Umar Khalid SC Verdict: दिल्ली दंगा मामले में लंबे समय से जेल में बंद उमर खालिद और शरजील इमाम को फिलहाल कोई राहत नहीं मिली है। सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को दोनों आरोपियों की जमानत याचिकाएं खारिज कर दीं। हालांकि, इसी केस में शामिल पांच अन्य आरोपियों को 12 सख्त शर्तों के साथ जमानत जरूर दे दी गई है। कोर्ट के इस फैसले के बाद एक बार फिर यूएपीए कानून और उसकी सख्त धारा 43D(5) चर्चा में आ गई है, जिसे जमानत के रास्ते की सबसे बड़ी बाधा माना जाता है।
एक साल तक दोबारा जमानत नहीं मांग सकते (Umar Khalid SC Verdict)
सुप्रीम कोर्ट ने साफ तौर पर कहा है कि उमर खालिद और शरजील इमाम अगले एक साल तक इस मामले में नई जमानत याचिका दाखिल नहीं कर सकते। अदालत के मुताबिक, अगर दोनों भविष्य में जमानत चाहते हैं, तो उन्हें नए और ठोस आधार पेश करने होंगे। ये आधार तभी बन सकते हैं, जब ट्रायल के दौरान गवाहों की गवाही या अन्य सबूतों से ऐसे नए तथ्य सामने आएं, जो मौजूदा स्थिति को बदल सकें। फिलहाल अदालत को चार्जशीट में लगाए गए आरोपों के आधार पर दोनों के खिलाफ प्रथम दृष्टया मामला बनता हुआ दिखा।
क्या है UAPA की धारा 43D(5)
यूएपीए यानी गैरकानूनी गतिविधियां रोकथाम अधिनियम की धारा 43D(5) को जमानत के लिहाज से बेहद सख्त माना जाता है। इस धारा के अनुसार, अगर किसी आरोपी के खिलाफ यूएपीए के तहत मामला दर्ज है और चार्जशीट या केस डायरी देखकर कोर्ट को यह लगता है कि आरोप पहली नजर में सही हो सकते हैं, तो जमानत नहीं दी जाएगी। इस स्तर पर कोर्ट को पूरे केस की गहराई में जाने की जरूरत भी नहीं होती। यही वजह है कि इस धारा के तहत जमानत अपवाद बन जाती है, नियम नहीं।
43D(5) सजा तय नहीं करती, लेकिन रास्ता जरूर रोकती है
यह समझना जरूरी है कि धारा 43D(5) खुद कोई सजा तय नहीं करती। इसका काम सिर्फ जमानत पर रोक लगाना है। असली सजा यूएपीए की अन्य धाराओं में तय होती है। जैसे गैरकानूनी गतिविधियों के लिए 7 साल तक की सजा, आतंकी कृत्य या साजिश के लिए उम्रकैद या मौत तक का प्रावधान है। आतंकी संगठन की सदस्यता या सहायता करने पर भी कड़ी सजा का नियम है। इन धाराओं के साथ जब 43D(5) जुड़ जाती है, तो आरोपी के लिए जेल से बाहर आना बेहद मुश्किल हो जाता है।
कोर्ट ‘प्रथम दृष्टया’ कैसे देखती है मामला
इस स्टेज पर कोर्ट यह जांचती है कि जांच एजेंसी द्वारा पेश किए गए दस्तावेज और सबूत सतही तौर पर भरोसेमंद हैं या नहीं। बचाव पक्ष की पूरी दलीलें इस स्तर पर विस्तार से नहीं सुनी जातीं। सुप्रीम कोर्ट पहले भी कई मामलों में कह चुका है कि अगर प्रथम दृष्टया मामला बनता है, तो लंबी हिरासत को भी सही माना जा सकता है। हालांकि, कुछ मामलों में जब सुनवाई बहुत ज्यादा लंबी खिंच जाती है, तब संवैधानिक आधार पर राहत दी गई है।
किन आरोपियों को मिली राहत
इस मामले में जस्टिस अरविंद कुमार और जस्टिस एन वी अंजारिया की बेंच ने फैसला सुनाया। कोर्ट ने गुलफिशा फातिमा, मीरान हैदर, शिफा उर रहमान, मोहम्मद सलीम खान और शादाब अहमद को सशर्त जमानत दे दी। कोर्ट का मानना था कि इन आरोपियों का लगातार जेल में रहना जरूरी नहीं है। इससे पहले 10 दिसंबर को कोर्ट ने सभी पक्षों की दलीलें सुनने के बाद फैसला सुरक्षित रख लिया था।
उमर खालिद को पहले मिली थी अंतरिम जमानत
हालांकि उमर खालिद को नियमित जमानत नहीं मिली, लेकिन दिसंबर में बहन की शादी के लिए कड़कड़डूमा कोर्ट ने उन्हें 16 दिसंबर से 29 दिसंबर तक अंतरिम जमानत दी थी। इस दौरान उन पर कई सख्त शर्तें लगाई गई थीं। उन्हें सोशल मीडिया इस्तेमाल करने, किसी गवाह से संपर्क करने और सार्वजनिक गतिविधियों में शामिल होने की इजाजत नहीं थी। तय समय पूरा होने के बाद उन्हें वापस जेल में सरेंडर करना पड़ा।
कब और क्यों हुई थी गिरफ्तारी
दिल्ली पुलिस ने सितंबर 2020 में उमर खालिद को गिरफ्तार किया था। पुलिस का आरोप है कि फरवरी 2020 में दिल्ली में हुई हिंसा अचानक नहीं थी, बल्कि एक सुनियोजित साजिश का हिस्सा थी। इस मामले में शरजील इमाम और कई अन्य लोगों पर भी साजिशकर्ता होने का आरोप है। दिल्ली दंगों में कई लोगों की जान गई थी और करीब 700 से ज्यादा लोग घायल हुए थे। हिंसा की शुरुआत सीएए और एनआरसी के विरोध के दौरान हुई थी, जब कई इलाकों में हालात बेकाबू हो गए थे।
पुलिस का पक्ष और आगे की राह
पिछली सुनवाई में सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने दिल्ली पुलिस की ओर से दलील दी थी कि 2020 की हिंसा कोई सामान्य सांप्रदायिक झड़प नहीं थी, बल्कि देश की संप्रभुता को चुनौती देने के लिए की गई एक सोची-समझी और योजनाबद्ध साजिश थी। सुप्रीम कोर्ट के ताजा फैसले के बाद साफ है कि उमर खालिद और शरजील इमाम को अभी जेल में ही रहना होगा, जबकि अन्य आरोपियों के लिए ट्रायल के दौरान राहत की एक खिड़की जरूर खुली है।




























