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Star Health Insurance controversy: ₹50 हजार सालाना प्रीमियम देने के बाद भी नहीं मिला क्लेम, क्या हेल्थ इंश्योरेंस सिर्फ कागजी भरोसा?

Nandani | Nedrick News
Lucknow 
Published: 16 Feb 2026, 07:22 AM | Updated: 16 Feb 2026, 07:22 AM

Star Health Insurance controversy: एक बेटे ने अपनी मां के लिए हर साल करीब 50 हजार रुपये का हेल्थ इंश्योरेंस प्रीमियम भरा। उसे यकीन था कि जरूरत के समय पॉलिसी उसका सहारा बनेगी। लेकिन जब मां बीमार पड़ीं और अस्पताल का खर्च सामने आया, तो उसका अनुभव बिल्कुल अलग रहा।

युवक ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर अपनी आपबीती साझा की। उसने लिखा कि इलाज के लिए वह लखनऊ स्थित Star Health and Allied Insurance के दफ्तर पहुंचा था। उसे उम्मीद थी कि क्लेम प्रक्रिया पूरी होगी और खर्च का बोझ कुछ हल्का होगा। लेकिन उसके मुताबिक वह क्लेम सेटलमेंट के बिना और गहरे सदमे के साथ वापस लौटा।

उसकी पोस्ट में एक बड़ा सवाल था, जब प्रीमियम समय पर देना जरूरी है, तो क्लेम के वक्त इतनी आपत्तियां क्यों? क्या हेल्थ इंश्योरेंस अब सुरक्षा की जगह “कागजी वादा” बनता जा रहा है?

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सोशल मीडिया पर उभरा गुस्सा और डर | Star Health Insurance controversy

यह पोस्ट कुछ ही घंटों में वायरल हो गई। कई लोगों ने कमेंट कर अपने अनुभव साझा किए। किसी ने लिखा कि बीमा कंपनियों का काम सिर्फ पैसा लेना रह गया है। एक अन्य यूजर ने सरकार से दखल की मांग करते हुए संबंधित अधिकारियों को टैग किया।

एक व्यक्ति ने बताया कि वह पिछले आठ साल से करीब 80 हजार रुपये सालाना प्रीमियम भर रहा है और अब उसे भी डर है कि कहीं क्लेम के वक्त उसे भी ऐसी ही स्थिति का सामना न करना पड़े।

कई प्रतिक्रियाएं काफी तीखी थीं। कुछ लोगों ने सख्त नियमन और अदालत के हस्तक्षेप तक की मांग कर डाली। कुल मिलाकर, इस चर्चा में गुस्सा, असुरक्षा और अविश्वास साफ नजर आया।

मामला अब सिर्फ एक परिवार तक सीमित नहीं रहा। यह एक बड़े सवाल में बदल गया है कि क्या प्रीमियम भरना ही पर्याप्त है, या असली परीक्षा क्लेम के समय होती है?

कंपनी की सार्वजनिक प्रतिक्रिया

विवाद बढ़ने के बाद स्टार हेल्थ ने उसी पोस्ट के नीचे सार्वजनिक जवाब दिया। कंपनी ने कहा कि क्लेम का फैसला दस्तावेजों में दर्ज जानकारी और मेडिकल रिकॉर्ड की जांच के आधार पर लिया जाता है।

कंपनी के अनुसार, यदि जांच के दौरान “मटेरियल नॉन-डिस्क्लोजर” यानी महत्वपूर्ण स्वास्थ्य जानकारी छिपाने का मामला सामने आता है, तो पॉलिसी की शर्तों और नियामकीय नियमों के तहत कार्रवाई करना जरूरी होता है।

कंपनी ने यह भी कहा कि हर निर्णय तय प्रक्रिया के अनुसार होता है और ग्राहकों के लिए समीक्षा और शिकायत निवारण की व्यवस्था उपलब्ध है। हालांकि, पोस्ट में दफ्तर के व्यवहार या एजेंट की कथित टिप्पणी पर कंपनी ने कोई खास प्रतिक्रिया नहीं दी।

‘मटेरियल नॉन-डिस्क्लोजर’ क्या है और विवाद क्यों होता है?

हेल्थ इंश्योरेंस एक कानूनी अनुबंध पर आधारित होता है। पॉलिसी लेते समय ग्राहक को अपनी मेडिकल हिस्ट्री पूरी और सही बतानी होती है। अगर कोई गंभीर बीमारी या पहले से मौजूद स्वास्थ्य समस्या का जिक्र नहीं किया गया हो, तो कंपनी क्लेम खारिज कर सकती है।

इसी को “मटेरियल नॉन-डिस्क्लोजर” कहा जाता है। लेकिन असल जिंदगी में कई बार विवाद यहां से शुरू होता है। कई ग्राहक कहते हैं कि उन्होंने एजेंट को सारी जानकारी मौखिक रूप से दी थी, लेकिन वह प्रस्ताव फॉर्म में सही तरीके से दर्ज नहीं हुई। बाद में क्लेम के समय कंपनी लिखित दस्तावेज को आधार बनाती है।

जो बात ग्राहक को सामान्य लगती है, वही तकनीकी आधार पर क्लेम रिजेक्शन की वजह बन जाती है। बीमारी के समय परिवार पहले ही मानसिक और आर्थिक तनाव में होता है। ऐसे में क्लेम अस्वीकार होना सिर्फ पैसों का मामला नहीं रहता, बल्कि भरोसे का संकट बन जाता है।

बीमा लेना आसान, क्लेम पाना कठिन?

प्रीमियम भरना एक सालाना प्रक्रिया है। लेकिन क्लेम तब किया जाता है जब घर में कोई गंभीर मेडिकल संकट होता है। इसलिए जब क्लेम रिजेक्ट होता है, तो लोगों को लगता है कि उनका भरोसा टूट गया। यही वजह है कि ऐसे पोस्ट हजारों लोगों के दिल की बात बन जाते हैं। डर सीधा है, “अगर मेरे साथ भी ऐसा हुआ तो?”

क्लेम खारिज हो तो क्या करें?

विशेषज्ञों के अनुसार, अगर क्लेम रिजेक्ट हो जाए तो पॉलिसीधारक को लिखित में कारण मांगना चाहिए और पॉलिसी की संबंधित शर्त देखनी चाहिए। इसके बाद बीमा कंपनी के आंतरिक शिकायत निवारण तंत्र में अपील की जा सकती है। अगर वहां समाधान न मिले, तो मामला इंश्योरेंस ओम्बड्समैन या बीमा नियामक की शिकायत प्रणाली तक ले जाया जा सकता है। हालांकि, यह प्रक्रिया समय लेने वाली हो सकती है।

बढ़ती जागरूकता और गहराता अविश्वास

भारत में हेल्थ इंश्योरेंस का दायरा तेजी से बढ़ रहा है। कंपनियों का तर्क है कि धोखाधड़ी और जानकारी छिपाने के मामलों से प्रीमियम पर असर पड़ता है। वहीं ग्राहक कहते हैं कि कई बार असली दावों को भी तकनीकी आधार पर खारिज कर दिया जाता है।

इस घटना ने एक बार फिर ध्यान खींचा है कि बीमा खरीदना सिर्फ शुरुआत है। असली कसौटी तब आती है जब क्लेम फाइल किया जाता है। उस बेटे के लिए यह मुद्दा सिर्फ नियमों की भाषा का नहीं, बल्कि उम्मीद और भरोसे का था। और शायद यही वजह है कि उसकी पोस्ट ने हजारों लोगों के मन में छिपे डर को आवाज दे दी।

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Nandani

nandani@nedricknews.com

नंदनी एक अनुभवी कंटेंट राइटर और करंट अफेयर्स जर्नलिस्ट हैं, जिन्हें पत्रकारिता के क्षेत्र में चार वर्षों का सक्रिय अनुभव है। उन्होंने चितकारा यूनिवर्सिटी से जर्नलिज़्म और मास कम्युनिकेशन में मास्टर डिग्री प्राप्त की है। अपने करियर की शुरुआत उन्होंने न्यूज़ एंकर के रूप में की, जहां स्क्रिप्ट लेखन के दौरान कंटेंट राइटिंग और स्टोरीटेलिंग में उनकी विशेष रुचि विकसित हुई। वर्तमान में वह नेड्रिक न्यूज़ से जुड़ी हैं और राजनीति, क्राइम तथा राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय खबरों पर मज़बूत पकड़ रखती हैं। इसके साथ ही उन्हें बॉलीवुड-हॉलीवुड और लाइफस्टाइल विषयों पर भी व्यापक अनुभव है।

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