Battle of Delhi 1857: भारत में ब्रिटिश रुल और उनकी दमनकारी नीतियों पर तो काफी चर्चा होती है, सन 1857 की क्रांति भी आपको याद ही होगी, जब ब्रिटिश आर्मी के एक इंडियन फौजी मंगल पांडे को विद्रोह करने के आरोप में फांसी पर लटकाया गया था और आजादी की लड़ाई ने एक क्रांतिकारी रूप ले लिया था। झांसी की रानी लक्ष्मीबाई हो या फिर मुगलों की अंतिम बची के खुची नस्ल, सबने देशों को अंग्रेजों की गुलामी से आजाद करने की ठानी थी, लेकिन जहां हिन्दू हो या मुसलमान, वो अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ लड़ रहे थे, तो वहीं भारत के ही सिख कौम ने उस आजादी की लड़ाई में साथ देने के बजाय अंग्रेजी हुकूमत का साथ दिया।
क्या आपके मन में ये सवाल नहीं आया कि जो सिख हमेशा अन्याय के खिलाफ खड़े रहे, जिन्होनें इस्लामिक ताकतों और मुगलों की ईंट से ईंट बजा दी थी, वो सिख अंग्रेजों के साथ क्यों खड़े हो गए थे। क्या इसके पीछे थी कोई साजिश, या था कोई बड़ा दूसरा कारण। अपने इस वीडियो में हम जानेंगे कि आखिर क्यों सबके खिलाफ जाकर सिखो ने 1857 के क्रांति में अंग्रेजों का साथ दिया था। क्या था वो कारण, और क्या हुआ उसके बाद।
पंजाब पर अंग्रेजो की पकड़
1839 में जब शेर ए पंजाब महाराजा रणजीत सिंह की मृत्यु हुई तब तक पंजाब सबसे सुरक्षित राज्य था। अंग्रेजी हुकूमत की भले ही पंजाब पर गंदी नजर हो, लेकिन महाराजा के डर से उनकी कभी हिम्मत ही नहीं हो पाई कि वो पंजाब पर नजरें डालें लेकिन जब महाराजा की मृत्यु हुई तो सेना में अविश्वास फैल गया। महाराजा के बेटे खड़क सिंह, फिर उनके पोते नौनिहाल सिंह के बीच गद्दी को लेकर संघर्ष शुरू हुआ, इस बीच दरबार में साजिशों का दौर बढ़ा, लेकिन सबसे बुरा था सिख सेना के वरिष्ठ अधिकारियों, जिसमें लाल सिंह भी था, उसने अंग्रेजों के साथ मिलकर अपनी ही सेना के साथ विश्वासघात किया, जिससे सेना से जुड़ी जानकारी अंग्रेजों के साथ लगी। राजनीतिक कमजोरी और आपसी मतभेद का फायदा अंग्रेजों ने उठाया और अंग्रेजों ने दो आंग्ल-सिख युद्ध लड़े।
पहला युद्ध 1845-46 में हुआ जिसमें पंजाब की कमजोरी सामने आ गई और पंजाब हार गया, जिसमें लाहौर संधि हुई और पंजाब को जालंधर, दोआबा क्षेत्र के साथ साथ भारी हर्जाना भी देना पड़ा, जिसे सिख सेना समजोर हो गई, वहीं दूसरी बार 1848-49 में हुए युद्ध पंजाब पूरी तरह से ब्रिटिश हुकूमत का हिस्सा बन गया। हैरानी की बात थी ब्रिटिश हुकूमत ने सिख सैनिकों की बहादुरी और उनकी ताकत को अच्छी तरह से समझा था इसलिए उन्हें दुत्कारने के बजाय उन लोगों ने सिख सैनिकों को अपनी ही सेना का हिस्सा बना कर उन्हें सम्मान देने का दिखावा किया। ताकि सिख हमेशा अंग्रेजों के ऋनी रहे।
क्या हुआ था 1857 क्रांति में
1857 की क्रांति को असल में पहली ऐसी क्रांति के रूप में याद किया जाता है जब भारतीयों ने पहली बार एकजुट होकर ब्रिटिश रूल के खिलाफ मोर्चा खोला था। ये क्रांति शुरु हुई थी यूपी के मेरठ से, जहां भारतीय हिंदू सैनिकों ने चर्बी से बने कारतूस को दांतों से खोलने से इंकार कर दिया था.. जिसमें सबसे पहले मंगल पांडे ने विद्रोह किया था.. विद्रोह के कारण अंग्रेजो ने मंगल पांडे को फांसी पर लटका दिया.. जिसके कारण भारतीय सैनिकों में अविश्वास जगा औऱ उन्होंने विद्रोह कर दिया।
विद्रोह की ये आग धीरे धीरे भारत के अलग अलग कोने में पहुंची.. और इस विद्रोह को आगे बढ़ाने में मुगल शासक बहादुर शाह जफर ने दिल्ली से, रानी लक्ष्मीबाई झांसी से, नाना साहब और तात्या टोपे कानपुर से, बेगम हजरत महल लखनऊ से, और कुंवर सिंह ने बिहार से.. इस विद्रोह का नेतृत्व किया था.. जिसके कारण उत्तर और मध्य भारत में अंग्रेजी हुकुमत की नींव हिल गई थी..लेकिन अंग्रेजी हुकुमत की सेना कमजोर नहीं थी.. खास कर सिख सैनिकों के होने के कारण ये और ज्यादा मजबूत हो चुके थे..नतीजा ये विद्रोह दबा दिया गया।
1857 में सिख सैनिकों की भूमिका
अब सवाल ये उठता है कि पंजाब पर अंग्रेजो ने हुकुनत शुरु कर दी थी, महाराज दीलिप सिंह को ब्रिटेन भेज दिया था, बावजूद इसके सिख विद्रोह में अंग्रेजो के साथ खड़े क्यों हुए.. तो इसका जवाब है सिखों की नीति। दरअसल सिख लड़ाके लंबे समय तक इस्लामिक ताकतो और मुगलो का सामना करते आये थे, मुगलो के कारण कई सिख गुरुओं को ही नहीं बल्कि कई सिख लड़ाको को शहीद होना पड़ा था..जिनकी आग सिखों के दिल में धधक रही थी। सिख जानते थे कि अगर मुगलो को खत्म करना है तो अंग्रेजो का साथ देना होगा।
वहीं अंग्रेज असल में भले ही भारत को गुलाम बना रहे थे लेकिन अंग्रेजो ने भारत में रोजगार, व्यापार और उसके विकास के विस्तार पर काफी काम किया था, जिसे कोई नकार नहीं सकता था। सिखों को अंग्रेजी सेना में एक मजबूती मिली थी.. वो इस्लामिक दमनकारी नीतियो के खिलाफ मजबूती से खड़े हो सकें थे। सिखों की मुगलो, मराठों और बंगाल की सेना से काफी नाराजगी थी, और अंग्रेजी हुकुमत के साथ होना उन्हें ज्यादा सेफ लगा था।
आंग्ल सिख युद्ध के बाद भी अंग्रेजो ने उनका समर्थन किया और उन्हें सेवा का अवसर दिया.. कई तरफ से घिरे सिख सैनिकों ने उस रास्ते को चुना था.. जिसपर इस्लामिक हुकुमत की हार थी.. और विकास की राह मजबूत थे.. यानि कि हम ये कह सकते है कि सिखों का ब्रिटिश हुकुमत को चुनना कोई उनके निजी फायदे के लिए नहीं था बल्कि समय की वहीं मांग थी जो बड़े बदलाव की ओर इशारा कर रही थी।






























