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Karnataka High Court: शादी के झूठे वादे को लेकर कर्नाटक हाईकोर्ट ने कहा – कानून ‘दिल टूटने’ को अपराध नहीं मानता

Shikha Mishra | Nedrick News Karnataka Published: 11 Mar 2026, 08:38 AM | Updated: 11 Mar 2026, 08:38 AM

Karnataka High Court: भारत में अक्सर कहा जाता है कि कानून बाद में बनता है और उसके ‘लूपहोल्स’ पहले तलाश लिए जाते हैं। विशेषकर महिलाओं की सुरक्षा के लिए बने कानूनों का उद्देश्य जहां पीड़ितों को न्याय दिलाना है, वहीं हाल के वर्षों में इनके दुरुपयोग के बढ़ते मामले चिंता का विषय बने हैं। इसी गंभीर बहस के बीच कर्नाटक हाईकोर्ट का एक हालिया फैसला सुर्खियों में है।

जस्टिस एम. नागप्रसन्ना की पीठ ने एक मामले को रद्द करते हुए स्पष्ट किया कि यदि दो वयस्क आपसी सहमति से लंबे समय तक रिश्ते में रहते हैं और बाद में पुरुष शादी से मुकर जाता है, तो इसे ‘दुष्कर्म’ की श्रेणी में नहीं रखा जा सकता। कोर्ट की यह टिप्पणी कानूनी गलियारों में चर्चा का विषय है कि ‘कानून दिल टूटने (Heartbreak) को अपराध नहीं मानता’ और अदालतों को निजी बदला लेने का हथियार (weapon of personal vendetta) नहीं बनाया जाना चाहिए।

जानें क्या है पूरा मामला

मीडिया द्वारा मिली जानकारी के अनुसार बताया जा रहा है कि आयरलैंड में मिले एक पुरुष और महिला के बीच करीब दो साल तक चले लिव-इन रिलेशनशिप के बाद, महिला द्वारा दुष्कर्म का आरोप लगाने से यह मामला शुरू हुआ। बता दें कि महिला पहले से शादीशुदा थी और अपनी शादीशुदा जिंदगी में दिक्कतों का सामना कर रही थी। उसका एक सात साल का बच्चा भी है। आरोप के मुताबिक बाद में जब आरोपी भारत आया तो उसने महिला से बातचीत बंद कर दी और शादी करने से इनकार कर दिया। इसके बाद महिला ने भारत में उसके खिलाफ दुष्कर्म का मामला दर्ज कराया।

मामले को लेकर कोर्ट ने क्या कहा

सुनवाई के दौरान जस्टिस एम. नागप्रसन्ना की पीठ ने शिकायत की गहन जांच की। कोर्ट ने पाया कि दोनों वयस्क थे और उनके बीच करीब दो साल तक आपसी सहमति से संबंध रहे थे। शिकायत में जबरदस्ती या हिंसा का कोई प्रमाण नहीं मिला। अदालत ने स्पष्ट किया कि कानून ‘दिल टूटने’ (Heartbreak) को अपराध नहीं मानता। कोर्ट के अनुसार, अगर रिश्ता धोखे की नीयत से शुरू नहीं हुआ था, तो बाद में शादी से इनकार करना बलात्कार नहीं कहलाएगा। अदालत ने चेतावनी दी कि आपराधिक न्याय प्रणाली को निजी विवाद सुलझाने का हथियार नहीं बनाया जाना चाहिए।

“दिल टूटना कोई कानूनी अपराध नहीं”

कोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि यह मामला हिंसा या जबरदस्ती का नहीं बल्कि रिश्ते में भरोसा टूटने का मामला है। अदालत ने साफ शब्दों में कहा कि कानून दिल टूटने को अपराध नहीं मानता। अगर किसी रिश्ते में बाद में मन बदल जाए या रिश्ता खत्म हो जाए, तो हर ऐसे मामले को आपराधिक केस नहीं बनाया जा सकता।

शादी के झूठे वादे पर कोर्ट की राय

अदालत ने स्पष्ट किया कि ‘शादी का झूठा वादा’ और ‘शादी के वादे का उल्लंघन’ (Breach of promise) दो अलग बातें हैं। अगर मंशा शुरू से ही छल (Cheating) की हो, तभी यह अपराध है। लेकिन अगर आपसी सहमति से लंबे समय तक संबंध रहे और बाद में पारिवारिक विरोध या व्यक्तिगत मतभेदों के कारण शादी नहीं हो पाई, तो इसे दुष्कर्म नहीं कहा जा सकता। साक्ष्यों के अभाव में कोर्ट ने इस मामले को रद्द करते हुए व्यवस्था दी कि आपराधिक कानून का उपयोग निजी प्रतिशोध के लिए नहीं होना चाहिए।

Shikha Mishra

shikha@nedricknews.com

शिखा मिश्रा, जिन्होंने अपने करियर की शुरुआत फोटोग्राफी से की थी, अभी नेड्रिक न्यूज़ में कंटेंट राइटर और रिसर्चर हैं, जहाँ वह ब्रेकिंग न्यूज़ और वेब स्टोरीज़ कवर करती हैं। राजनीति, क्राइम और एंटरटेनमेंट की अच्छी समझ रखने वाली शिखा ने दिल्ली यूनिवर्सिटी से जर्नलिज़्म और पब्लिक रिलेशन्स की पढ़ाई की है, लेकिन डिजिटल मीडिया के प्रति अपने जुनून के कारण वह पिछले तीन सालों से पत्रकारिता में एक्टिव रूप से जुड़ी हुई हैं।

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