Baba Lal Das: 16 नवंबर 1993 की वह रात अयोध्या से सिर्फ 20 किलोमीटर दूर, रानीपुर छत्तर गांव में कभी नहीं भुलाई जाएगी। उस रात लाल दास, जो राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और विश्व हिंदू परिषद के मुखर विरोधी थे, गोलियों का शिकार हो गए। उनकी हत्या आज भी रहस्य बनी हुई है और पुलिस ने इसे जमीन विवाद तक ही सीमित बता कर बंद कर दिया। लेकिन लाल दास की कहानी सिर्फ हत्या तक सीमित नहीं थी। वह राम जन्मभूमि विवाद में भी एक महत्वपूर्ण मोड़ थे… एक ऐसा मोड़ जिसने अयोध्या के इतिहास और सांप्रदायिक माहौल को हमेशा के लिए बदल दिया।
विवादित मंदिर के प्रधान पुजारी का जीवन (Baba Lal Das)
द वायर की एक रिपोर्ट के मुताबिक, 1981 में अदालत ने उन्हें विवादित राम जन्मभूमि मंदिर के प्रधान पुजारी के रूप में नियुक्त किया, जो बाबरी मस्जिद के केंद्रीय गुंबद के नीचे स्थित था। लाल दास को वामपंथी रुझान वाला माना जाता था और उन्होंने 1984 में वीएचपी द्वारा शुरू किए गए राम जन्मभूमि आंदोलन का विरोध शुरू से ही किया।
बाबा लालदास वे अयोध्या की हनुमानगढ़ी के महंत (मुख्य पुजारी) थे ।
लेकिन उनकी हत्या 1993 में कर दिया ।
क्योंकि वह वही बात बोल रहा था जो आज देश की 40% जनता बोल रही है ।
कुछ लोगों के धार्मिक दंगे धर्म के लिए नहीं वोट बैंक के लिए जरूरी है । pic.twitter.com/ZS0kuIGk7N
— ashokdanoda (@ashokdanoda) January 28, 2026
1991 में भाजपा ने उत्तर प्रदेश विधानसभा के 419 में से आधे से ज्यादा सीटें जीतकर कल्याण सिंह को मुख्यमंत्री बनाया। इस दौरान वीएचपी ने मंदिर निर्माण में बाधा डालने वालों की पहचान की और लाल दास को इसका “दूसरा अंतिम अवरोध” माना गया। बाबरी मस्जिद ही आखिरी अवरोध थी।
मार्च 1992 में कल्याण सिंह सरकार ने लाल दास को पद से हटा दिया। उनकी जगह महंत सत्येंद्र दास को नियुक्त किया गया, जो आज भी राम जन्मभूमि मंदिर के प्रधान पुजारी हैं। महंत सत्येंद्र दास ने कहा, “लाल दास को भ्रष्टाचार के आरोपों और विवादास्पद स्थिति के कारण हटाया गया। इसके बाद उनका अयोध्या में कोई महत्व नहीं रहा। वह काफी समय से मृत हैं।”
न्यायालय में लंबित मामला
लाल दास ने अपनी बर्खास्तगी के खिलाफ लखनऊ हाईकोर्ट में केस दायर किया, जो आज भी लंबित है। यह केस उनके जीवन में संघर्ष और अयोध्या में धार्मिक-सांप्रदायिक जटिलताओं की याद दिलाता है।
सांप्रदायिक सौहार्द के संरक्षक
अवध की गंगा-जमुनी तहजीब में पलने वाले लाल दास ने राम मंदिर आंदोलन को केवल राजनीति और भावनाओं का साधन माना। उन्होंने अक्सर यह बताया कि अयोध्या के अधिकांश मंदिर मुस्लिम शासकों की मदद से बने और हिंदू पुजारी तथा मुस्लिम पिरों ने 1855 की आगजनी के बाद मिल-जुलकर सह-अस्तित्व बनाए रखा।
हनुमानगढ़ी के महंत ज्ञान दास, जो खुद को ‘सिक्युलर संत’ कहते हैं, ने लाल दास के बारे में कहा, “वे अच्छे इंसान थे, लेकिन बाबरी मस्जिद के विध्वंस के बाद उनके दुश्मनों ने उन्हें मार दिया।” लाल दास का संदेश, धर्म और समुदाय से ऊपर उठकर मानवता और सह-अस्तित्व आज भी उतना ही महत्वपूर्ण है।
सुप्रीम कोर्ट का फैसला और वर्तमान परिप्रेक्ष्य
हालिया सुप्रीम कोर्ट के फैसले में विवादित जमीन (2.77 एकड़) राम लल्ला विराजमान को सौंपी गई। लाल दास का संघर्ष अब इतिहास का एक छोटा नोट बन गया है। आज अयोध्या के कोई भी पुजारी ‘मंदिर वहीं बनाएंगे’ के डॉमिनेंट नारों के खिलाफ बोलने की हिम्मत नहीं दिखा रहा। सुप्रीम कोर्ट के फैसले ने इस नार को कानूनी मान्यता दी, जिससे वीएचपी और आरएसएस की नीति में किसी भी तरह का विचलन असंभव लग रहा है।
फैसले के दिन हजारों पुलिसकर्मी और केंद्रीय अर्धसैनिक बल तैनात किए गए। स्थानीय प्रशासन ने किसी भी सांप्रदायिक तनाव को रोकने में सफलता पाई।
रोजमर्रा की जिंदगी में तनाव
फैसले के बावजूद अयोध्या की गलियों में तनाव नजर आया। उदाहरण के लिए, आशरफी भवन के पास दो हिंदू बहनों ने आठ साल के पड़ोसी को डांटा क्योंकि उसने फैसले पर सवाल उठाया। यह दिखाता है कि फैसले के बाद भी कस्बे में समुदायिक दृष्टिकोण और विरोधाभास बने हुए हैं।
मुस्लिम समुदाय का रुख
अवध पीपल्स फोरम के संयोजक अफाकुल्लाह कहते हैं, “हिंदुओं को अब कोई शिकायत नहीं रह गई। उन्हें मंदिर और जमीन मिल गई। फैसला अच्छा या बुरा इस बात पर निर्भर करेगा कि बहुसंख्यक समुदाय आगे क्या करता है।” मुस्लिम समुदाय के नेता हाजी महबूब और इकबाल अंसारी ने भी फैसला रिव्यू न कराने की घोषणा की।
लाल दास की याद और संदेश
अयोध्या में आज लाल दास का जीवन लगभग भुला दिया गया है, लेकिन उनका संदेश सांप्रदायिक सौहार्द और सह-अस्तित्व आज भी उतना ही महत्वपूर्ण है। सुप्रीम कोर्ट का फैसला विवाद को समाप्त करने की दिशा में एक कदम है, लेकिन लाल दास की तरह बहादुर और निष्पक्ष आवाज़ की आवश्यकता हमेशा रहेगी। उनका जीवन यह याद दिलाता है कि धर्म, जाति और समुदाय से ऊपर उठकर समाज में शांति और सह-अस्तित्व बनाए रखना कितना जरूरी है।
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