जानिए क्या कहती है IPC की धारा 44, क्षति शब्द को लेकर कही गई है ये बात

vickynedrick@gmail.com | Nedrick News

Published: 17 May 2024, 12:00 AM | Updated: 17 May 2024, 12:00 AM

भारतीय दंड संहिता (IPC) हमारे देश का एक बहुत ही मजबूत हिस्सा है। इस वजह से देश में कानून को महत्व दिया जाता है और लोग देश के कानून का सम्मान भी करते हैं। देश में होने वाले अपराधों की व्याख्या और सजा का प्रावधान सब कुछ भारतीय दंड संहिता में वर्णित है। ऐसे में आज हम आपको IPC की धारा 44के बारे में बताएंगे जिसमें क्षति शब्द का वर्णन किया गया है।

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IPC की धारा 44 का विवरण

IPC की धारा 44 के मुताबिक “क्षति” शब्द किसी प्रकार की चोट का द्योतक है, जो किसी व्यक्ति के शरीर, मन, ख्याति या सम्पत्ति को गैर-क़ानूनी रूप से पहुंचाई गई हो।

सरल शब्दों में, यह धारा “क्षति” शब्द को इस प्रकार परिभाषित करती है, जब भी कोई व्यक्ति किसी व्यक्ति को वैध तरीके से शारीरिक, मानसिक या सम्मान संबंधी नुकसान पहुंचाने की कोशिश करता है, तो इसे आईपीसी की धारा 44 के तहत “क्षति” के रूप में परिभाषित किया जाता है।

उदाहरण के लिए मान लीजिए कोई व्यक्ति अपने घर में चार मंजिला मकान बनाता है, हालांकि सरकार ने दो मंजिला मकान बनाने की ही अनुमति दी है। ऐसे में जब नगर निगम के लोग उस व्यक्ति का चार मंजिला मकान गिराने आते हैं तो जब उस व्यक्ति को आर्थिक और मानसिक क्षति होती है तो उसे कानूनी तौर पर नुकसान नहीं माना जाएगा क्योंकि उसने मकान अवैध तरीके से बनाया था। इसी तरह अगर वह व्यक्ति नियमानुसार मकान बनाता है तो अगर कोई उसका मकान गिराने की कोशिश करता है और इस प्रक्रिया में जब उस व्यक्ति को नुकसान पहुंचता है तो उसे भारतीय दंड संहिता की धारा 44 के तहत नुकसान माना जाता है।

क्या है भारतीय दंड संहिता

भारतीय दंड संहिता भारत के किसी भी नागरिक द्वारा किए गए विशिष्ट अपराधों को निर्दिष्ट और दंडित करती है। आपको बता दें कि यह बात भारतीय सेना पर लागू नहीं होती है। पहले जम्मू-कश्मीर में भारतीय दंड संहिता लागू नहीं होती थी। हालांकि, धारा 370 ख़त्म होने के बाद आईपीसी वहाँ भी लागू हो गया। पहले वहां रणबीर दंड संहिता (आरपीसी) लागू होती थी।

अंग्रेजों द्वारा लागू की गई थी भारतीय दंड संहिता

भारतीय दंड संहिता ब्रिटिश काल में लागू की गई थी। आईपीसी की स्थापना 1860 में ब्रिटिश भारत के पहले विधि आयोग के प्रस्ताव पर की गई थी। इसके बाद 1 जनवरी, 1862 को इसे भारतीय दंड संहिता के रूप में अपनाया गया। वर्तमान दंड संहिता, जिसे भारतीय दंड संहिता 1860 के नाम से जाना जाता है, से हम सभी परिचित हैं। इसका खाका लॉर्ड मैकाले ने तैयार किया था। समय के साथ इसमें कई बदलाव हुए हैं।

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