US Israel War Iran: अमेरिका और इजरायल के हमलों के बीच ईरान अब अकेले लड़ रहा है। उसकी पुरानी साझेदारियां रूस और चीन भी इस जंग में खुलकर उसके समर्थन में नहीं हैं। सैन्य मदद या कोई ठोस कदम नहीं दिख रहा, केवल कड़ी निंदा और संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद (UNSC) में मीटिंग की मांग तक ही सीमित हैं। विशेषज्ञ इस दूरी के चार बड़े कारण बता रहे हैं।
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रूस की जंग से दूरी |US Israel War Iran
विशेषज्ञों के अनुसार रूस सीधे संघर्ष में कूदने के पक्ष में नहीं है। रूस और ईरान ने 2025 में रणनीतिक साझेदारी का समझौता किया था, लेकिन यह किसी सैन्य गठबंधन के रूप में नहीं है। क्रेमलिन प्रवक्ता ने कहा कि ईरान ने रूस से हथियार मांगने की कोई बात नहीं की। रूस खुद यूक्रेन युद्ध में उलझा हुआ है और नए मोर्चे पर जंग में शामिल होना नहीं चाहता। वर्तमान में वह केवल मध्यस्थ की भूमिका निभाने की कोशिश कर रहा है।
चीन का आर्थिक हितों को तरजीह
चीन ईरान का सबसे बड़ा तेल खरीदार है, लेकिन उसके लिए सऊदी अरब और UAE जैसे अन्य गल्फ देशों के साथ मजबूत आर्थिक संबंध भी महत्वपूर्ण हैं। यदि चीन खुलकर ईरान का समर्थन करता है, तो उसे अन्य महत्वपूर्ण व्यापारिक साझेदारों से दूरी बनानी पड़ सकती है। चीनी विशेषज्ञ युन सुन ने कहा, “हमले के बाद नई लीडरशिप के साथ काम करने को तैयार हैं, बशर्ते तेल की आपूर्ति और आर्थिक हित सुरक्षित रहें।” फिलहाल होर्मुज स्ट्रेट की स्थिति चिंताजनक है, लेकिन चीन अभी कोई सक्रिय कदम नहीं उठा रहा।
क्षेत्रीय संतुलन बनाए रखने की रणनीति
रूस और चीन दोनों चाहते हैं कि वे न केवल ईरान के साथ, बल्कि उसके विरोधियों के साथ भी संतुलन बनाए रखें। किसी एक पक्ष के साथ पूरी तरह जुड़ना उनके लिए जोखिम भरा हो सकता है। दोनों देश सीधे अमेरिका के सामने टकराव से बचना चाहते हैं। इसी कारण वे अभी केवल कूटनीतिक बयान और आलोचना तक ही सीमित हैं, मैदान में कोई कदम नहीं उठा रहे।
वैश्विक टकराव से बचने का कारण
विश्लेषकों का कहना है कि अगर रूस या चीन ईरान को सैन्य सहायता देते हैं, तो यह अमेरिका के साथ प्रत्यक्ष टकराव में बदल सकता है। ऐसे कदम दोनों देशों के लिए महंगे और जोखिम भरे हो सकते हैं। इसलिए फिलहाल उनका रुख केवल कूटनीतिक निंदा और UN में बैठक की मांग तक सीमित है। रूसी विदेश मंत्रालय ने भी कहा है कि “हमलों से तनाव कम होने के कोई संकेत नहीं दिख रहे हैं।”
ईरान की वर्तमान चुनौती
28 फरवरी को अमेरिकी-इज़राइली हमले के बाद ईरान ने मिसाइल और ड्रोन हमलों से जवाब दिया। लेकिन अब देश लगभग अकेले ही संघर्ष कर रहा है। रूस और चीन की दूरी ने ईरान की स्थिति और कमजोर कर दी है। यदि युद्ध लंबे समय तक चलता है और तेल की सप्लाई प्रभावित होती है, तो चीन को अपनी नीति पर पुनर्विचार करना पड़ सकता है। फिलहाल, रूस और चीन केवल बातचीत में लगे हैं और कोई ठोस कार्रवाई नहीं कर रहे।
ईरान के लिए यह समय बेहद चुनौतीपूर्ण है और क्षेत्रीय तनाव लगातार बढ़ता जा रहा है।
