जानिए IPC की धारा 15 के बारे में जिसे 1937 में खत्म कर दिया गया था

vickynedrick@gmail.com | Nedrick News

Published: 26 May 2024, 12:00 AM | Updated: 26 May 2024, 12:00 AM

भारतीय दंड संहिता (IPC) हमारे देश का एक बहुत ही मजबूत हिस्सा है। इस वजह से देश में कानून को महत्व दिया जाता है और लोग देश के कानून का सम्मान भी करते हैं। देश में होने वाले अपराधों की व्याख्या और सजा का प्रावधान सब कुछ भारतीय दंड संहिता में वर्णित है। फिर भी IPC में कई धाराएं ऐसी हैं जिनके बारे में आम जनता को जानकारी नहीं है। इसलिए हम आपके लिए हर रोज एक नई धारा का विवरण लेकर आते हैं ताकि आप अपने कानून के बारे में और अधिक जागरूक हो सकें। ऐसे में आज हम आपके लिए आईपीसी की धारा 15 लेकर आए हैं जिसमें जनता शब्द को लेकर बात की गई है।

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IPC का धारा 15 का विवरण

भारतीय दंड संहिता की धारा 15 अब किसी काम की नहीं है। क्योंकि आईपीसी की धारा 15 को ‘कानून अनुकूलन आदेश, 1937’ के माध्यम से निरस्त कर दिया गया था। इसलिए आईपीसी की इस धारा का एक संख्या के अलावा आईपीसी में कोई महत्व नहीं है।

दरअसल, ब्रिटिश भारत की परिभाषा भारतीय दंड संहिता की धारा 15 में मिलती है। आईपीसी की धारा 15 में ब्रिटिश शासन के तहत भारत को परिभाषित किया गया है। लेकिन 1937 में आईपीसी की समीक्षा के दौरान ‘कानून अनुकूलन आदेश, 1937’ के तहत धारा 15 को निरस्त कर दिया गया। इसके बाद आईपीसी की यह धारा अर्थहीन हो गई।

क्या होती है भारतीय दंड संहिता?

भारतीय दंड संहिता भारत के किसी भी नागरिक द्वारा किए गए विशिष्ट अपराधों को निर्दिष्ट और दंडित करती है। लेकिन IPC की कोई भी धारा भारतीय सेना पर लागू नहीं होती है। पहले जम्मू-कश्मीर में भारतीय दंड संहिता लागू नहीं होती थी। हालांकि, धारा 370 ख़त्म होने के बाद आईपीसी वहाँ भी लागू हो गया। पहले वहां रणबीर दंड संहिता (आरपीसी) लागू होती थी।

अगर पुलिस अधिकारी FIR लिखने से करें मना

वहीं अगर कोई पुलिस अधिकारी कभी भी आपकी कोई FIR लिखने से इनकार करता है तो यह सीधे तौर पर गैरकानूनी होगा। अगर FIR दर्ज नहीं हुई तो आप एसपी से शिकायत कर सकते हैं। अगर आपकी शिकायत को नजरअंदाज किया जाता है तो आप कोर्ट में किसी भी मजिस्ट्रेट से शिकायत कर सकते हैं। क्योंकि यदि कोई लोक सेवक कानूनी गलती करता है तो वह न्यायालय द्वारा क्षमा योग्य नहीं है।

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