The Ladli Fauj: स से सिख और स से हु साहस, ये दो शब्द है जो ऐसा लगता है जैसे एक दूसरे को ही प्रदर्शित कर्णिक लिए बने है। सिखो की बहादुरी के आगे तो क्या मुगल, क्या मराठा,क्या अफगान और क्या अंग्रेज, सभी पानी भरते थे। धर्म और पराक्रम को एक साथ लेकर कैसे चलना है ये आप केवल सिख धर्म में ही देख सकते है। उन्हें एक साथ आत्मसात करने वाले थे सिख गुरु। छठे गुरु गुरु हर गोविंद राय जी ने पहली बार मुगलों के अत्याचार से तंग आकर धर्म के साथ शस्त्र उठाया था, जो उनके बाद आज भी जारी है।
खासकर दसवें गुरु गुरु गोबिंद सिंह जी अपने जीवन में सिखो को मजबूत बनाने के लिए ताउम्र संघर्ष किया जिसने सिखो को एक अलग पहचान दिलाई। खासकर खालसा की स्थापना के बाद, एक ऐसी सेना का निर्माण हुआ, जिसके आगे दुश्मन सेना थर थर कांपते थे, लेकिन गुरु साहिब के लिए ये सेना उनकी लाडली थी। जी हां हम बात कर रहे है पंजाब की उस लाडली फौज के बारे में, जिसे गुरु साहिब के सबसे करीब माना गया है। तो चलिए आपको आपको इस लेख में बताते लाडली फौज के बारे में बताते है कि कौन थी ये फौज, और क्यों थी ये इतनी खास।
लाडली फौज कौन थी
लाडली फौज एक ऐसी सेना थी जिसकी स्थापना खुद सिखो के दसवें गुरु गुरु गोबिंद सिंह जी ने की थी। जो कि खालसा पंथ के योद्धा है। विशेषरूप से निहंग सिख, जिन्होंने खालसा को अपनाया था। इन्हें गुरु साहिब की लाडली फौज कहा जाता था। निहंग सिखो की सेना में शामिल सिख नीले रंग के बाने पहनते है जो कि नीले रंग के कपड़े होते है, सर पर बड़ी सी पगड़ी, जिसे ये लोग दस्तार कहते है पहनते है। इनकी पगड़ियों को पवित्र निशान साहिब लगा होता है। हमेशा कृपाण या फिर भाला धारण किए रहते है। निहंग सिखो का ये रूप गुरु साहिब के बेटे फतेह सिंह की वेषभूषा और उनके धारण किए गए हथियार से प्रेरित है।
क्यों हुई थी लाडली सेना की स्थापना
इनकी स्थापना मुख्य रूप से सिख पंथ की रक्षा के लिए किया गया था। इन्हें गतका जो कि एक तरह का मार्शल आर्ट होता है। जो सिखो के साहस और बहादुरी का प्रतीक है। खाससा पंथ की स्थापनी 14 अप्रैल 1699 में हुई थी, और उसमें शामिल होने वाले सिखों को निहंग कहा गया था। निहंग जिनका मतलब होता है निडर या किसी भी तरह के डर से मुक्त। निहंग सिख, वो सिख होते है जो हमेशा तैयार रहते है दुश्मनों से लोहा लेने के लिए। जिस वक्त ये खालसा के सदस्य बनते है, अपना पूरा जीवन ही ये एक योद्धा की तरह समर्पित होते है। समय कोई भी इनका अनुशासन इतना सख्त होता है कि वो हर समय एक्टिव रहते है।
रात को 1 से 3 बजे के बीच उठते है, मौसम कोई भी हो, ठंडे पानी से स्नान करते है, स्नान के बाद वे आदि गुरु, दशम गुरु और सरब लोह ग्रंथ की बाणियों का पाठ करते है। इसके बाद घुड़सवारी, तलवारबादी और गतका का अभ्यास करते है। जो लंगर वो तैयार करते है उससे पहले वो पंज स्नान करते है, जिसमें वो पांच बार नहाते है, और लंगर के लिए प्रसाद खुद तैयार करते है। चर्दी कला पर विश्वास करने वाले निहंग, ज्यादातर गुरुद्वारों की सेवा, सिख धर्म से जुड़ी शिक्षाओं को देने और संगत सेवा में अपना समय देते है। ‘लाडली फौज’ का अनुशासन और पारंपरिक युद्ध कौशल सबको हैरान कर के रख देता है। निहंग बताते है कि धर्म और साहस कैसे एक साथ चलत सकता है।
महिलायें भी होती है फौज का हिस्सा
ये गुरु साहिब की ही वाणी थी कि सिख धर्म में , खालसा को मानने वाला हर एक शख्स हमेशा महिलाओं और पुरुषों को बराबर समझेगा। इसलिए उन्होंने केवल पुरुषों को ही नहीं महिलाओं को भी खालसा का हिस्सा बनाया। जो लाडली फौज का हिस्सा बनी। इसके लिए महिलाओं को भी गुरुद्वारों में जाकर अमृत छाकाया जाता है। ये महिलायें भी निहंग पुरुषों की तरह सिर पर दुमाला, अथवा पगड़ी पहने रहती है, न तो कोई श्रृंगार और न ही बाहरी आडंबर से लगाव.. न बालने काटने की इजाजत, सादा जीवन जीती है इनका मानना है कि ईश्वर ने इन्हे जैसा बनाया है वैसे ही रहना चाहिए।
महिलाओं पगड़ी पहन कर रखना अनिवार्य
अमृत छकने के बाद भी निहंग सिख शादी करते है, उनका भी परिवार होता है, लेकिन निहंग बनने के बाद उनको कुछ नियम सख्ती से फॉलो करना ही होता है। उन्हें सुबह सूरज उगने से पहले उठना अनिवार्य है। जगने के बाद पांच बाणी का पाठ अनिवार्य है। निहंग सिख नीले रंग के ही वस्त्र धारण करते है, लेकिन महिलाओं को आम दिनो में नॉर्मल कपड़े पहनने की आजादी होती है मगर इन्हें पगड़ी पहन कर रखना अनिवार्य है। हालांकि किसी समारोह या किसी धार्मिक कार्यक्रम में इनका नीला वस्त्र धारण करना अनिवार्य है।
महिलाओं को भी योद्दा बनने की ट्रेनिग
निंहग बनने के बाद पुरुषों के साथ साथ महिलाओं को भी योद्दा बनने की ट्रेनिग दी जाती है। घुड़सवारी, तलवारबाजी, गोली चलाने की ट्रेनिंग दी जाती है। हालांकि निहंगो को गृहस्थ जीवन जीना है या ब्रह्मचर्य का पालन करना है, ये उन पर ही निर्भर करता है, लेकिन जो गृहस्थ भी होता है, उन पर कोई बाउंडेशन नहीं होती है, जो महिला पुरुषों की बराबरी का सबसे मजबूत संदेश देती है।
गुरु ग्रंथ साहिब में भी गुरु दी लाडली फौज का जिक्र है, जिसे हम आम भाषा में गुरु की सबसे प्यारी सेना कहते है। निहंग सिख, दसम गुरु के सबसे करीब और उनके लाडले कहलाते है। जिन्होंने आज भी सही मायने में खालसा सेना की परंपरा को बरकरार रखा हुआ है। निहंग सिख आज भी खुद को लाडली फौज ही कहते है, और ये कहने का अधिकार खुद दशम गुरु गुरु गोबिंद सिंह जी ने उन्हें दिया है। इनका अनुशासन सबके बस का नहीं है फॉलो करना..और शायद हर कोई इसीलिए गुरु की लाडली नहीं बन सकता।



























