Sikhism in Assam: जब सिख धर्म में धर्म की रक्षा और परोपकार के लिए अपने प्राणों को न्योछावर करने की बात होती है तो हर एक सिख तत्पर रहता है।। धर्म की रक्षा और अपने धर्म की महानता को दर्शाने के लिए सिख गुरुओं के बलिदान के किस्से बहुत सुने होंगे लेकिन आज हम आपको एक ऐसे गुरुद्वारे के बारे में बताने जा रहे है, जो प्रतीक है सिख गुरु की निष्ठा और भक्ति की। उनकी आध्यात्मिकता की शक्ति की, जिसमें दम पर उन्होंने न केवल काली शक्ति करने वाली एक जादूगरनी को हराया बल्कि उस जादूगरनी को भी सिख धर्म का अनुयायि बनने के लिए प्रेरित किया। जी हां, अपने इस वीडियो में हम बात करेंगे असम के धुबरी में मौजूद गुरुद्वारा श्री गुरु तेग बहादुर साहिब के बारे में, जो करीब 300 सालों का इतिहास अपने में समेटे हुए है, जो गवाह है सिख धर्म के बढ़ते वर्चस्व का।। ये गुरुद्वारा ही वजह है असम में बसे सिखो के यहां रहने की।।
असम में सिख धर्म की शुरुआत
असम में सिख धर्म और सिखों को मानने वालों में ज्यादातर आबादी असल में पंजाबी सिखो की है ही नहीं। दरअसल असम के ज्यादातर सिख बर्मा वर्तमान में म्यांमार से विस्थापित होकर असम में आए सिख है। जिन्होंने 1931 के बाद से बर्मा से भागकर असम आना शुरू कर दिया था। ये लोग असम के धुबरी इलाके में रहने लगे थे। जहां आज भी सबसे ज्यादा असमिया सिखो की आबादी है। जो कि पंजाब की सिख परंपरा को नहीं बल्कि असमी परंपरा को मानते है। इन्हीं लोगों ने अपने सिख धर्म को परंपरा और संस्कृति को बनाए रखने के लिए असम का पहला सिख गुरुद्वारा बनवाया था जिसे खुद सिखो के नौवें गुरु गुरु तेग बहादुर साहिब ने अपनी असम यात्रा के दौरान धुबरी में ब्रह्मपुत्र नदी के किनारे बनवाया था।
क्या है इतिहास गुरुद्वारा गुरु तेग बहादुर साहिब का?
सिख इतिहासकारों की माने तो सिखो के पहले गुरु गुरु नानक देव जी जब अपनी उदासियों पर निकले थे तब 1505 में वो ढाका से असम आते वक्त धुबरी के ब्रह्मपुत्र नदी के किनारे रुके थे जहां उनकी मुलाकात महापुरुष श्रीमंत शंकरदेव से मिले थे। इसके बाद नौवें गुरु गुरु तेग बहादुर जी भारत के कई उन स्थानों पर गए थे जहां गुरु नानक देव जी अपनी उदासियों के दौरान गए हुए थे। इसी कड़ी में गुरु तेग बहादुर असम के धुबरी में ब्रह्मपुत्र नदी के किनारे पहुंचे थे। यहां वो उन्होंने सिख धर्म के बारे में अपने विचार रखें थे, जिन्हें सुनने के लिए सैकड़ों लोग आते थे।
गुरु साहिब को नुकसान पहुंचाने के इरादे से काला जादू किया
कहा जाता है कि उनकी प्रसिद्धि इतनी हो गई थी कि उनके साथ कुछ जादुई घटनाएं होने लगी। कहां जाता है कि एक बार एक काला जादू करने वाली ने गुरु साहिब को नुकसान पहुंचाने के इरादे से काला जादू किया था लेकिन गुरु साहिब पर उसका कोई असर नहीं हुआ, जिसे देख कर जादूगरनी ने उनके आगे सिर झुका दिया और उनकी अनुयायि बन गई। अपनी प्रवास के दौरान ही 17वी सदी में गुरु साहिब गुरुद्वारा गुरु तेग बहादुर साहिब जी का निर्माण कराया था। तब से ही ये गुरुद्वारा सिखों के लिए उनकी धार्मिक मान्यताओं और संस्कृति की मिसाल के रूप में स्थापित है।
हर साल दिसंबर के महीने में गुरु साहिब की शहादत की याद में यहां एक विस्तार मेले का आयोजन किया जाता है जिसमें सिख श्रद्धालु गुरु तेग बहादुर जी के शहादत दिवस को ‘शहीदी-गुरु-पर्व’ के रूप में मनाने के लिए यहाँ इकट्ठा होते हैं। असम का ये गुरुद्वारा यहां पर धार्मिक सौहार्द और शांतिपूर्ण दिव्य वातावरण के लिए जाना जाता है। असम में मौजूद इस ऐतिहासिक गुरुद्वारे की कहानी आपको कैसी लगी हमें कमेंट करके जरूर बताएं।






























