Bangladesh referendum Explained: बांग्लादेश के पिछले तीन रेफरेंडम का ट्रेंड क्या देता है संकेत, क्या चौथी बार भी इतिहास खुद को दोहराएगा?

Nandani | Nedrick News

Published: 12 Feb 2026, 07:17 AM | Updated: 12 Feb 2026, 07:17 AM

Bangladesh referendum Explained: बांग्लादेश एक बार फिर जनमत संग्रह की दहलीज पर खड़ा है। 12 फरवरी 2026 को आम चुनाव के साथ देश में चौथा बड़ा रेफरेंडम होने जा रहा है। इस बार सवाल सीधा है क्या जनता ‘जुलाई चार्टर’ को लागू करना चाहती है? सरकार इसे 47 बड़े बदलावों का पैकेज बता रही है, जिन्हें संविधान में संशोधन के जरिए लागू किया जाएगा। लेकिन इस एक सवाल के पीछे सियासत, सत्ता और भविष्य की दिशा को लेकर बड़ी बहस छिपी हुई है।

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पहले तीन रेफरेंडम: सत्ता के हिसाब से नतीजे 

बांग्लादेश के इतिहास में इससे पहले तीन जनमत संग्रह हो चुके हैं। 30 मई 1977 को पहला रेफरेंडम हुआ था। तब राष्ट्रपति जियाउर रहमान ने जनता से पूछा था कि क्या वे उनके राजनीतिक और नीतिगत फैसलों पर भरोसा करते हैं। करीब 88 फीसदी मतदान हुआ और 98.88 फीसदी लोगों ने ‘हां’ कहा।

दूसरा रेफरेंडम 21 मार्च 1985 को राष्ट्रपति हुसैन मुहम्मद एरशाद के दौर में हुआ। सवाल था कि क्या लोग उनकी नीतियों का समर्थन करते हैं और चाहते हैं कि वे चुनाव तक देश चलाते रहें। यहां भी 94 फीसदी से ज्यादा समर्थन मिला। यह दौर सैन्य शासन का था, इसलिए नतीजों पर सवाल भी उठे, लेकिन सत्ता की पकड़ मजबूत रही।

तीसरा जनमत संग्रह 15 सितंबर 1991 को हुआ, जब देश ने फिर से संसदीय प्रणाली में लौटने का फैसला किया। संविधान के बारहवें संशोधन को मंजूरी देने के सवाल पर करीब 84 फीसदी मतदाताओं ने ‘हां’ कहा। इन तीनों रेफरेंडम ने अपने-अपने समय की राजनीति को नई दिशा दी और सत्ता में बैठे लोगों के पक्ष में माहौल बनाया।

यूनुस और सत्ता पर पकड़ की बहस: Bangladesh referendum Explained

पिछले डेढ़ साल से अंतरिम सरकार की कमान संभाल रहे मोहम्मद यूनुस भी इस बार केंद्र में हैं। शुरुआत में वे चुनाव को लेकर अनिच्छुक दिखे, लेकिन दबाव बढ़ने पर चुनाव कराने को तैयार हुए। उन्होंने सार्वजनिक तौर पर कहा है कि चुनाव के बाद वे नई सरकार को जिम्मेदारी सौंप देंगे और संभव है कि अपने ‘यूनुस सेंटर’ लौट जाएं।

फिर भी आलोचकों का मानना है कि वे सत्ता पर अपनी पकड़ ढीली नहीं करना चाहते। वजह यह है कि वे इस रेफरेंडम में ‘हां’ के पक्ष में खुलकर प्रचार कर रहे हैं। विपक्ष का आरोप है कि संविधान सुधार और नए ढांचे के नाम पर वे भविष्य की सरकार के फैसलों में भी प्रभाव बनाए रखना चाहते हैं।

उल्टा तरीका: पहले जनमत, फिर फैसला

इस बार का रेफरेंडम प्रक्रिया के लिहाज से अलग है। आम तौर पर संसद पहले संशोधन पास करती है, फिर जनता से पूछा जाता है कि वे उसे मंजूर करते हैं या नहीं। लेकिन यहां पहले जनता से राय ली जा रही है। अगर ‘हां’ आता है तो आगे संवैधानिक सुधार की प्रक्रिया शुरू होगी, अगर ‘ना’ आता है तो मामला वहीं थम जाएगा।

सबसे बड़ी बहस इस बात पर है कि 47 अलग-अलग बदलावों को एक ही सवाल में जोड़ दिया गया है। मतदाता को सिर्फ ‘हां’ या ‘ना’ कहना है। कुछ मुद्दों से लोग सहमत हो सकते हैं, कुछ से नहीं लेकिन विकल्प अलग-अलग नहीं दिए गए। यही वजह है कि कई विश्लेषक इसे “पैक्ड सवाल” बता रहे हैं।

‘हां’ आया तो क्या बदलेगा?

अगर जनता ‘हां’ कहती है तो एक संवैधानिक सुधार परिषद बनाई जाएगी। 151 सदस्यीय यह परिषद संसद जैसी भूमिका निभाएगी और 180 दिनों के भीतर जुलाई चार्टर के प्रस्तावित बदलावों को संविधान में शामिल करने की कोशिश करेगी।

इन प्रस्तावों में प्रधानमंत्री की शक्तियों पर सीमा तय करना, राष्ट्रपति के अधिकारों में बदलाव, नई चुनाव प्रणाली और यहां तक कि दो सदनों वाली संसद (बाइकैमरल सिस्टम) का गठन शामिल है। 100 सदस्यों का एक ऊपरी सदन बनाने का भी सुझाव है। यानी मौजूदा एकल सदन वाली संसद की जगह पूरी तरह नया ढांचा सामने आ सकता है।

‘ना’ आया तो?

अगर जनता ‘ना’ कहती है तो जुलाई चार्टर के तहत प्रस्तावित सभी बदलाव रुक जाएंगे। हालांकि, यूनुस लगातार प्रचार कर रहे हैं कि ‘हां’ से पुराना कुशासन खत्म होगा और लोकतंत्र मजबूत होगा। चुनाव आयोग ने सरकारी कर्मचारियों को सीधे प्रचार से रोका है, लेकिन राजनीतिक माहौल गर्म है।

आगे की राह आसान नहीं

रेफरेंडम का नतीजा चाहे जो हो, असली चुनौती उसके बाद शुरू होगी। नया या संशोधित संविधान तैयार करना, नए नियम लागू करना और संस्थाओं को नए ढांचे में ढालना आसान काम नहीं है। कई विशेषज्ञों का कहना है कि इतने बड़े बदलावों को एक साथ लागू करना जटिल प्रक्रिया होगी।

भविष्य की दिशा तय करेगा जनमत

यह जनमत संग्रह सिर्फ एक कानूनी प्रक्रिया नहीं है, बल्कि बांग्लादेश की राजनीति के अगले अध्याय की शुरुआत भी हो सकता है। कुछ लोग इसे संविधान सुधार का मौका मान रहे हैं, तो कुछ इसे सत्ता के संतुलन को बदलने की कोशिश के रूप में देख रहे हैं।

आखिरकार, 12 फरवरी 2026 को आने वाला फैसला सिर्फ ‘हां’ या ‘ना’ नहीं होगा वह यह तय करेगा कि बांग्लादेश किस राजनीतिक राह पर आगे बढ़ेगा, और मोहम्मद यूनुस की भूमिका भविष्य में कितनी रहेगी।

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Nandani

nandani@nedricknews.com

नंदनी एक अनुभवी कंटेंट राइटर और करंट अफेयर्स जर्नलिस्ट हैं, जिन्हें पत्रकारिता के क्षेत्र में चार वर्षों का सक्रिय अनुभव है। उन्होंने चितकारा यूनिवर्सिटी से जर्नलिज़्म और मास कम्युनिकेशन में मास्टर डिग्री प्राप्त की है। अपने करियर की शुरुआत उन्होंने न्यूज़ एंकर के रूप में की, जहां स्क्रिप्ट लेखन के दौरान कंटेंट राइटिंग और स्टोरीटेलिंग में उनकी विशेष रुचि विकसित हुई। वर्तमान में वह नेड्रिक न्यूज़ से जुड़ी हैं और राजनीति, क्राइम तथा राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय खबरों पर मज़बूत पकड़ रखती हैं। इसके साथ ही उन्हें बॉलीवुड-हॉलीवुड और लाइफस्टाइल विषयों पर भी व्यापक अनुभव है।

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