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एक के बदले एक की सीक्रेट डील? कोबरा कमांडो राकेश्वर सिंह को नक्सलियों ने इस वजह से किया रिहा?

vickynedrick@gmail.com | Nedrick News

Published: 09 Apr 2021, 12:00 AM | Updated: 09 Apr 2021, 12:00 AM

नक्सली…ये देश की इस वक्त एक बड़ी समस्या बन गए है। आए दिन ही देश में कहीं ना कहीं से नक्सली हमलों की खबरें सामने आती ही रहती है। लेकिन कुछ दिन पहले छत्तीसगढ़ के बाजीपुर में जो नक्सली पर अटैक हुआ, उसने देश को झकझोर कर रख दिया। इस हमले में देश ने अपने 23 जवानों को खोया।

गुरुवार को राकेश सिंह को किया गया रिहा

इस दौरान नक्सलियों ने एक जवान राकेश्वर सिंह मन्हास को अपने कब्जे में भी ले लिया था, जिनकी 5 दिन बाद गुरुवार को रिहाई हुई। कोबरा कमांडो राकेश्वर सिंह मन्हास की रिहाई को लेकर अब बड़े खुलासे होने लगे है। ऐसी खबरें सामने आई है कि नक्सलियों और सरकार के बीच जान के बदले जान की सीक्रेट डील हुई थीं।

मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक सुरक्षाबलों के कब्जे में भी एक आदिवासी आ गया था। जिसके बाद मध्यस्थों के जरिए उसको पहले नक्सलियों को सौंपा गया और फिर राकेश्वर सिंह की रिहा किया गया।

हुई थी ये डील?

नक्सलियों के साथ बातचीत के लिए गई टीम में शामिल पत्रकार के मुताबिक सुरक्षाबलों के कब्जे में कुंजम सुक्का नाम का एक आदिवासी थी। जिसको छोड़ने की मांग नक्सलियों ने रखी। नक्सलियों की मांग थी कि निष्पक्ष मध्यस्थों के साथ कुंजम सुक्का को भ जा जाए, जिसके बाद वो जवान को छोड़ेंगे।

ऐसे हुई राकेश्वर सिंह की रिहाई

जो पत्रकार वहां गए गए थे उन्होनें बताया कि जहां राकेश्वर सिंह को छोड़ा गया, वहां पर करीब 20 गांव के 2 हजार से ज्यादा लोग इकट्ठा थे। नक्सली ना सिर्फ ग्रामीणों बल्कि पत्रकारों और मध्यस्थों पर भी अपनी पैनी नजर बनाए रखे हुए थे। जब वहां पर मध्यस्थ पहुंचे तब राकेश्वर सिंह को नक्सली सामने नहीं लेकर आए। पहले माहौल को अच्छे से भांपा गया और फिर जब सबकुछ ठीक लगा तो जंगल की तरफ इशारा किया गया। वहां से 35-40 हथियाबंद नक्सली राकेश्वर सिंह को वहां लेकर आए।

नक्सलियों ने पूरे इलाके को घेरा हुआ था। जब वो राकेश्वर सिंह को वहां पर लाए, तो पत्रकारों को कैमरा ऑन करने की इजाजत नहीं दी। हथियारबंद नक्सली ने जवान को घेरा हुआ था, तो कुछ मध्यस्थता टीम के सदस्यों पर निगरानी रख रहे थे। इसकी कमान एक महिला नक्सली के हाथों में थी। जिसने मध्यस्थों को ये भरोसा दिलाया कि रास्ते में उनको कोई नुकसान नहीं होगा। नक्सलियों के द्वारा जब जवान को छोड़ा जाने लगा, तब ही पत्रकारों को वीडियो बनाने की इजाजत मिली।

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