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इन 5 युद्धों ने हमेशा के लिए बदल कर रख दिया था गुरु हरगोविंद सिंह जी का जीवन

vickynedrick@gmail.com | Nedrick News

Published: 09 Sep 2023, 12:00 AM | Updated: 09 Sep 2023, 12:00 AM

Top 5 Battles of Guru Hargobind Singh Ji – हम सब जानते है कि सिखों को उनकी जुबान, कृपान और धर्म के प्रति समर्पण के कारण जानते है. लेकिन क्या आप जानते है कि सिखों अपने पास कृपान क्यों रखते है ? क्यों सिखों के गुरुओं ने हथियार उठाएं ? अगर नहीं … तो आईये आज हम आपको बताएंगे ऐसा क्यों है. दोस्तों, वर्तमान में सिख अपने गुरुओं द्वारा दिए गए आचारों-विचारों पर चल रहे है. हम आपको बता दे कि शुरुवात में सिखों के गुरु हथियार नहीं उठतें थे. उनका मानना था कि शांति और अहिंसा से सभी काम किए जा सकते है लेकिन सिखों के छठें गुरु, गुरु हरगोविंद साहिब जी ने धर्म की रक्षा के लिए हथियार उठाए.

उन्होंने इसकी चलते अपने  जीवन में बहुत सी लड़ाई भी लड़ी..  गुरु जी की युद्ध रणनीति मुगलों को चुनौती देने और उनसे सीधे लड़ने की थी. इसके साथ ही जनता के रक्तपात से बचना था. इसके बाद भी बड़ी संख्या में बहादुर सिख और मुग़ल सैनिक मारे गए. क्यों कि कोई भी अकेला मुग़ल सम्राट गुरु का सामना नहीं करना चाहता था. उन्होंने सिखों के सामने मुगल सैनिकों को ला खड़ा कर दिया जिसके चलते बहुत ज्यादा रक्तचाप हुआ. गुरु हरगोविंद सिंह जी ने मुगलों के खिलाफ पांच बहुत प्रमुख लड़ाईयां लड़ी है.

और पढ़ें : जानिए गुरु गोविंद सिंह जी के अंतिम पलों की कहानी 

सिखों के छठे गुरु, गुरु हरगोविंद सिंह जी द्वारा लड़ी गई महत्वपूर्ण लड़ाइयाँ

अमृतसर की लड़ाई – Battles of Guru Hargobind Ji

अमृतसर की लड़ाई, सिखों के छठें गुरु, गुरु हरगोविंद सिंह जी और मुगलों की सेना के बीच 5 जून, 1628 में हुई थी. जब 1627 में, सम्राट जहांगीर की मृत्यु हो गयी थी. और उनका पुत्र शाहजहाँ उनका उतराधिकारी बन गया था. उस समय सिखों के बढ़ते प्रभाव और शक्ति के चलते सिखों के खिलाफ दुर्भावना रखने वाले लोगों ने, मुग़ल सम्राट शाहजहाँ को चेतावनी दी. इसीलिए मुगलों ने गुरु हरगोविंद सिंह जी के खिलाफ जंग शुरू की. मुगलों और गुरु जी के बीच पहली सशक्त लड़ाई में गुरु हरगोविंद सिंह जी की जीत हुई.

हरगोबिंदपुर की लड़ाई :

हरगोबिंदपुर की लड़ाई, गुरु हरगोविंद सिंह जी की दूसरी लडाई थी. जिसमे गुरु हरगोबिंद और उनके सिख साथियों ने जालंधर के मुग़ल गवर्नर अब्दुल्ला खान  सेना से लड़ाई की थी. यह ऐतिहासिक युद्ध सितम्बर 1629 में हुआ था. यह लड़ाई रुहेला गांव के पास लड़ी गई थी जहां गुरु हरगोविंद सिंह जी और उनके योद्धाओं ने तुर्की सरदारों और गवर्नर अब्दुल्ला खान की मुगल सेना को हराया था. इस जीत के बाद जिस जगह लड़ाई गयी थी, वह श्री हरगोबिंदपुर शहर बन गया.

गुरुसर की लड़ाई – Battles of Guru Hargobind Ji

गुरुसर की लडाई, गुरु हरगोविंद सिंह जी की तीसरी लड़ाई थी. जो 1631 में, गुरु हरगोविंद सिंह जी और मेहराज के पास लाल बेगम और कमर बेगम  के साथ लड़ी गई. इतिहास में इस लड़ाई को मुगलों की बहुत बुरी हार मानी जाती है. यह लड़ाई सर्दियों के मौसम में लड़ी गई थी और गुरु जी की सेना की संख्या 4000 थी जबकि मुगलों की संख्या 35,000 थी. गुरु जी ने पूरे युद्ध की योजना पहले ही बना ली थी, और युद्ध की तैयार की थी. दूसरी तरफ मुगलों ने युद्ध के लिए अच्छी योजना नहीं बनाई थी, क्योंकि वे उस क्षेत्र की परिस्थितियों से पूरी तरह परिचित नहीं थे. पियारा सिंह पदम के अनुसार, यह लड़ाई 1634 में हुई थी. लेकिन ज्ञानी ज्ञान सिंह के अनुसार, यह लड़ाई 1631 में हुई थी. यह तिथि अधिक स्वीकार्य प्रतीत होती है.

करतारपुर की लड़ाई :

करतारपुर की लड़ाई का कारण पठान पेंदे खान था, जो गुरु का वफादार दोस्त और समर्थक था. गुरु जी के विरोध होकर वह पहले जुलुंधुर के सूबेदार कुतुब खान के पास गया, वह दोनों सम्राट के दरबार गए. और सम्राट को सिख गुरु के खिलाफ़ कर दिया. जिसके चलते मुगलों ने करतारपुर पर हमला कर दिया था. मुग़ल सम्राट ने गुरु के विरुद्ध एक मजबूत सेना भेजी. मुखलिस खान के भाई काले खान को पचास हजार सैनिकों की कमान सौंपी गई. सिख रक्षकों द्वारा मुग़ल सेना को खदेड़ दिया गया. यह लड़ाई वर्तमान पंजाब जिले के करतारपुर इलाके में हुई थी. यह लडाई लगातार 24 दिन चलती रही. 1634 में हुई यह लड़ाई इतिहास के पन्नों में यादगार लड़ाईयों में गिनी जाती है.

किरतपुर की लड़ाई :

किरतपुर की लड़ाई सिखों के छठें गुरु, हरगोविंद सिंह जी और रोपड़ के शासक के बीच लड़ी गयी थी. जब गुरु जी कुरूक्षेत्र छोड़ कर किरतपुर जाते समय वह पोवाड थे, तो पोवाड के कुछ स्थानीय शासक और पठान गुरु जी पर हमला करने की योजना बनाते है. लेकिन कुछ सिखों को उनकी योजना के बारे में पता चल जाता है वह उनके ऊपर पहले हमला करके उनकी योजना को खराब कर देते है. गुरु जी वह आने पर शहीद सिखों को आशीर्वाद देते है.

और पढ़ें : जानिए क्यों ‘शेर-ए-पंजाब’ को सुनाई गई थी 100 कोड़े मारने की सजा

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