Gurudwaras in Pakistan: यह तो हम सभी जानते हैं कि भारत की आजादी से पहले उसे धर्म के आधार पर बांटा गया था और स्थापना हुई थी पाकिस्तान की लेकिन पाकिस्तान के लिए केवल भारत के दो ही राज्य बंटे,एक बंगाल और दूसरा पंजाब। पंजाब जिसे सिख धर्म की उत्पत्ति का गढ़ माना जाता है, उनके लिए पंजाब का हर एक कोना बहुत अहम और भावनाओं से भरा हुआ था, लेकिन बंटवारे जो हिस्सा पाकिस्तान को मिला, उसने सिखो को काफी तकलीफ भी पहुंचाई। सिख धर्म की स्थापना और उसके विकास से जुड़ा एक अहम हिस्सा पाकिस्तान के पास गया।
जिससे सिखो की नींव यानी कि प्रथम गुरु गुरु नानक देव जी की जन्मभूमि और उनकी सचखंड जाने का स्थान दोनों इस्लामिक पाकिस्तान के पास चला गया। सैकड़ों सिख गुरुद्वारे में पाकिस्तान के हिस्से गए लेकिन आज करीब 79 साल बाद वहां सिखो की स्थिति कैसी है वो किसी से छिपी भी है, ऐसे में वहां के गुरुद्वारों का क्या हाल होगा, जरा सोचिए। अपने इस वीडियो के हम 5 ऐसे गुरुद्वारों के बारे में बताने जा रहे है जो राजनैतिक दृष्टी के लिए भी काफी अहम है।
SIKH GURUDWAR IN PAKISTAN
गुरुद्वारा करतार पुर साहिब – Gurdwara Kartarpur Sahib
गुरुद्वारा करतार पुर साहिब भारत और पाकिस्तान के बीच एक मैत्रीपूर्ण रिश्ता स्थापित करने के लिए भी प्रसिद्ध है। आजादी के बाद पंजाब का नारोवाल जिला पाकिस्तान के हिस्से में चला गया था। नारोवाल में ही रावी नदी के तट पर स्थित है गुरुद्वारा करतार पुर साहिब। पाकिस्तान के कट्टरपंथियों से बचे कुछ गुरुद्वारों में एक ये गुरुद्वारा भी है। करतारपुर में जिस स्थान पर ये गुरुद्वारा है, ये स्थान प्रथम गुरु गुरु नानक देव जी से जुड़ा है। जब गुरु साहिब ने अपनी उदासियां समाप्त की थी तब 1521 में वो करतार पुर में आकर रहने लगे थे। जहां उन्होंने अपने जीवन के 18 साल बिताए थे, और वो इसी स्थान पर सचखंड चले गए थें।
गुरुद्वारा करतार पुर साहिब भारत के डेरा बाबा नानक जो कि गुरदासपुर में है, से महज 4.5 किमी दूर पर ही स्थित हैं। गुरुद्वारा की वर्तमान संरचना का निर्माण साल 1925 में पटियाला के महाराजा भूपेंद्र सिंह ने करवाया था। इस गुरुद्वारे में लंगर हॉल, पुस्तकालय, और बड़ा संग्रहालय है जिसमें प्रथम गुरु के जीवन से जुड़े चीजों और घटनाओं का वर्णन है। भारत में इसकी महत्ता को देखते हुए पाकिस्तान सरकार भी इसका संरक्षण करती है।
गुरुद्वारा श्री पंजा साहिब – Gurdwara Shri Panja Sahib
पाकिस्तान के हसन अब्दाल का एक मशहूर गुरुद्वारा गुरुद्वारा श्री पंजाब साहिब असल में सिखों के एक महान और बहादुर लड़ाके हरि सिंह नलवा से जुड़ी से जुड़ी है। ये पाकिस्तान में रावलपिंडी से 48 किमी दूर है। उन्होंने ही इस स्थान को पंजा साहिब नाम दिया था। कहा जाता है कि प्रथम गुरु साहिब जब अपनी अंतिम उदासी पूरी करके लौट रहे थे जब वो 1521 के आस पास भाई मरदाना के साथ हसन अब्दाल पहुंचे थे। जहां उन्होंने एक घने पेड़ के नीचे बैठ कर भजन शुरु कर दिया। इस दौरान उन्हें प्यास लगी तो भाई मरदाना वहां के शाह वली कंधारी से पानी मांगने गए लेकिन उसने भी मरदाना को अपमानित किया।
जिसके बाद वो गुरु साहिब के पास आये और सारा वृतांत बताता, जिसके बाद गुरु साहिब ने पास के पत्थर पर जोर से पंजा मारा, जिससे वहां से पानी निकलने लगा था, लेकिन उससे गुस्साए शाह ने एक चट्टान गुरु साहिब की तरफ लुढ़का दी, लेकिन गुरु साहिब ने अपना हाथ उठा कर पत्थर को हवा में रोक दिया.. लेकिन चट्टान पर पंजा का निशान बन गया.. आज भी ये पंजे का निशान चट्न पर मौजूद है औऱ इसके आप पास तालाब बना हुआ है।
इसके बाद हरि सिंह नलवा ने महाराजा रणजीत सिंह के सानिध्य में गुरु द्वारा श्री पंजाब साहिब का निर्माण कराया था। इस गुरुद्वारे में 24 घंटे लंगर चलता है। इसके सरोवर संगत आकर स्नान करते हैं, जिससे वो अलग तरह की पवित्रता महसूस करते है। ये गुरुद्वारा काफी भव्य है, जिसकी देखभाल काफी अच्छे से की जाती है।
गुरुद्वारा जनम स्थान ननकाना साहिब – Gurdwara Janam Asthan Nankana Sahib
सिखों के प्रथम गुरु गुरु नानक देव जी के जन्म स्थान से जुड़ा गुरुद्वारा जनम स्थान नानकाना साहिब पाकिस्तान के लाहौर से करीब 80 किलोमीटर दूर ननकाना साहिब शहर में मौजूद है। इस शहर को पहले राय भोई दी तलवंडी नाम से जाना जाता था। जिसे बाद में ननकाना साहिब नाम से बुलाया गया। इस स्थान पर गुरु साहिब का बचपन बीता था, इसलिए सिखो के लिए ये एक प्रमुख स्थान है।
माना जाता है कि इस गुरुद्वारे का निर्माण असल में पहले 16वीं सदी में गुरु नानक के पोते बाबा धरम चंद ने शुरू करवाया था, लेकिन मौजूदा संरचना शेर एक पंजाब रणजीत सिंह जी ने बनवाया था। जिसकी देखभाल फिलहाल पाकिस्तान सिख गुरुद्वारा प्रबंधक समिति करती है। मौजूदा समय में गुरुद्वारा कॉम्प्लेक्स पंजाब के पुरातत्व विभाग के संरक्षित विरासत स्मारकों में शामिल है।
गुरुद्वारा डेरा साहिब श्री गुरु अर्जन देव – Gurdwara Dera Sahib Sri Guru Arjan Dev
पाकिस्तान की आर्थिक राजधानी लाहौर में मौजूद है एक और भव्य गुरुद्वारा, गुरुद्वारा डेरा साहिब। ये गुरुद्वारा सिखों के पांचवे गुरु गुरु अर्जन देव जी की शहीदी को समर्पित है। सिक्खी इतिहास के अनुसार 1606 में मुगल सम्राट जहांगीर के आदेश पर पांचवे गुरु को तमाम यातनायें दी गई थी। जहां गुरूद्वारा लाल खोही बनाया गया था, हालांकि अब इसे बदल कर एक मुस्लिम तीर्थ बना दिया गया है।
गुरु साहिब के परम मित्र मियां मीर के कहने पर उन्हें पांचवे दिन नदी में स्नान करने की इजाजत दी गई थी, लेकिन वो फिर नदी से बाहर ही नहीं आये। उनके बेटे और छठे गुरु गुरु हरगोबिंद साहिब ने 1619 में यहां पर अपने पिता को समर्पित करते हुए स्मारक बनवाया था। जिसे गुरुद्वारा डेरा साहिब कहा गया। जिसे बाद में महाराज रणजीत सिंह ने विस्तार किया था। जिसमें इस पर सोने का गुंबद बनवाया गया था। गुरुद्वारा डेरा साहिब में महाराजा रणजीत सिंह जी की समाधि मौजूद है।
गुरुद्वारा काली देवी – Gurdwara Kali Devi
गुरुद्वारा काली देवी, पाकिस्तान का ऐसा गुरुद्वारा है, जिसकी संरचना हिंदू मंदिर की तरह ही है। ये गुरुद्वारा पाकिस्तान के डेरा इस्माइल खान में टोपन वाला चौराहे के पास मेन रोड पर स्थित है। ये गुरुद्वारा कभी एक मंदिर हुआ करता था, जो कि काली देवी का था, लेकिन कहा जाता है कि जब गुरु नानक देव जी इस स्थान पर आये तो ये मंदिर की मूर्ति अचानक अपने आप गिर गई। बार बार उठाने पर भी मूर्ति बार बार गिर जाती, जिससे मंदिर का पुजारी काफी क्रोधित हो गया कि गुरु नानक देव जी के आने मूर्ति गिर रही है।
उनसे मिलने चला गया, लेकिन जब वो गुरु साहिब से मिला तो उनके प्रवचन सुनकर उनकी मुरीद बन गया, औऱ सिक्खी की राह पर चलते हुए मूर्ति पूजा को बंद कर गुरु की सेवा में लग गया। इस कारण इस मंदिर में सिख संगत हुआ करते थे, लेकिन पूजा नहीं..और इस कारण इस मंदिर का नाम बदल कर गुरुद्वारा काली देवी कर दिया गया। ये आज भी काफी फेमस गुरुद्वारा है।
पाकिस्तान में आज भी करीब 100 गुरुद्वारे मौजूद है लेकिन उनमें से कुछ की ही देखभाल हो पाती है..और बाकि खंडहर में तब्दील हो रहे है। जो दुनियाभर के सिखों के लिए बेहद दुख पहुंचाने वाली बात है। क्या आपने इनमें से किसी गुरुद्वारे का भ्रमण किया है।



























