्छा सोचते हैं, ऐसे बैठेंगे, ये अनुभव करेंगे फिर ये सेवा करेंगे, फिर ऐसे चलेंगे, लेकिन कर्म करने में या बैठे-बैठे भी दृढ़ता की शक्ति कम हो जाती है। और बातों में मन-बुद्धि बंट जाते हैं। चाहे काम में बिज़ी नहीं है लेकिन व्यर्थ संकल्प ये सबसे बड़ा काम है जो अपने तरफ खींच लेता है। तो स्थूल काम नहीं भी हो लेकिन दृढ़ता की शक्ति बंटने के कारण मन और बुद्धि सीट पर सेट होने के बजाए हलचल में आ जाते हैं।

बापदादा ने आप सबको जो काम दिया था वो देखा। बापदादा के पास सब चिटकियाँ पहुँची। लेकिन कई बच्चे बड़े चालाक हैं। चालाकी क्या करते हैं? चिटकी लिखते हैं लेकिन नाम नहीं लिखते। ऐसे समझकर करते हैं बाबा तो जानता है। जानता है, फिर भी अगर काम दिया है तो काम तो पूरा करो ना। टीचर अगर कहे ये लिखकर आओ और टीचर को कहो कि आप तो जानते हो ना – मुझे ये लिखना आता है, तो टीचर मानेगा? तो कई तो नाम ही नहीं लिखते। लेकिन जो भी जिस ग्रुप में काम दिया है, मैजारिटी सबकी ये खुशी की बात देखी, कि सबने लिखा है कि हम डायमण्ड जुबली तक करके दिखायेंगे। ये मैजारिटी का है। आप सबका भी है? जीवनमुक्त हो जायेंगे? अगर सभी बातों से मुक्त हो गये तो क्या हो जायेंगे? जीवनमुक्त हो जायेंगे ना। तो सभी ने अपनी हिम्मत, उमंग अच्छा दिखाया है, चाहे फॉरेन वालों ने, चाहे भारत वालों ने, उमंग-उत्साह सभी का अच्छा है। कोई-कोई ने, बहुत थोड़ों ने लिखा है, कि हमको टाइम लगेगा। लगने दो उन्हों को। आप लोग तो जीवनमुक्त हो जाओ। तो रिज़ल्ट में देखा कि सभी को उमंग है कि डायमण्ड जुबली में कुछ करके दिखायें। लेकिन बापदादा ने देखा कि जितना अपने आपको डायमण्ड बनाने का उमंग-उत्साह है, उतना ही डायमण्ड जुबली वर्ष में सेवाओं के प्लैन भी बहुत फास्ट बनाये हैं। फास्ट बनाये हैं इसमें बापदादा खुश है लेकिन ऐसा नहीं कहना कि बहुत सेवा का बोझ था ना इसीलिए थोड़ा नीचे-ऊपर हो गया। ये बापदादा नहीं चाहते। सेवा जो स्वयं को वा दूसरे को डिस्टर्ब करे वो सेवा नहीं है, स्वार्थ है। और निमित्त कोई न कोई स्वार्थ ही होता है इसलिए नीचे-ऊपर होते हैं। चाहे अपना, चाहे दूसरे का स्वार्थ जब पूरा नहीं होता है तब सेवा में डिस्टर्बेन्स होती है इसलिए स्वार्थ से न्यारे और सर्व के सम्बन्ध में प्यारे बनकर सेवा करो, तब जो संकल्प किया है वा लक्ष्य रखा है कि डायमण्ड जुबली में डायमण्ड बन डायमण्ड जुबली मनायेंगे, वह पूरा हो सकेगा। आधा नहीं याद करना। कई ऐसे जवाब देते हैं, कहते हैं डायमण्ड जुबली तो मनाने की थी तो मनाया, उसमें बिज़ी हो गये। लेकिन बापदादा के दोनों शब्द याद रखना। आधा नहीं। डायमण्ड बन, डायमण्ड जुबली मनानी है। सिर्फ मनानी है नहीं, बनकर मनानी है। तो मतलब का अर्थ नहीं लेना – मना लिया ना। लेकिन बनकर मनाया? बनकर के मनाना ये है डायमण्ड जुबली का लक्ष्य। तो आधा लक्ष्य नहीं पूरा करना। डबल है – बनना और मनाना। सिर्फ बनना नहीं, सिर्फ मनाना नहीं। दोनों साथ-साथ हो। और आप सबको मालूम है कि जब आप डायमण्ड जुबली के वा डायमण्ड बनने के प्लैन बना रहे हो तो आप सबसे पहले माया भी अपना प्लैन बना रही है इसलिए ये नहीं कहना – क्या करें बाबा, हिम्मत कम हो गई, माया बहुत तेज है, माया को अपने पास रखो। राज्य आप करेंगे और माया को बाबा सम्भालेंगे! राज्य तो आपको करना है ना। मायाजीत जगतजीत बनता है, तो माया को जीतने के बिना जगतजीत कैसे बनेंगे? इसीलिये चारों ओर अटेन्शन प्लीज़। समझा? अच्छा।

चक्कर का आधा सुनाया, आधा फिर सुनायेंगे। सेन्टर कोई-कोई तो बहुत अच्छे सजे-सजाये और कोई सिम्पल तो कोई बहुत रॉयल, कोई बीच के भी थे। ज्यादा हैं जो समझते हैं कि रॉयल लगे, कोई वी.आई.पी. आवे तो उसको लगे कि सेन्टर अच्छा है, लेकिन अपना (ब्राह्मणों का) आदि से अब तक का नियम है कि न बिल्कुल सादा हो, न बहुत रॉयल हो। बीच का होना चाहिये। ब्रह्मा ने तो बहुत साधारण देखा और रहा। लेकिन अभी साधन हैं, साधन देने वाले भी हैं फिर भी कोई भी कार्य करो तो बीच का करो। ऐसा भी कोई न कहे कि यह क्या लगा दिया है – पता नहीं, और न कोई कहे कि ये तो अभी राजाई ठाठ हो गया है। तो आज का पाठ क्या है? मुक्त तो सबसे हो गये ना! सबसे मुक्त होने की प्रतिज्ञा हो गई है ना! पक्की है या घर जायेंगे तो कहेंगे कि मुश्किल है! पक्का रहना। माया को डायमण्ड जुबली में मज़ा चखाकर दिखाओ। मास्टर सर्वशक्तिमान् हो, कम तो नहीं हो!

अच्छा, डबल फारेनर्स भी बहुत आये हैं। स्थापना के कार्य की डबल शोभा – डबल विदेशी हैं। बापदादा जानते हैं कि कितने मेहनत से, युक्ति से यहाँ पहुँचते हैं। अगर लगन कम हो तो पहुँचना भी मुश्किल लगे। एक तरफ बाप-दादा सुनते हैं कि मनी डाउन हो गई है और दूसरे साल देखते हैं तो और भी विदेशी ज्यादा आ गये हैं। तो ये हिम्मत है। रशिया का ग्रुप भी आया है ना! रशिया वालों ने टिकेट कहाँ से लाई? इन्हों की कहानियाँ बहुत अच्छी सुनने वाली हैं। टिकेट कैसे इकट्ठी करते हैं, उसकी कहानी बहुत अच्छी है। ये तो सब होना ही है। जब है ही काग़ज़, पेपर ही तो है, चाहे डालर कहो, चाहे पौण्ड कहो, है तो पेपर ही, तो पेपर कहाँ तक चलेगा! सोने का मूल्य है, हीरे का मूल्य है, पेपर का क्या है? मनी डाउन तो होनी ही है। और आपकी मनी सबसे ज्यादा मूल्यवान है। जैसे शुरू में अखबार में डलवाया था ना कि ओम मण्डली रिचेस्ट इन दी वर्ल्ड। कमाई का साधन कुछ नहीं था। ब्रह्मा बाप के साथ एक-दो समर्पण हुए और अखबार में डाला रिचेस्ट इन दी वर्ल्ड। तो अभी भी जब चारों ओर ये स्थूल हलचल होगी फिर आपको अखबार में नहीं डालना पड़ेगा। आपके पास अखबार वाले आयेंगे और खुद ही डालेंगे, टी.वी. में दिखायेंगे कि ब्रह्माकुमारीज़ रिचेस्ट इन दी वर्ल्ड क्योंकि आपके चेहरे चमकते रहेंगे, कुछ भी हो जाये। दिन में खाने की रोटी भी नहीं मिले तो भी आपके चेहरे चमकते रहेंगे। तो चारों ओर होगा दुख और आप खुशी में नाचते रहेंगे। इसी को ही कहते हैं मिरुआ मौत मलू का शिकार इसलिए बापदादा ने आज कहा कि ब्राह्मण जो सच्चे हैं, ब्राह्मण जीवन में श्रेष्ठ जीवन के लक्ष्य वाले हैं उसकी विशेषता है प्रसन्नता। चाहे कोई गाली भी दे रहे हो तो भी आपके चेहरे पर दु:ख की लहर नहीं आनी चाहिये। प्रसन्नचित्त। गाली देने वाला भी थक जायेगा…, हो सकता है? यह नहीं कि उसने एक घण्टा बोला, मैंने सिर्फ एक सेकेण्ड बोला। सेकेण्ड भी बोला या सोचा, शक्ल पर अप्रसन्नता आई तो फेल हो गये। इतना सहन किया ना, एक घण्टा सहन किया, फिर गुब्बारे से गैस निकल गई। तो गैस वाले गुब्बारे नहीं बनना। और चाहिये ही क्या? बाप मिला, सब कुछ मिला – गीत तो यही गाते हो ना। तो ऐसे टाइम पर ऐसी-ऐसी बातें याद करो तो चेहरा नहीं बदलेगा। ऐसे नहीं उसके आगे जोर-जोर से हंसने लग जाओ, तो वो और ही गर्म हो जाये। प्रसन्नता अर्थात् आत्मिक मुस्कराहट। बाहर की नहीं, आत्मिक। तो आज का पाठ क्या रहा? सदा अप्रसन्नता मुक्त और प्रसन्नता युक्त, डबल – समझा? अच्छा।

चारों ओर के बापदादा के प्रेम स्वरूप आत्माओं को, सदा स्वयं को अप्रसन्नता से मुक्त करने वाले तीव्र पुरुषार्थी आत्माओं को, सदा याद और सेवा के बैलेन्स द्वारा सेवा की सफलता पाने वाले भाग्यवान आत्माओं को, सदा बाप को प्रत्यक्ष करने के उमंग-उत्साह में रहने वाले देश-विदेश दोनों के सर्व बच्चों को, बाप को अपनी खुशखबरी लिखने वाले, अपनी सेवा का उमंग रखने वाले ऐसे बाप के सदा स्नेही और समीप बच्चों को बापदादा का याद-प्यार और नमस्ते।

वरदान:-अखण्ड स्मृति द्वारा विघ्नों को विदाई देने वाले मास्टर सर्वशक्तिमान भव
संगमयुग विघ्नों को विदाई देने का युग है, जिसको आधाकल्प के लिए विदाई दे चुके उसको फिर आने न दो। सदा याद रखो हम विजयी रत्न हैं, मास्टर सर्वशक्तिमान हैं – यह स्मृति अखण्ड रहे तो शक्तिशाली आत्मा के सामने माया का विघ्न आ नहीं सकता। विघ्न आया फिर मिटाया तो अखण्ड अटल नहीं कहेंगे, इसलिए सदा शब्द पर अटेन्शन दो। सदा याद में रहने से सदा निर्विघ्न रहेंगे और विजय का नगाड़ा बजता रहेगा।स्लोगन:-ईश्वरीय सेवा में खुद को आफर करना ही बापदादा की आफरीन लेना है।

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