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Guru Nanak Dev Udasi yatra: गुरु नानक देव जी की ऐतिहासिक उदासी, दुनिया भर में फैला मानवता और समानता का अद्वितीय संदेश!

vickynedrick@gmail.com | Nedrick News

Published: 24 Mar 2025, 12:00 AM | Updated: 24 Mar 2025, 12:00 AM

Guru Nanak Dev Udasi yatra: सिख धर्म के संस्थापक गुरु नानक देव जी ने अपनी जीवन यात्रा के दौरान दुनिया भर में कई जगहों का दौरा किया और लोगों को अपनी शिक्षाओं से अवगत कराया। गुरु नानक की इन यात्राओं को ‘उदासी’ कहा जाता है, जो न केवल धार्मिक यात्राएं थीं बल्कि मानवता और समानता का संदेश फैलाने का भी प्रयास थीं। 1500 से 1524 के बीच हुई उनकी जीवन यात्रा न केवल आध्यात्मिक थी बल्कि सामाजिक और सांस्कृतिक बदलाव की दिशा में एक कदम था।

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गुरु नानक जी की 28,000 किलोमीटर की यात्रा- Guru Nanak Dev Udasi yatra

गुरु नानक जी ने 1500 से 1524 के बीच अपनी पांच प्रमुख यात्राओं के दौरान 28,000 किलोमीटर से अधिक का सफर तय किया। यह यात्रा उनके शिक्षाओं को फैलाने और जातिगत भेदभाव, धर्म और समाज की दीवारों को तोड़ने का एक अभूतपूर्व प्रयास था। इनमें से सबसे लंबी यात्रा, जो सुलतानपुर से लेकर मक्का तक थी, आज भी लोगों के दिलों में अमिट छाप छोड़ती है।

Guru Nanak Dev Udasi yatra
Source: Google

पहली उदासी (1500-1506)

गुरु नानक की पहली यात्रा लगभग 7 साल तक चली, जिसमें उन्होंने उत्तर, पूर्व, पश्चिम की यात्रा की। सुल्तानपुर, पानीपत, दिल्ली, बनारस (वाराणसी), और सियालकोट (पाकिस्तान) जैसे महत्वपूर्ण स्थानों का भ्रमण किया। उन्होंने अपने साथ भाई मर्दाना को भी इस यात्रा में साथी बनाया था, जो उनका सच्चा मित्र और सहायक था। इस यात्रा के दौरान, उन्होंने धर्म के नाम पर होने वाले भेदभाव और दमन का विरोध किया।

दूसरी उदासी (1506-1513)

गुरु नानक की दूसरी यात्रा भी लगभग 7 साल चली। इस यात्रा के दौरान उन्होंने धनसारी घाटी और सांगलादीप (सीलोन) जैसे इलाकों का दौरा किया। उन्होंने इन स्थानों पर भी समानता और मानवता के सिद्धांतों को फैलाया, जहाँ धर्म और जातिवाद की दीवारें अभी भी मौजूद थीं। गुरु नानक ने यहाँ हर जगह अपनी शिक्षाओं का प्रसार किया और धार्मिक ध्रुवीकरण को चुनौती दी।

तीसरी उदासी (1514-1518)

गुरु नानक जी की तीसरी यात्रा में उन्होंने कश्मीर, नेपाल, ताशकंद, सिक्किम और तिब्बत का दौरा किया। यह यात्रा विशेष रूप से उल्लेखनीय थी, क्योंकि इस दौरान उन्होंने मानवता और समानता के सिद्धांतों को अधिक फैलाया। कुछ प्रमाण यह भी बताते हैं कि गुरु नानक ने चीन तक का भी सफर किया, हालांकि इसके प्रमाण अभी भी शोध के अधीन हैं।

Guru Nanak Dev Udasi yatra
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चौथी उदासी (1519-1521)

गुरु नानक की चौथी यात्रा के दौरान वे इराक, मक्का, तुर्की और अरब देशों में गए। इस यात्रा के दौरान एक महत्वपूर्ण घटना घटी, जब गुरु नानक ने मदीना में प्रार्थना के दौरान मुहम्मद अल रसूल अल्लाह का नाम हटाकर सतनाम का प्रयोग किया। इसके कारण उन्हें पत्थरों से मारा गया, लेकिन एक चमत्कारी घटना में वह बिना किसी चोट के बाहर आ गए। इस घटना के बाद, इराक के पीर बहलोल शाह ने गुरु नानक को सम्मानित किया और उन्हें आध्यात्मिक चर्चा के लिए आमंत्रित किया।

पीर बहलोल शाह से मुलाकात

गुरु नानक की मदीना और बगदाद यात्रा के दौरान एक महत्वपूर्ण घटना हुई, जब उन्होंने इराक के पीर बहलोल शाह से मुलाकात की। पीर बहलोल शाह, जो एक ईरानी थे, ने गुरु नानक के तीन सवालों का सही उत्तर प्राप्त किया और इस दौरान उनके साथ गहरे आध्यात्मिक संवाद किए। इस संवाद के बाद, पीर बहलोल शाह ने गुरु नानक को पवित्र संत मानते हुए उनका सम्मान किया और उन्हें इराक में एक मठ बनाने की अनुमति दी।

गुरु नानक जी के संदेश

गुरु नानक की यात्राओं का मुख्य उद्देश्य था मानवता, समानता और धर्मनिरपेक्षता का प्रचार करना। उन्होंने अपने जीवन में जातिवाद, छुआछूत और धार्मिक भेदभाव के खिलाफ आवाज उठाई। उनकी यात्राओं में एक महत्वपूर्ण संदेश था कि सभी लोग समान हैं, और हर इंसान को एक ही भगवान की उपासना का अधिकार है।

तुर्की में गुरु नानक के स्मारक

गुरु नानक जी की यात्रा के कई शिलालेख आज भी तुर्की में मौजूद हैं, जहां उनकी यात्रा के बाद एक स्मारक बनाया गया था। इस स्मारक पर लिखी गई पंक्तियाँ गुरु नानक के योगदान को सम्मानित करती हैं। स्मारक पर लिखा गया है “जमाने दा मालिक, हिन्द दा बंदा, रब दा नानक” जो उनके जीवन के उद्देश्य को स्पष्ट रूप से व्यक्त करता है।

गुरु नानक जी की उदासी सिर्फ एक यात्रा नहीं थी, बल्कि यह मानवता, समानता और शांति का संदेश फैलाने का एक अविस्मरणीय प्रयास था। उन्होंने अपनी यात्राओं के माध्यम से समाज के भीतर व्याप्त भेदभाव और नफरत को समाप्त करने का काम किया। आज भी उनकी शिक्षाएं और उनके द्वारा दिखाया गया मार्ग हमें सिखाता है कि धर्म, जाति और भेदभाव से परे सभी मनुष्यों को एक समान सम्मान मिलना चाहिए। गुरु नानक की ये दिव्य यात्राएं सदियों बाद भी हमें समानता और मानवता का सशक्त संदेश देती हैं।

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