ज्योतिबा फुले को अपना गुरु क्यों मानते थे बाबा साहेब अंबेडकर? जानिए…

vickynedrick@gmail.com | Nedrick News Published: 17 Nov 2021, 12:00 AM | Updated: 17 Nov 2021, 12:00 AM

आधुनिक भारत की अगर बात करें शूद्रों-अतिशूद्रों, महिलाओं और किसानों को लेकर तो उनके मुक्ति-संघर्ष के पहले हीरो जो थे उनका नाम था जोतीराव फुले, जिनको ज्योतिबा फुले के तौर पर भी जाना जाता हैं। उनसे जुड़ी एक बात जिसकी खासा चर्चा होती है वो ये है कि डॉ. अंबेडकर ने महात्मा बुद्ध, कबीर और ज्योतिबा फुले अपना गुरु माना था।

अपनी किताब ‘शूद्र कौन थे?’ को बाबा साहेब ने महात्मा फुले को समर्पित किया, जिसमें उन्होंने लिखा है कि ‘जिन्होंने यानी फुले ने हिन्दू समाज की छोटी जातियों को उच्च वर्णों के प्रति उनकी गुलामी की भावना के संबंध में जाग्रत किया और जिन्होंने सामाजिक लोकतंत्र की स्थापना को विदेशी शासन से मुक्ति पाने से भी अधिक महत्त्वपूर्ण बताया’। बाबा साहेब ने आगे लिखा कि उस आधुनिक भारत के महान शूद्र महात्मा फुले की स्मृति में सादर समर्पित।’ 

जाति भेद विवेकानुसार’ (1865) में फुले ने जो लिखा है उसे जानना चाहिए। उन्होंने ‘लिखा कि ‘धर्मग्रंथों में बताए विकृत जाति-भेद ने सदियों से हिंदुओं के दिमाग को गुलाम बनाया हुआ है। बाबा साहेब अपनी जानी मानी रचना ‘एनिहिलेशन ऑफ कास्ट’ में ठीक इस पर ही आगे लिखा है और जाति व्यवस्था के स्रोत- धर्मग्रंथों को नष्ट कर देने का उन्होंने पुरजोर तरीके से आह्वान किया है।

11 अप्रैल 1827 को महाराष्ट्र में जोतीराव फुले शूद्र वर्ण की माली जाति में पैदा हुए। माली होने के कारण उनके नाम में फुले लगा। 7 साल की उम्र में वो स्कूल तो गए पर समाज का दबाव ऐसा पड़ा की पिता ने उनको स्कूल से बाहर करवा लिया और खेतों में फुले काम करने लगे। फिर कुछ स्थितियां बनी और जोतीराव दोबारा स्कूल जाने लगे। जब वो 13 के हुए तो 1840 में उनकी शादी 9 साल की सावित्रीबाई फुले से कराई गई।

फिर 1847 में जोतीराव स्कॉटिश मिशन के इंग्लिश स्कूल में फुले पढ़ने गए, जहां आधुनिक ज्ञान-विज्ञान से वो काफी प्रभावित हुए। साल 1847 में मिशन स्कूल की जो पढ़ाई थी उसे भी फुले ने पूरी की। तब तक वो जान चुके थे कि शिक्षा ही वो हथियार है, जिसके दम पर शूद्रों-अतिशूद्रों और महिलाओं को मुक्ति दिलाई जा सकती है। सबसे पहले तो उन्होंने अपनी सावित्रीबाई फुले को शिक्षित किया। फिर सावित्रीबाई फुले, सगुणाबाई, फातिमा शेख और कई और साथियों के साथ ज्योतिबा ने तो जैसे लक्षय ही बना लिया हजारों सालों से ब्राह्मणों द्वारा शिक्षा से वंचित किए गए वर्ग को शिक्षित करने और उनके मूल अधिकारों के लिए जागरूक करने का।

इसी लक्ष्य के तहत फुले दंपत्ति ने लड़कियों के लिए पहला स्कूल 1848 में खोला। जो कि महाराष्ट्र ही नहीं बल्कि देशभर में किसी भारतीय के द्वारा लड़कियों खोला गया पहला स्कूल था। ये स्कूल खोलकर जोतीराव फुले और सावित्रीबाई फुले ने सीधे सीधे धर्मग्रंथों तक को चुनौती दे डाली। आखिर में एक वक्त ऐसा आया जब फुले समझ गए कि ब्राह्मणवाद का पूरी तरह नाश बिना अन्याय, असमानता और गुलामी खत्म नहीं होने वाली। ऐसे में 24 सितंबर 1873 को फुले ने ‘सत्यशोधक समाज’ की स्थापना की, जो पौराणिक मान्यताओं का विरोध करता था और शूद्रों-अतिशूद्रों को जातिवादियों के जाल से मुक्ति कराता था। इस तरह से ब्राह्मणवाद के अगेंट्स एक सांस्कृतिक क्रांति शुरू हो गई।

जब 1890 में जोतीराव फुले नहीं रहे तो सत्यशोधक समाज को सावित्रीबाई फुले ने आगे बढ़ाया। किसानों के लिए भी फुले ने काफी संघर्ष किया। ‘किसान का कोड़ा’ (1883) ग्रंथ में फुले ने किसानों की बुरी हालत की बात की। धर्म के नाम पर किसानों को भट्ट-ब्राह्मणों का वर्ग तो वहीं शासन-व्यवस्था के नाम पर अलग अलग पदों पर बैठे अधिकारी वर्ग यहां तक कि सेठ-साहूकार वर्ग  लूटता-खसोटता है, इसको फुले ने दुनिया के सामने रखा। कुल मिलाकर देखें तो समाज की कुरीतियों से मुक्ति की कोई ऐसी लड़ाई नहीं रही जिसमें फुले कूद ना पड़े हो। ऐसे में अगर अंबेडकर ज्योतिबा फुले को अपना गुरू कहें तो इसमें हैरानी की कोई बात लगती नहीं क्योंकि अंबेडकर भी हमेशा वंचितों के लिए आवाज और कदम उठाते रहे।

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