क्या सरकारी आंकड़ों से 7 गुना ज्यादा देश में हुई है कोरोना से मौत? जानिए इन दावों पर क्या बोली सरकार?

vickynedrick@gmail.com | Nedrick News Published: 13 Jun 2021, 12:00 AM | Updated: 13 Jun 2021, 12:00 AM

कोरोना की दूसरी लहर से अब भले ही थोड़ी राहत मिलने लगी हो, लेकिन कुछ दिन पहले हालात आउट ऑफ कंट्रोल थे। देशभर में कोरोना ने हाहाकार मचाया हुआ था। स्वास्थ्य सुविधाओं की भारी कमी हो गई थीं। श्मशान घाटों में लंबी लंबी लाइन लगीं हुई थीं। उस दौरान का मंजर बेहद ही भयावह था। 

यही वजह है कि कोरोना से होने वाली मौतों के सरकारी आंकड़ों पर लगातार सवाल उठते रहते हैं। कुछ लोगों का मानना है कि सरकारी आंकड़ों में बड़ा खेल हुआ और सरकार ने असली आंकड़ें देश और दुनिया से छिपाकर रखे हुए हैं। वहीं बिहार में हाल ही में हुई जांच के बाद 4 हजार करीब ज्यादा मौतों का खुलासा होने पर इस मामले ने और तूल पकड़ लिया। लोगों का ऐसा मानना है कि अगर बिहार की तरह दूसरे राज्य भी अपने यहां निष्पक्ष जांच कराएंगे, तो सरकारी आंकड़ों का सच सामने आएगा। 

5 से 7 गुना ज्यादा मौतों का दावा

वहीं इस बीच एक मैग्जीन में ऐसा ही कुछ दावा किया। मैग्जीन के मुताबिक देश में जो कोरोना की मौतों का जो आंकड़ा पेश किया गया, असल संख्या उससे 5 से 7 गुना ज्यादा है। मैग्जीन के इन दावों पर अब सरकार की तरफ से भी प्रतिक्रिया सामने आई। सरकार ने इस दावों को सिरे से नकार दिया। सरकार ने दावों को बेबुनियाद बताते हुए कहा कि पत्रिका ने ये निष्‍कर्ष महामारी विज्ञान संबंधी सबूतों के बिना ही सिर्फ आंकड़ों के आकलन के जरिए निकाला। 

इसको लेकर स्वास्थ्य मंत्रालय की तरफ से एक बयान जारी किया गया। जिसमें उन्होंने पत्रिका के नाम का जिक्र नहीं किया, हालांकि इस तरह की रिपोर्ट प्रकाशित करने के लिए निंदा की। 

सरकार ने कई कारण देते हुए नकारा इन दावों को

सरकार की तरफ से कहा गया कि मैग्जीन ने जिस तरह से अध्ययन कर मौतों का अनुमान लगाया, वो किसी भी देश की मृत्युदर के बारे में जानने के लिए सही तरीका नहीं है। स्वास्थ्य मंत्रालय ने कहा कि पत्रिका में कोरोना से होने वाली मौतों का विश्लेषण करने वाला जो लेख प्रकाशित है, उसके लिए किस अध्ययन का इस्तेमाल किया गया, इसके बारे में कोई जानकारी नहीं दी। इसके अलावा जब वैज्ञानिक डाटाबेस जैसे पबमेड, रिसर्च गेट में इंटरनेट पर इस रिसर्च पेपर को ढूंढने की कोशिश की गई, तो इस तरह की कोई भी जानकारी नहीं मिली। 

स्‍वास्‍थ्‍य मंत्रालय के बताया कि ये अध्ययन जो किया गया है, उसमें तेलंगाना में बीमा दावों को आधार बनाया गया, लेकिन जब इसकी समीक्षा की गई, तो ऐसी कोई भी जानकारी नहीं मिली जो पत्रिका में प्रकाशित की गई। सरकार ने पत्रिका में प्रकाशित इस विश्‍लेषण को पूरी तरह से गलत बताया।

मंत्रालय ने आगे कहा कि दो और अध्ययन पर भरोसा किया गाय। जिसमें ‘प्रश्नम’ और ‘सी वोटर’ शामिल। ये चुनाव नतीजों का पूर्वानुमान और विश्लेषण करने के लिए जाने जाते हैं। ये जन स्वास्थ्य रिसर्च से कभी भी जुड़े नहीं हैं। यही नहीं चुनाव नतीजों का अनुमान लगाने के लिए उनके तरीके कई बार सटीक साबित नहीं हुए। 

‘कोरोना के आंकड़ों को लेकर सरकार पारदर्शी’

बयान में ये कहा गया है कि पत्रिका ये खुद कह रही हैं कि मौतों के आंकड़ों का ये जो अनुमान लगाया गया है, वो अस्पष्ट और अविश्वसनीय स्थानीय सरकार के आंकड़ों, कंपनी रिकॉर्ड के आंकलन पर आधारित है। और इस तरह का विश्लेषण ‘मृत्युलेख’ जैसा है। सरकार ने कहा है कि वो कोरोना आंकड़ों को लेकर पारदर्शी है। 

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