Ahmedabad Land Sinking: गुजरात में धीरे-धीरे धंस रही है ज़मीन: अहमदाबाद-सूरत में सबसे ज्यादा खतरा

vickynedrick@gmail.com | Nedrick News Published: 04 Sep 2025, 12:00 AM | Updated: 04 Sep 2025, 12:00 AM

Ahmedabad Land Sinking: आप सोचिए, अगर किसी दिन आपको लगे कि आपके घर की नींव खिसक रही है। दीवारों में दरारें आने लगी हैं, और जमीन कुछ मिलीमीटर नहीं, बल्कि सेंटीमीटर दर से नीचे जा रही है। यह कोई फिल्मी कल्पना नहीं, बल्कि हकीकत बन चुकी है और वो भी देश के सबसे विकसित माने जाने वाले राज्य गुजरात में।

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कुछ साल पहले उत्तराखंड के जोशीमठ और उत्तरकाशी में जो संकट आया था, वह अब गुजरात के मैदानी इलाकों में पाँव पसार रहा है। देहरादून की यूनिवर्सिटी ऑफ पेट्रोलियम एंड एनर्जी स्टडीज (UPES) के रिसर्चर्स ने इस बारे में चौंकाने वाले आंकड़े पेश किए हैं, जिनमें कहा गया है कि अहमदाबाद, सूरत और कच्छ जैसे शहर धीरे-धीरे धंस रहे हैं और यह संकट अब नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।

अहमदाबाद में जमीन धंसने की रफ्तार 4.2 सेमी प्रति साल! Ahmedabad Land Sinking

शहरों में लगातार हो रहे जमीन धंसाव को लेकर InSAR सैटेलाइट तकनीक से निगरानी की गई, जिससे मिलीमीटर के स्तर पर भी जमीन में आए बदलाव का पता चल सकता है। रिपोर्ट में बताया गया कि:

  • पिपलाज (अहमदाबाद) में साल 2014 से 2020 के बीच जमीन 4.2 सेंटीमीटर/साल की रफ्तार से नीचे गई।
  • वटवा और बापल इलाके में 2020 से 2023 के बीच यह दर 3.5 सेंटीमीटर/साल रही।
  • 2017 से 2020 के बीच तीन बड़े सब्सिडेंस ज़ोन पहचाने गए जहाँ सालाना 2.5 सेमी तक जमीन धंसी।

सूरत और कच्छ में भी हालात डरावने

सिर्फ अहमदाबाद ही नहीं, सूरत में भी जमीन के नीचे जाने का सिलसिला जारी है। 2014 से 2020 के बीच वहां 0.01 से 6.7 सेंटीमीटर/साल तक धंसाव दर्ज हुआ। करंज क्षेत्र यहां सबसे ज्यादा प्रभावित है।

वहीं कच्छ और सौराष्ट्र में जमीन धंसाव की दर 4.3 मिलीमीटर/साल औसतन रही है। लेकिन कुछ इलाकों में यह 2.2 सेंटीमीटर/साल तक भी पहुंच गया। कच्छ के कट्रोल हिल फॉल्ट लाइन पर भी चिंताजनक गतिविधियां दर्ज की गई हैं।

वजह क्या है?

विशेषज्ञों के मुताबिक, इस संकट की सबसे बड़ी वजह है भूजल का अत्यधिक दोहन। जब ज़मीन के नीचे के जलस्तर को जरूरत से ज्यादा खींचा जाता है, तो वहां की मिट्टी और चट्टानें सघन हो जाती हैं और धीरे-धीरे बैठने लगती हैं। यही प्रक्रिया जमीन को नीचे खिसकाने लगती है।

इसके अलावा भूगर्भीय हलचलों (Tectonic Movements) का भी असर पड़ता है, जिससे धीरे-धीरे जमीन खिसकती है। परिणामस्वरूप घरों की दीवारों में दरारें, छतों में क्रैक और सड़कों पर भी गड्ढे बनने जैसी समस्याएं दिखाई देती हैं।

खतरे की घंटी

शोधकर्ताओं ने चेतावनी दी है कि अगर अभी भी इसे हल्के में लिया गया, तो आने वाले सालों में शहरी इन्फ्रास्ट्रक्चर, जल आपूर्ति, कृषि और लोगों के जीवन पर गंभीर असर पड़ सकता है। खासतौर पर अहमदाबाद और सूरत जैसे घनी आबादी वाले इलाकों में यह संकट भविष्य की बड़ी आपदा का संकेत बन सकता है।

अब क्या करना होगा?

इस तरह की गतिविधियों की स्थायी निगरानी, स्मार्ट वाटर मैनेजमेंट, और शहरी नियोजन में भू-गर्भीय पहलुओं को शामिल करना अब वक्त की जरूरत बन गई है। वरना, जोशीमठ जैसी तस्वीरें अब समतल इलाकों में भी आम होती चली जाएंगी।

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