14 सितंबर से लेकर 19 नवंबर तक…14 महीनों में झुकी सरकार, जानिए किन किन मोड़ से गुजरा ये किसान आंदोलन?

vickynedrick@gmail.com | Nedrick News Published: 19 Nov 2021, 12:00 AM | Updated: 19 Nov 2021, 12:00 AM

कृषि कानून को लेकर बीते एक साल से भी ज्यादा साल से चल रहा किसानों का संघर्ष आखिरकार सफल रहा। 19 नवंबर शुक्रवार को गुरु पर्व के दिन सुबह 9 बजे पीएम मोदी ने राष्ट्र के नाम अपना संबोधन देकर ये बड़ा ऐलान कर दिया। प्रधानमंत्री ने अपने संबोधन में कहा कि उनकी सरकार ने तीनों नए कृषि कानून वापस लेने का फैसला ले लिया है। 

कानून वापसी का ऐलान

इस दौरान पीएम ये भी कहते नजर आए कि ये कानून कृषि क्षेत्र में सुधार के लिए लाए गए थे, लेकिन हमारी कोशिशों में ही कमी रही होगी, जो हम किसानों को समझा नहीं पाए। इस दौरान पीएम ने किसानों से घर लौटने की भी अपील की। 

पिछले साल सितंबर के महीने में ये कानून सरकार संसद में लेकर आई थीं। तब से ही इसको लेकर सरकार और किसानों के बीच गतिरोध बना हुआ था। 26 नवंबर को किसानों ने कानूनों को लेकर सरकार के खिलाफ हल्ला बोलते हुए दिल्ली के बॉर्डर की तरफ आ गए थे। किसानों के आंदोलन को एक साल पूरा होने ही वाला था कि इससे पहले सरकार के किसानों के आगे झुकते हुए कानून वापस लेने का फैसला कर लिया। ऐसे में आइए आज इस पूरे आंदोलन की एक बार टाइमलाइन पर नजर डाल लेते हैं…

किसान आंदोलन की पूरी टाइमलाइन…

पहली बार 5 जून 2020 को सरकार ने इन तीनों कृषि कानून के अध्यादेशों को प्रख्यापित किया था। इसके बाद 14 सितंबर को मॉनसून सत्र के दौरान लोकसभा में इन बिलों को पेश किया गया था। तब से ही कानूनों को लेकर विरोध प्रदर्शन शुरू हो गया। लोकसभा में भी इसको लेकर भारी हंगामा हुआ, लेकिन इसके बीच ही 17 सितंबर को लोकसभा में तीनों बिल पास हो गए थे। लोकसभा के बाद 20 सितंबर को राज्यसभा में बिलों को ध्वनिमत से पास कराया गया। 

सितंबर में ही कानूनों को लेकर आंदोलन की शुरूआत हो गई थीं। पंजाब में किसानों ने 24 सितंबर को रेल रोको आंदोलन किया। अगले ही दिन इसके बाद 25 सितंबर को अखिल भारतीय किसान संघर्ष समन्वय समिति के बैनर तले पूरे देश के किसान सड़कों पर आ गए। इस बीच 27 सितंबर को राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद ने तीनों कानून पर साइन कर दिए थे। 

फिर आया नवंबर का महीना, जब किसानों ने अपना आंदोलन तेज करते हुए दिल्ली चलो का नारा दिया। 25 नवंबर को इसकी शुरूआत हुई थी, लेकिन तब कोरोना का हवाला देते हुए किसानों को दिल्ली में एंट्री करने से रोका गया। 

26 नवंबर को किसान दिल्ली की ओर कूच कर रहे थे कि इस बीच अंबाला में पुलिस ने उन्हें रोकने की कोशिश की। किसानों पर पानी की बौछार भी की गई। आंसू गैसे के गोले दागे गए। बाद में उन्हें दिल्ली के निरंकारी मैदान में शांतिपूर्ण विरोध प्रदर्शन के लिए इजाजत दे दी गई। इसके बाद से ही किसान दिल्ली की सीमाओं पर डट गए थे। 

फिर शुरू हुआ बातचीत का सिलसला। 28 नवंबर को गृह मंत्री अमित शाह ने किसानों के सामने बातचीत की पेशकश की और साथ ही दिल्ली बॉर्डर छोड़कर बुराड़ी में आंदोलन स्थल बनाने को कहा। किसानों ने ये प्रस्ताव ठुकरा दिया और जंतर-मंतर पर विरोध करने की इजाजत मांगी। 

3 दिसंबर को सरकार और किसानों के बीच पहले दौर की बातचीत हुई, जो बेनतीजा रही। इसके बाद 5 दिसंबर को भी दोनों पक्षों ने बातचीत की, जिसका कोई परिणाम नहीं निकला। 8 दिसंबर को किसानों ने भारत बंद का आह्मान किया, जिसमें दूसरे राज्यों का भी उन्हें सपोर्ट मिला। 

9 दिसंबर को कानूनों में संशोधन के प्रस्ताव को किसानों ने नामंजूर कर दिया और कानून रद्द किए जाने तक आंदोलन जारी रखने की बात कही। फिर 11 दिसंबर को भारतीय किसान संघ सुप्रीम कोर्ट जा पहुंचा। 16 दिसंबर को कोर्ट की तरफ से कहा गया कि वो इस गतिरोध को खत्म करने के लिए सरकार और किसान संघों के प्रतिनिधियों के साथ एक पैनल का गठन कर सकता है।

21 दिसंबर को किसान एक दिन की भूख हड़ताल पर बैठे। 30 दिसंबर को किसानों और सरकार के बीच छठे दौर की बातचीत हुई, जिसमें केंद्र ने पराली जलाने पर किसानों पर जुर्माने लगाने से लेकर और बिजली संशोधन बिल वापस लिए। दोनों पक्षों के बीच 4 जनवरी 2021 को सांतवें दौर की बातचीत रही। ये भी बेनतीजा ही रही। 

11 जनवरी को सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र को फटकार लगाई और साथ ही ये भी कहा कि वो इस मुद्दे को सुलझाने के लिए एक कमेटी बनाएगी। 12 जनवरी को चार सदस्यों की एक कमेटी का गठन किया गया और साथ ही सुप्रीम कोर्ट ने सभी पक्षों से बातचीत कर विवाद सुलझाने को कहा। 

इसके बाद आया 26 जनवरी, जो इस आंदोलन का सबसे काला दिन था। इस दिन वो हुआ था, जिसकी किसी ने उम्मीद नहीं की थी। किसानों ने गणतंत्र दिवस के मौके पर दिल्ली में ट्रैक्टर रैली निकालने का फैसला किया, जो देखते ही देखते हिंसक रूप ले लिया। रैली के दौरान जगह जगह हिंसक घटनाएं हुई। उपद्रवियों ने लाल किले की प्राचीर पर धार्मिक झंडा भी लहराया। 

इस घटना के बाद किसान आंदोलन कमजोर पड़ने लगा था। फिर 28 जनवरी को गाजीपुर पर तनाव तब गया। गाजियाबाद प्रशासन ने किसानों को साइट खाली करने का निर्देश दिया था, लेकिन प्रदर्शनकारियों ने वहां से नहीं हटने की बात कह दी। 

4 फरवरी को ये आंदोलन तक इंटरनेशनली छा गया, जब किसानों के समर्थन में पॉप सिंगर रिहाना, जलवायु कार्यकर्ता ग्रेटा थनबर्ग समेत कई लोगों ने ट्वीट किया। इसके बाद ही कथित टूलकिट विवाद शुरू हुआ। 5 फरवरी को टूलकिट मामले में दिल्ली पुलिस ने साइबर क्राइम एक्ट और देशद्रोह के तहत केस दर्ज किया। 9 फरवरी को गणतंत्र दिवस पर हुई हिंसा मामले में दीप सिंधु की गिरफ्तारी हुई। 

इस बीच 6 फरवरी को किसानों ने चक्का जाम किया। इसके बाद 14 फरवरी को टूलकिट मामले में एक्टिविस्ट दिशा रवि की बेंगलुरु से गिरफ्तारी हुई। हालांकि 23 फरवरी को उन्हें जमानत भी मिल गई। 

2 मार्च को शिरोमणि अकाली दल चीफ सुखबीर सिंह बादल समेत पार्टी के कई नेताओं को पंजाब विधानसभा का घेराव करने के लिए जाते वक्त हिरासत में लिया गया था। 5 मार्च को पंजाब विधानसभा ने तीनों कृषि कानूनों को पंजाब में लागू नहीं करने को लेकर एक प्रस्ताव पास किया गया। 6 मार्च को दिल्ली बॉर्डर पर किसानों के आंदोलन के 100 दिन पूरे हुए। 

15 अप्रैल को हरियाणा के डिप्टी सीएम दुष्यंत चौटाला ने प्रधानमंत्री मोदी को किसानों से बातचीत बहाल करने के लिए चिट्ठी लिखी। इसके बाद 27 मई को किसानों ने काला दिवस के रूप में मनाया, जिस दौरान सरकार का पुतला दहन किया। 

5 जून को किसानों ने संपूर्ण क्रांतिकारी दिवस के तौर पर मनाने का फैसला किया। 26 जून को आंदोलन को 7 महीने पूरे हुए, जिस दौरान किसानों ने दिल्ली तक मार्च किया। 

जुलाई में जब संसद का मॉनसून सत्र हुआ तो किसानों ने सरकार पर दबाव बनाने के लिए कई कदम उठाए। 7 अगस्त को विपक्ष के 14 नेताओं ने सदन में मुलाकात की और सभी ने दिल्ली के जंतर-मंतर पर हो रहे किसान संसद में जाने का फैसला किया। हरियाणा के करनाल में 28 अगस्त को किसानों के ऊपर लाठी चार्ज किया गया, जिसमें कई किसान घायल हुए। 3 अक्टूबर को उत्तर प्रदेश के लखीमपुर में एक बड़ी घटना घटी। यहां प्रदर्शकारी किसानों के ऊपर गाड़ी चढ़ा दी गई, जिसमें कुछ किसानों की मौत भी हुई। इसका आरोप केंद्रीय मंत्री के बेटे पर लगा, जिसको अरेस्ट किया गया।  

इस आंदोलन के दौरान कई घटनाएं घटी। महापंचायतें हुई। यूपी चुनाव आने वाले हैं, ऐसे में किसान नेताओं ने यूपी में अपना आंदोलन तेज कर दिया। मुजफ्फरनगर में बड़ी संख्या में लोग जुटे। संसद का शीतकालीन सत्र शुरू होने वाला था, जिसमें भी किसान फिर से सरकार को घेरने की तैयारी में थे। लेकिन इससे पहले ही आज यानी 19 नवंबर को पीएम मोदी ने बड़ा ऐलान करते हुए कानून वापसी का ऐलान कर दिया।

किसानों का आंदोलन करीब करीब एक साल चला। इस दौरान किसानों ने ना तो ठंड की परवाह की, ना ही बारिश की और ना ही कोरोना महामारी की। वो अपनी मांगों पर अड़ रहे, जिसने आखिरकार अब सरकार को झुकने पर मजबूर कर ही दिया। 

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