The Story of Bankatwa Sahib: भारत के विचार हमेशा से ही ऐसे रहे है कि वो कभी भी पहले किसी पर हमला नहीं करेंगे, युद्ध करने के बजाय मैत्री का रास्ता चुनने वाले भारत ने हमेशा अपने पड़ोसी देश नेपाल के साथ एक विशेष और खास रिश्ता बनाये रखा.. वजह साफ थी..नेपाल का एक हिंदू राष्ट्र होना.. नेपाल में भारत ताज हिमालय है, तो वहीं महादेव के सबसे बड़े मंदिरों में से एक पशुपति नाथ मंदिर तो दुनिया भर के सबसे पवित्र फेमस मंदिरों में से एक है। लेकिन क्या आप जानते है कि नेपाल केवल हिंदूओं के लिए ही नहीं बल्कि सिखों के लिए भी एक खास जगह बनता जा रहा है।
करीब 200 सालो से सिख नेपाल की धरती का हिस्सा है.. और सिक्खों के इस अमूल्य इतिहास की कहानी कह रहा है गुरूद्वारा बनकटवा साहिब.. जो कि सिखो के पहले शासक महाराजा रणजीत सिंह के उसस साहस भरे जीवन की कहानी और उनके परिवार को जिस कष्टों से गुजरना पड़ा था उसकी कहानी कहता है.. अपने इस लेख में हम गुरुद्वारा बनकटवा साहिब के बारे में जानेंगे.. कैसे इस गुरुद्वारे की नींव रखी गई और आज किस स्थिति में है ये गुरुद्वारा।
नेपाल में सिखों का आना
दरअसल नेपाल में सिखों के आगमन की कहानी करीब 200 साल पुरानी है… जब महाराजा रणजीत सिंह की मृत्यु के बाद अंग्रेजी हुकुमत ने पंजाब पर कब्जा करने के इरादे से हमला कर दिया था.. करीब दो हमले झेलने के बाद पंजाब पूरी तरह से अंग्रेजी हुकुमत के अधीन चली गई थी.. लेकिन तब भी कुछ सिखों ने हार मानने के बजाय पलायन का रास्ता चुना, जिसमें से एक थी महाराजा रणजीत सिंह जी की सबसे छोटी पत्नी महारानी जिंद कौर..जो 1849 में नेपालगंज के रास्ते कुछ सिखो के साथ नेपाल चली गई थी। उस दौरान सिखों ने बांकटवा, जमुनाहा और शिखरपुरा के आसपास अपनी बस्ती बसाना शुरु कर दिया था.. जो धीरे धीरे एक मजबूत समुदाय बन गया था। बांकटवा आज के समय में सिखों का प्रमुख केंद्र है, जहां न केवल एक सिख गुरु द्वारा है बल्कि एक समुदायिक भवन, एक सिख स्कूल भी मौजूद है ताकि यहां रहने वाले सिख हमेशा अपनी परंपरा और संस्कृति से जुड़े रहे।
क्य़ा है गुरुद्वारे बंकटवा की कहानी
बंकटवा नेपाल का एक स्थान है जो सिक्खी की परंपरा और संस्कृति को बनाये रखने के लिए काफी प्रचलित है। “बनकटवा” नाम की उत्पत्ति हिंदी औऱ भोजपुरी भाषा से हुई है, जहाँ “बन” का मतलब जंगल या वनभूमि होता है और “कटवा” का तात्पर्य ऐसी जगह है जिसे काट कर साफ़ किया गया हो। बनकटवा गुरुद्वारे का करीब 7 साल पहले जीर्णोंधार शुरु किया गया था, जिसे गुरूद्वारा गुरु नानक दरबार बनकटवा के नाम से जाना जाता है। इससे पहले ये गुरुद्वारा 80 के दशक में बनाया गया था… लेकिन समय के साथ और प्रकृति की मार के कारण इसका रंग रूप खराब हो गया था। जिसे फिर से रिनोवेट किया गया है।
बच्चों को सिक्खी का पाठ पढ़ाया जाता
ये गुरुद्वारा 1516 में प्रथम गुरु गुरु नानक देव जी के नेपाल के काठमांठू के बालाजू में स्थित मठ के दौरे की याद दिलाता है। यहां पर गुरु नानक देव जी को लोग नानक ऋषि कहा जाता है। गुरु नानक देव जी के मठ से काठमांडू का ये मठ आज भी सिखों के लिए उनकी पहचान का प्रतीक है। जहां सिख संगतें जमा होती है। बच्चों को सिक्खी का पाठ पढ़ाया जाता है। धार्मिक और सामाजिक कार्यक्रमों के लिए जमा होने से लेकर बाकि के प्रोग्राम की चर्चा के लिए यहीं जमा होते है। नेपाल में अनाधिकारीक आकड़ो के अनुसार आज के समय में करीब 7000 सिख रहते है, हालांकि 2011 की जनगणना के अनुसार 700 ही सिख थे।
लेकिन यहां रहने वाले सिखो का मानना है कि उनकी जिंदगी नेपाल में काफी अच्छी है। वो अपने धर्म को पूर्ण रूप से मानते है… और अपने त्योहारों को बड़ी धूमधाम से मनाते है। सिख सही मायने में नेपाल में बेहद मजबूत और अच्छी स्थिति में है। जिसके कारण यहां रहने वाले सिख दशकों से यहीं रहते है औऱ नेपाल उनकी पहली पसंद भी है। नेपाल का बनकटवा गुरुद्वारा सिखों के ऐतिहासिक धरोहर की कहानी कहता है, जो बताते है कि कैसे सिखों को नेपाल के लोगो ने खुले दिल से अपनाया था।






























