जानिए IPC की धारा 7 क्या कहती है, हर वाक्यांश के स्पष्टीकरण को लेकर कही गई है ये बात

vickynedrick@gmail.com | Nedrick News

Published: 23 Apr 2024, 12:00 AM | Updated: 23 Apr 2024, 12:00 AM

पिछली बार भारतीय दंड संहिता (आईपीसी) श्रृंखला में हमने आपको आईपीसी की धारा 40 के बारे में बताया था। जिसमें अपराध शब्द का जिक्र किया गया था। आज हम आपको आईपीसी की धारा 7 के बारे में बताएंगे। दरअसल, इस धारा में कहा गया है कि अगर किसी शब्द को एक बार एक्सप्लेन कर दिया जाए तो आईपीसी की हर धारा और कानून में उसका वही मतलब होगा, इसे बार-बार बदला नहीं जा सकता। आइए आपको आईपीसी की धारा 7 के बारे में विस्तार से बताते हैं।

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क्या है भारतीय दंड संहिता की धारा 7

पहले आईपीसी कि धारा 7 का विवरण जान लेते हैं। भारतीय दंड संहिता की धारा 7 के अनुसार हर वाक्यांश, जिसका स्पष्टीकरण इस संहिता के किसी भाग में किया गया है, तो ये पूरी दंड संहिता में इस संहिता के हर भाग में उस स्पष्टीकरण के अनुरूप ही प्रयोग किया गया है।

आजतक की एक रिपोर्ट में सुप्रीम कोर्ट के मशहूर वकील असगर खान आईपीसी की धारा 7 की व्याख्या करते हुए कहते हैं कि आम भाषा में आईपीसी की धारा 7 कहती है कि कानून सबके लिए बराबर है। यदि कानून के किसी भी कार्य में कोई शब्द बार-बार दोहराया जाता है, तो हम उसकी व्याख्या के रूप में उसके अर्थ को अपने दिमाग में रखेंगे और उसके अर्थ का उपयोग करेंगे।

उदाहरण के लिए, यदि भारतीय दंड संहिता में किसी आपराधिक शब्द को परिभाषित किया गया है और उसका अर्थ दिया गया है, तो उस शब्द का अर्थ हर स्थिति में वही रहेगा। किसी भी व्यक्ति के लिए उस शब्द का अर्थ नहीं बदला जाएगा और भारतीय दंड संहिता की अन्य धाराओं में भी उस शब्द का अर्थ वही रहेगा।

क्या है भारतीय दंड संहिता

भारतीय दंड संहिता भारत के किसी भी नागरिक द्वारा किए गए विशिष्ट अपराधों को निर्दिष्ट और दंडित करती है। आपको बता दें कि यह बात भारतीय सेना पर लागू नहीं होती है। पहले जम्मू-कश्मीर में भारतीय दंड संहिता लागू नहीं होती थी। हालांकि, धारा 370 ख़त्म होने के बाद आईपीसी वहाँ भी लागू हो गया। पहले वहां रणबीर दंड संहिता (आरपीसी) लागू होती थी।

अंग्रेजों द्वारा लागू की गई थी भारतीय दंड संहिता

भारतीय दंड संहिता ब्रिटिश काल में लागू की गई थी। आईपीसी की स्थापना 1860 में ब्रिटिश भारत के पहले विधि आयोग के प्रस्ताव पर की गई थी। इसके बाद 1 जनवरी, 1862 को इसे भारतीय दंड संहिता के रूप में अपनाया गया। वर्तमान दंड संहिता, जिसे भारतीय दंड संहिता 1860 के नाम से जाना जाता है, से हम सभी परिचित हैं। इसका खाका लॉर्ड मैकाले ने तैयार किया था। समय के साथ इसमें कई बदलाव हुए हैं।

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