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जानिए क्या है तख्त श्री दमदमा साहिब का इतिहास? कैसे मिला पांचवे तख्त का गौरव

vickynedrick@gmail.com | Nedrick News

Published: 05 Sep 2023, 12:00 AM | Updated: 05 Sep 2023, 12:00 AM

Takht Damdama Sahib History in Hindi – सिखों के लिए तख्त का आदेश सबसे ऊपर होता है. पूरे भारत में सिखों के पांच पवित्र तख़्त है, श्री अकाल तख्त साहिब अमृतसर, तख्त श्री दमदमा साहिब, तख्त श्री पटना साहिब, तख्त श्री केसगढ़ साहिब, तख्त श्री हजूर साहिब. इन तख्तों पर जत्थेदार नियुक्त किए जाते है. इन्ही में से एक तख्त श्री दमदमा साहिब तख्त जिनके बारे में आज हम बात करेंगे. इस कहानी की शुरुवात जब होती है जब सिखों के 10वें गुरु, गुरु गोविंद सिंह जी आनदंपुर साहिब तथा मुक्तसर साहिब के ऐतिहासिक युद्ध के बाद तलवंडी साबो की धरती पर पहली बाद 1706 में अपने चरण रखे थे. गुरु जी के आने से यह धरती पावन और ऐतिहासिक हो गई.

दोस्तों आज हम आपको हमारे इस लेख के जरिये सिखों के पांचों तख्त में तख़्त श्री दमदमा साहिब के निर्माण और महत्व के बारे में बताएंगे.

और पढ़ें : पांचों तख्त में क्यों सबसे अहम है श्री केशगढ़ साहिब ? 

कैसे हुआ तख़्त श्री दमदमा साहिब का निर्माण और महत्व

तख़्त श्री दमदमा साहिब की आलीशान इमारत का निर्माण 1965-66 में हुआ था. इस ऐतिहासिक स्थान का प्रबंध शिरोमणि गुरूद्वारा प्रबंधक कमेटी, 1960 में हुआ था. तख्त श्री दमदमा साहिब का क्षेत्रफल 30- 35 एड़ में फैला हुआ है.

हम आपको बता दे कि सिखों के 10वें गुरु, गोविंद सिंह ने जिस स्थान पर अपना कमर कसा खोलकर आराम किया था. लोगो का मानना है कि वह धरती पावन और पवित्र हो गयी और साथ ही गुरु की काशी तख्त श्री दमदमा साहिब के नाम से पूरे विश्व में प्रसिद्ध हो गयी. इस जगह पर गुरु गोविंद सिंह जी, श्री गुरु ग्रन्थ साहिब के प्रचार- प्रसार के लिए नौ महीने तक रुके थे. और यहा रह कर अनेकों धार्मिक ऐतिहासिक कार्यों को सम्मपूर्ण किया.

इस पवित जगह का चौधरी भाई डल्ला सिंह जी थे. जिसे गुरु जी ने अमृत की बख्शीश कर, सजाया था. और बाबा वीर सिंह, बाबा धीर सिख शिक्षक, की भरोसे की परीक्षा भी गुरुदेव ने यही ली थी. गुरु जी की कृपा में से वे लोग इस परीक्षा में पास हो गए. इसी पवित धरती पर ही गुरु गोविंद सिंह जी ने भाई मनी सिंह जी से श्री गुरु ग्रन्थ साहिब के पावन स्वरूप में गुरु पिता, गुरु तेगबहादुर जी की पवित्र वाणी दर्ज करायी था. जिसके बाद वह दमदमा स्वरूप कहलाई.

ऐसा भी कहा जाता है कि शहीदों के मिसाल के सरदार बाबा दीप सिंह जी के देख-रेख में पढ़ने, लिखने , गुरुवाणी के प्रचार-प्रसार के लिए यह टकसाल शुरू की गयी थी. जो दमदमी टकसाल के नाम से आज भी प्रसिद्ध हैं.

यह है सिखों का पांचवा तख्त

गुरु गोविंद सिंह जी जब इस स्थान से हजूर साहिब की ओर चले उस समय इस जगह का मुख्य प्रबंधक बाबा दीप सिंह जी को बनाया गया था. बाबा दीप सिंह जी काफी लम्बे समय तक इस स्थान की सेवा की. इस सेवा के दौरान बाबा जी ने श्री गुरु साहिब जी के पावन स्वरूप अपनी देख रेख में लिखवाये थे. जिसकी वजह से दमदमा साहिब सिख लेखों तथा ज्ञानियों के टकसाल की पहचान के रूप में जाने जाते है. इसीलिए इस पावन स्थान को सिखों के पांचवे तख्त का मन और सत्कार हासिल है.

यहा सुबह शाम ऐतिहासिक वस्तुओं के दर्शन संगत को करवाये जाते है. इस गुरुद्वारे में गुरु तेगबहादुर जी की तलवार, गुरू साहिब की निशाने वाली बंदूक रखे है. इस गुरूद्वारे के दरबार में गोल खंभों पर सोने का पत्तर चढा हुआ है. दरबार साहिब के बीचो-बीच श्री गुरू ग्रंथ साहिब विराजमान है. जो किसी भी गुरूद्वारे में सबसे महत्वपूर्ण है.

सिख धर्म के लोगों की सबसे पवित्र किताब गुरु ग्रन्थ सिंह साहिब है जिससे वह अपने गुरुओं के तरह ही पूजते है. गुरुओं के 10वें गुरु, गुरु गोविंद सिंह के कहने के अनुसार सिख गुरु ग्रन्थ साहिब की वनियों का आचार विचार करते है.

और पढ़ें : जानिए राजा मेदिनी ने क्यों मांगी थी गुरु गोविंद सिंह जी से उनकी तलवार

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