Ghadar Movement 1913 में उठी वो चिंगारी, जो आज़ादी की मशाल बन गई

vickynedrick@gmail.com | Nedrick News Published: 28 Aug 2025, 12:00 AM | Updated: 28 Aug 2025, 12:00 AM

Ghadar Movement: आजादी की लड़ाई सिर्फ भारत की धरती पर नहीं लड़ी गई थी। कुछ क्रांतिकारी तो हजारों किलोमीटर दूर परदेस में रहकर भी अंग्रेज़ों की नींद उड़ाया करते थे। ये कहानी है ग़दर आंदोलन की, एक ऐसा विद्रोह जो भारत से नहीं बल्कि अमेरिका और कनाडा की धरती से शुरू हुआ, लेकिन धड़कता सिर्फ भारत की आज़ादी के लिए था। आपको बता दें, ये कोई आम आंदोलन नहीं था। इसे शुरू करने वाले लोग वे भारतीय थे जो 1900 के दशक की शुरुआत में अमेरिका और कनाडा के पश्चिमी तट पर काम करते थे खेतों में, फैक्ट्रियों में, और जंगलों में लकड़ी काटते हुए। लेकिन मन में बस एक ही सपना था, भारत को ब्रिटिश शासन से आज़ाद कराना।

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शुरुआत: जब उम्मीद की चिंगारी परदेस में जली- Ghadar Movement

1903 से 1913 के बीच करीब 10,000 पंजाबी प्रवासी अमेरिका और कनाडा पहुंचे। इनमें से कई ब्रिटिश सेना से रिटायर्ड थे। इन प्रवासियों ने देखा कि परदेस में उन्हें नस्लभेद, भेदभाव और शोषण का सामना करना पड़ता है, और धीरे-धीरे उनके भीतर भारत में अंग्रेज़ों के शासन के प्रति गुस्सा और बढ़ने लगा।

15 जुलाई 1913, ओरेगन के एस्टोरिया शहर में एक बैठक हुई, जिसमें ग़दर पार्टी का औपचारिक गठन हुआ। शुरू में इसे पैसिफिक कोस्ट हिंदुस्तान एसोसिएशन कहा गया। यही वो दिन था, जब एक क्रांति की नींव डाली गई।

कौन थे ये ग़दर के सिपाही?

ग़दर पार्टी के सदस्य कोई पेशेवर राजनेता नहीं थे। ये वे लोग थे जो खेतों में पसीना बहाते थे, मजदूरी करते थे, लेकिन दिल में बगावत की आग लिए चलते थे।
इनमें प्रमुख नाम थे हरदयाल, सोहन सिंह भकना, भगवान सिंह ज्ञानी, करतार सिंह सराभा, तारक नाथ दास, मौलवी बरकतुल्लाह, रासबिहारी बोस, उधम सिंह, और गुलाब कौर।

इन लोगों ने “ग़दर दी गूंज” नाम से एक अखबार भी शुरू किया, जिसमें ब्रिटिश सरकार के खिलाफ क्रांतिकारी लेख और कविताएं छपती थीं। यह अखबार भारत में भेजा जाता था और वहां के युवाओं को आज़ादी की राह पर चलने के लिए प्रेरित करता था।

प्रथम विश्व युद्ध और ग़दर की योजना

1914 में जैसे ही प्रथम विश्व युद्ध शुरू हुआ, ग़दरियों को लगा कि यही समय है ब्रिटिश सरकार पर हमला करने का। उनका मानना था कि ब्रिटेन युद्ध में व्यस्त है, और भारत में विद्रोह खड़ा करके उसे पीछे से झटका दिया जा सकता है।

ग़दर पार्टी ने जर्मनी और ओटोमन तुर्की से हाथ मिलाया। योजना थी कि अफगानिस्तान के रास्ते ब्रिटिश भारत में घुसा जाए, सेना में विद्रोह करवाया जाए और एक बड़ी क्रांति खड़ी की जाए।

लेकिन, 1915 में काशीराम जोशी, जो हरियाणा से थे और अमेरिका से लौटे थे, उन्हें अंग्रेजों ने पकड़कर फांसी दे दी। इसके बाद ग़दर की योजना को दबाने के लिए ब्रिटिश सरकार ने सैकड़ों गिरफ्तारियां कीं।

हिंदू-जर्मन षड्यंत्र और ग़दरियों का मुकदमा

1914 से 1917 के बीच ग़दर पार्टी ने भूमिगत रहते हुए क्रांति की कोशिशें जारी रखीं। जर्मनी की मदद से भारत भेजे गए हथियारों को पकड़ा गया। इन गतिविधियों को इतिहास में हिंदू-जर्मन षड्यंत्र कहा गया।

इसका एक बड़ा असर अमेरिका में भी पड़ा। 1917 में सैन फ्रांसिस्को में एक चर्चित मुकदमा चला, जहां ग़दर पार्टी के कई नेताओं पर विदेशी धरती से ब्रिटिश राज के खिलाफ युद्ध छेड़ने का आरोप लगा।

गुटों में बंट गई पार्टी, पर सोच एक रही

युद्ध के बाद ग़दर पार्टी दो हिस्सों में बंट गई – एक गुट कम्युनिस्ट विचारधारा को अपनाने लगा और दूसरा भारतीय समाजवाद की तरफ झुक गया। 1948 में पार्टी को औपचारिक रूप से भंग कर दिया गया, लेकिन इसका असर भारतीय क्रांतिकारियों पर बरसों तक रहा।

ग़दर पार्टी के क्रांतिकारी विचारों ने गांधी जी की अहिंसा के रास्ते के समानांतर एक सशस्त्र आज़ादी की सोच को भी मजबूती दी। इसने भगत सिंह, सचिंद्रनाथ सान्याल, चंद्रशेखर आज़ाद जैसे युवाओं को प्रभावित किया।

जब छात्रों ने संभाली बागडोर

उस दौर में कुछ छात्र अमेरिका के बर्कले विश्वविद्यालय में पढ़ने गए थे। उन्हीं में से कई ग़दर पार्टी से जुड़े। हरदयाल, तारक नाथ दास, और बरकतुल्लाह जैसे क्रांतिकारी इन्हीं छात्रों के बीच से निकले। इन्होंने अमेरिका और कनाडा में रहकर भारतीय छात्रों को संगठित किया और उन्हें देशभक्ति की भावना से भर दिया।

एक भूली हुई क्रांति की याद

आज ग़दर आंदोलन भले ही इतिहास की किताबों के एक अध्याय में सिमट गया हो, लेकिन इसका प्रभाव बहुत गहरा था।
जहां एक तरफ गांधी और नेहरू की राजनीति भारत में आज़ादी की लड़ाई को दिशा दे रही थी, वहीं विदेशों में बसे इन क्रांतिकारियों ने अपने खून-पसीने और जान की बाज़ी लगाकर भारत की आज़ादी की नींव मजबूत की।

ग़दर पार्टी की ये कहानी हमें याद दिलाती है कि आज़ादी सिर्फ एक नेता की आवाज़ से नहीं, बल्कि हजारों गुमनाम हीरों की कुर्बानियों से मिली है और वो हीरे कहीं खेतों में, कहीं गुरुद्वारों में, तो कहीं विदेशी जेलों में सड़ रहे थे।

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