Maha Kumbh Udasin Akharas History: जानें महाकुंभ  में उदासीन अखाड़ों का अनूठा इतिहास, गुरु नानक देव जी से जुड़ी है इसकी जड़े

vickynedrick@gmail.com | Nedrick News Published: 24 Jan 2025, 12:00 AM | Updated: 24 Jan 2025, 12:00 AM

Maha Kumbh Udasin Akharas History: प्रयागराज में आयोजित हो रहे महाकुंभ 2025 में इस बार शैव, वैष्णव और उदासीन परंपरा के साधुओं का अद्भुत समागम देखने को मिल रहा है। जहां शैव और वैष्णव परंपरा हिंदू धर्म के दो मुख्य धाराएं मानी जाती हैं, वहीं उदासीन परंपरा का अपना विशेष स्थान है। यह परंपरा हिंदुओं और सिखों के बीच सेतु का काम करती है और इसकी जड़ें गुरु नानक और उनके पुत्र श्रीचंद से जुड़ी हुई हैं।

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उदासीन परंपरा: इतिहास और महत्व- Maha Kumbh Udasin Akharas History

उदासीन परंपरा का उदय सिख धर्म के संस्थापक गुरु नानक के पुत्र श्रीचंद द्वारा हुआ। श्रीचंद ने जीवन में सांसारिक मोह-माया से अलग रहते हुए अध्यात्म और निस्वार्थ सेवा का मार्ग अपनाया। इस परंपरा के साधु गुरु नानक की शिक्षाओं से प्रेरणा लेते हैं और उनके संदेशों को अपने जीवन का हिस्सा बनाते हैं।

देशभर में उदासीन परंपरा के आश्रमों और कुटियों में गुरु ग्रंथ साहिब के स्वरूप पाए जाते हैं। इन साधुओं का जीवन सिख और हिंदू परंपराओं का अद्भुत मिश्रण है। उनकी साधना में ध्यान, सेवा, और ईश्वर के प्रति समर्पण प्रमुख रूप से शामिल होते हैं।

महाकुंभ में उदासीन साधुओं की उपस्थिति

महाकुंभ में विभिन्न अखाड़ों के साधुओं के साथ उदासीन अखाड़ों के साधु भी शामिल हुए हैं। ये साधु गेरुए वस्त्र पहनते हैं और भौतिक संपत्ति से विरक्ति का जीवन जीते हैं। कुंभ मेले में इन साधुओं का आना उनके भक्ति और आध्यात्मिक साधना में संलग्नता को प्रदर्शित करता है।

उदासीन साधु अपने प्रवचनों और ध्यान के माध्यम से श्रद्धालुओं को प्रेरणा देते हैं। उनकी उपस्थिति कुंभ मेले को और अधिक आध्यात्मिक बनाती है।

उदासीन अखाड़ों की संरचना

भारत में कुल 13 मान्यता प्राप्त अखाड़े हैं, जिनमें से तीन अखाड़े उदासीन परंपरा से संबंधित हैं।

  • बड़ा उदासीन अखाड़ा:
    प्रयागराज के कीडगंज में स्थित यह अखाड़ा चार प्रमुख पंगतों में विभाजित है।
  1. अलमस्तजी की परंपरा
  2. गोविंद साहबजी की परंपरा
  3. बालूहसनाजी की परंपरा
  4. भगत भगवानजी की परंपरा
  • नया उदासीन अखाड़ा:
    सन् 1902 में उदासी साधुओं में मतभेद के कारण महात्मा सूरदासजी की प्रेरणा से एक अलग संगठन बनाया गया, जिसका नाम उदासी पंचायती नया अखाड़ा रखा गया। इस अखाड़े में केवल संगत साहब की परंपरा के साधु ही शामिल होते हैं।
  • निर्मल अखाड़ा:
    सिख गुरु गोविंद सिंह के सहयोगी वीरसिंह द्वारा स्थापित यह अखाड़ा सफेद वस्त्र पहनने और पीले अथवा बसंती ध्वज का पालन करने के लिए जाना जाता है। इसके अलावा, साधु हाथ में ऊनी या रुद्राक्ष की माला धारण करटे हैं।

उदासीन साधुओं की साधना और दर्शन

उदासीन साधु अपनी साधना में विरक्ति और ध्यान को केंद्र में रखते हैं। वे सांसारिक मोह-माया से दूर रहते हुए एक तपस्वी जीवन जीते हैं। गेरुए वस्त्र और एक साधारण कपड़े का थैला उनके त्याग का प्रतीक है।

उनकी साधना में मौन और मौखिक प्रार्थना का विशेष स्थान होता है। वे ध्यान के माध्यम से आंतरिक शांति और ईश्वर से जुड़ने का प्रयास करते हैं। सेवा (निस्वार्थ सेवा) को भी ये साधु भक्ति का एक रूप मानते हैं और जरूरतमंदों की सहायता के लिए तत्पर रहते हैं।

सिख और हिंदू परंपरा का संगम

उदासीन परंपरा को सिख और हिंदू परंपरा के बीच एक पुल माना जाता है। ये साधु गुरु ग्रंथ साहिब के छंदों का अध्ययन और पाठ करते हैं। उनकी जीवनशैली गुरु नानक और सिख गुरुओं की शिक्षाओं से प्रेरित है।

महाकुंभ 2025 में शैव, वैष्णव और उदासीन परंपराओं का यह संगम भारतीय संस्कृति की विविधता और समृद्धि का प्रतीक है। यह मेले को एक ऐसा मंच बनाता है जहां सभी परंपराएं एक साथ आकर मानवता, आध्यात्मिकता और शांति का संदेश देती हैं।

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