Year Ender 2025: साल 2025 भारतीय राजनीति के लिए सिर्फ घटनाओं की एक और कड़ी नहीं रहा, बल्कि यह ऐसा साल बन गया जब सियासत बार-बार अपनी सीमाएं लांघती दिखी। कभी देश आतंक के खिलाफ एक सुर में खड़ा नजर आया, तो कभी सत्ता, चुनाव और संस्थाओं को लेकर तीखी जंग छिड़ी। ऑपरेशन सिंदूर ने जहां राजनीतिक खांचों को कुछ वक्त के लिए मिटा दिया, वहीं वोट चोरी के आरोप, उपराष्ट्रपति का अचानक इस्तीफा और न्यायपालिका से जुड़े विवादों ने लोकतंत्र की संवेदनशील परतों को सामने ला दिया।
यह साल बताता है कि भारत की राजनीति अब सिर्फ संसद और चुनावी मैदान तक सीमित नहीं रही उसकी गूंज सीमा पार कूटनीति, अदालतों के गलियारों और आम नागरिक की सोच तक सुनाई दी।
ऑपरेशन सिंदूर: जब राजनीति से ऊपर उठकर देश एकजुट हुआ | Year Ender 2025
2025 की सबसे बड़ी और सबसे चर्चित घटना ऑपरेशन सिंदूर रही। यह सिर्फ एक सैन्य कार्रवाई नहीं थी, बल्कि एक ऐसा क्षण था जब देश की राजनीति ने दुर्लभ एकजुटता दिखाई। जम्मू-कश्मीर के पहलगाम में 22 अप्रैल को हुए आतंकी हमले ने पूरे देश को झकझोर दिया। लश्कर से जुड़े आतंकी संगठन TRF के आतंकियों ने 26 पर्यटकों से उनका धर्म पूछकर गोली मार दी थी। इस घटना ने देश में गुस्से और शोक दोनों की लहर दौड़ा दी।
इसके जवाब में 6 और 7 फरवरी की रात भारत ने ऑपरेशन सिंदूर शुरू किया। यह केंद्र में बीजेपी सरकार के कार्यकाल की तीसरी बड़ी सर्जिकल स्ट्राइक थी। उरी और बालाकोट के बाद पाकिस्तान के खिलाफ यह सबसे बड़ा एक्शन माना गया। इस ऑपरेशन में पाकिस्तान के अंदर बने कई आतंकी ठिकानों को तबाह किया गया और 125 से ज्यादा आतंकियों के मारे जाने की जानकारी सामने आई।
ऑपरेशन के बाद पाकिस्तान से बातचीत के जरिए सीजफायर लागू किया गया। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने दावा किया कि सीजफायर कराने में उनकी मध्यस्थता रही, लेकिन भारत सरकार ने इस दावे को पूरी तरह खारिज कर दिया। इसी मुद्दे पर देश के अंदर सियासत तेज हो गई। विपक्ष ने सरकार से जवाब मांगा, संसद का विशेष सत्र बुलाने की मांग उठी और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर लगातार सवाल किए गए।
हालांकि विशेष सत्र नहीं बुलाया गया, लेकिन जब संसद चली तो ऑपरेशन सिंदूर पर चर्चा जरूर हुई। इस पूरे घटनाक्रम में एक दिलचस्प पहलू यह भी रहा कि भारत का पक्ष दुनिया के सामने रखने के लिए सत्ता पक्ष और विपक्ष के सांसदों की अलग-अलग टीमें बनाकर विदेश भेजी गईं। यह भारतीय लोकतंत्र में कम ही देखने को मिलता है।
इस मुद्दे पर कांग्रेस नेता शशि थरूर सरकार के रुख के साथ खड़े दिखे, जो उनकी पार्टी को पसंद नहीं आया। तृणमूल कांग्रेस भी शुरुआत में सरकार पर हमलावर रही, लेकिन बाद में वह भी राष्ट्रीय हित के नाम पर साथ आती दिखी। सरकार का कहना साफ रहा कि ऑपरेशन सिंदूर सिर्फ होल्ड किया गया है, खत्म नहीं हुआ है।
2025 के विधानसभा चुनाव: नतीजे जो सबको चौंका गए
2025 में देश की दो अहम विधानसभाओं दिल्ली और बिहार में चुनाव हुए और दोनों के नतीजों ने सियासी समीकरणों को हिला दिया। बिहार में नीतीश कुमार की सत्ता में वापसी तो अहम रही ही, लेकिन उससे भी ज्यादा चर्चा विपक्षी राष्ट्रीय जनता दल के सिमटने की रही। तेजस्वी यादव की आरजेडी महज 25 सीटों पर रह गई। यह नतीजा कई मायनों में 2014 के लोकसभा चुनाव की याद दिलाता है, जब विपक्ष पूरी तरह बिखरा नजर आया था। हालांकि आरजेडी को इतनी सीटें जरूर मिलीं कि तेजस्वी यादव नेता प्रतिपक्ष बन सके।
दिल्ली विधानसभा चुनाव में तो तस्वीर ही बदल गई। आम आदमी पार्टी को हराकर भारतीय जनता पार्टी ने राजधानी की सत्ता पर कब्जा कर लिया। रेखा गुप्ता मुख्यमंत्री बनीं और अरविंद केजरीवाल का राजनीतिक सफर एक तरह से उसी अंदाज में खत्म हुआ, जिस अंदाज में 2013 में शुरू हुआ था। तब उन्होंने शीला दीक्षित को हराया था, और इस बार खुद अपनी सीट से हार गए। मनीष सिसोदिया जैसे बड़े चेहरे भी हार की सूची में शामिल रहे।
ट्रंप टैरिफ और रूसी तेल: विदेश नीति पर दबाव की सियासत
2025 में भारत की विदेश नीति भी घरेलू राजनीति का बड़ा मुद्दा बनी। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने कई देशों पर टैरिफ लगाए, लेकिन भारत के मामले में स्थिति ज्यादा संवेदनशील रही। ऑपरेशन सिंदूर पर उनके सीजफायर वाले दावे को भारत द्वारा खारिज किए जाने के बाद 27 अगस्त से भारत पर टैरिफ बढ़ाकर 50 फीसदी कर दिया गया।
ट्रंप प्रशासन ने इसे रूस से तेल आयात की ‘सजा’ बताया और कहा कि इससे पुतिन को यूक्रेन युद्ध के लिए पैसा मिल रहा है। विपक्ष ने इस मुद्दे को लेकर मोदी-ट्रंप दोस्ती पर सवाल उठाए और सरकार की विदेश नीति पर हमला बोला।
हालांकि जमीनी हकीकत कुछ और ही रही। ट्रंप टैरिफ का भारतीय अर्थव्यवस्था पर खास असर नहीं दिखा। नवंबर में निर्यात के आंकड़ों में बड़ा उछाल देखने को मिला और आयात में गिरावट दर्ज की गई। अमेरिकी बाजार में भारतीय उत्पादों की मांग बनी रही, भले ही कीमतें बढ़ीं। साल के अंत तक रूस से तेल आयात में भी काफी कमी आई।
वक्फ (संशोधन) अधिनियम: कानून और विरोध साथ-साथ
8 अप्रैल 2025 से देश में वक्फ (संशोधन) अधिनियम लागू हो गया। यह बिल 2 अप्रैल को लोकसभा और 3 अप्रैल को राज्यसभा से पास हुआ था, जबकि 5 अप्रैल को राष्ट्रपति की मंजूरी मिली। सरकार का कहना है कि इस कानून का मकसद वक्फ संपत्तियों के प्रबंधन में पारदर्शिता लाना, मुस्लिम समुदाय के अलग-अलग वर्गों की भागीदारी बढ़ाना और सामाजिक कल्याण को मजबूत करना है। लेकिन कई मुस्लिम संगठनों और विपक्षी दलों ने इसका विरोध किया।
कानून की संवैधानिकता को चुनौती देते हुए सुप्रीम कोर्ट में दर्जन भर याचिकाएं दाखिल हुईं, लेकिन 15 सितंबर को कोर्ट ने इस पर रोक लगाने से इनकार कर दिया।
नए कानून के तहत अब वक्फ बोर्ड को किसी संपत्ति को वक्फ घोषित करने से पहले सत्यापन करना होगा। जिला कलेक्टर को सर्वे और स्वामित्व तय करने का अधिकार मिला है। बोर्ड और केंद्रीय वक्फ परिषद में गैर-मुस्लिम सदस्यों और कम से कम दो महिलाओं को शामिल करना अनिवार्य किया गया है। विवाद की स्थिति में अब ट्रिब्यूनल के फैसले के खिलाफ हाईकोर्ट में अपील का रास्ता भी खुल गया है।
उपराष्ट्रपति जगदीप धनखड़ का अचानक इस्तीफा
21 जुलाई 2025 को देश की राजनीति उस वक्त चौंक गई, जब उपराष्ट्रपति जगदीप धनखड़ ने अचानक इस्तीफा दे दिया। उन्होंने इसकी वजह सेहत ठीक न होना बताया और इसके बाद सार्वजनिक तौर पर नजर नहीं आए।
उनकी गैरमौजूदगी को लेकर विपक्ष ने सरकार पर सवाल उठाए। नए उपराष्ट्रपति के चुनाव तक यह मुद्दा गरमाया रहा। आखिरकार 12 सितंबर को सीपी राधाकृष्णन ने उपराष्ट्रपति पद की शपथ ली और यह विवाद धीरे-धीरे शांत हो गया।
वोट चोरी और SIR विवाद: चुनाव आयोग कठघरे में
बिहार विधानसभा चुनाव से पहले चुनाव आयोग द्वारा कराए गए SIR यानी विशेष गहन पुनरीक्षण ने बड़ा विवाद खड़ा कर दिया। बिहार के बाद पश्चिम बंगाल समेत 12 राज्यों में यह प्रक्रिया शुरू हुई और भविष्य में पूरे देश में लागू करने की बात कही गई।
चुनाव के माहौल में बिहार में इसका सबसे ज्यादा विरोध हुआ। राहुल गांधी और तेजस्वी यादव ने वोटर अधिकार यात्रा निकाली और चुनाव आयोग पर वोट चोरी के आरोप लगाए। हालांकि चुनावी नतीजों में इसका कोई खास असर नहीं दिखा, लेकिन राहुल गांधी ने संसद और बाहर ‘वोट चोरी’ की मुहिम जारी रखी।
न्यायपालिका भी विवादों में रही
इसके अलवा, 2025 में न्यायपालिका से जुड़े कई घटनाक्रम चर्चा में रहे। 6 अक्टूबर को सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई के दौरान तत्कालीन CJI बीआर गवई पर एक वकील ने जूता फेंका। बार काउंसिल ने उस वकील का लाइसेंस सस्पेंड कर दिया।
14 मार्च को होली के दिन दिल्ली हाईकोर्ट के जज जस्टिस यशवंत वर्मा के घर आग लगने की घटना ने सनसनी फैला दी। आग बुझाने के दौरान अधजले नोट मिलने और बाद में 15 करोड़ रुपये कैश की खबर ने सवाल खड़े किए।
इलाहाबाद हाईकोर्ट के जज जस्टिस शेखर कुमार यादव अपने बयान को लेकर विवादों में रहे, वहीं मद्रास हाईकोर्ट के जज जस्टिस जीआर स्वामीनाथन के एक आदेश के बाद विपक्ष ने उनके खिलाफ महाभियोग की मांग कर दी। करीब 100 सांसदों के हस्ताक्षर वाला ज्ञापन लोकसभा स्पीकर को सौंपा गया।
2025 ने दिखा दिया कि भारतीय राजनीति सिर्फ चुनाव जीतने-हारने तक सीमित नहीं है। यह साल राष्ट्रहित में एकजुटता, सत्ता संघर्ष, संस्थागत बहस और लोकतांत्रिक संस्थाओं की परीक्षा सब कुछ साथ लेकर आया। विवाद भी रहे, सवाल भी उठे, लेकिन कुछ मौकों पर यह भरोसा भी बना कि जब बात देश की होती है, तो राजनीतिक मतभेद पीछे छूट सकते हैं।






























