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Sonam Wangchuk detention: सोनम वांगचुक की NSA हिरासत पर सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई जारी, कपिल सिब्बल ने उठाए गंभीर सवाल

Nandani | Nedrick News

Published: 12 Jan 2026, 02:11 PM | Updated: 12 Jan 2026, 02:27 PM

Sonam Wangchuk detention: सुप्रीम कोर्ट में आज यानी 12 जनवरी को लद्दाख के सामाजिक कार्यकर्ता सोनम वांगचुक की राष्ट्रीय सुरक्षा अधिनियम (NSA), 1980 के तहत की गई गिरफ्तारी को चुनौती देने वाली याचिका पर सुनवाई जारी रही। यह याचिका उनकी पत्नी डॉ. गीतांजली आंग्मो ने दाखिल की है, जिसमें वांगचुक की हिरासत को गैरकानूनी बताते हुए उनकी रिहाई की मांग की गई है। लद्दाख में राज्य का दर्जा देने की मांग को लेकर हुए आंदोलन के दौरान हिंसा भड़कने के बाद सितंबर 2025 में वांगचुक को हिरासत में ले लिया गया था। इस मामले की सुनवाई जस्टिस अरविंद कुमार और पी. बी. वराले की बेंच वाली सुप्रीम कोर्ट कर रही है।

कपिल सिब्बल ने रखे तीन अहम तर्क (Sonam Wangchuk detention)

याचिकाकर्ता की ओर से सीनियर एडवोकेट कपिल सिब्बल ने अदालत के सामने तीन मुख्य दलीलें रखीं। उनका पहला और सबसे अहम तर्क यह था कि जिन चार वीडियो को आधार बनाकर सोनम वांगचुक को हिरासत में लिया गया, वे वीडियो उन्हें अब तक उपलब्ध नहीं कराए गए हैं। सिब्बल ने कहा कि जब तक पूरी सामग्री नहीं दी जाती, तब तक वांगचुक अपना प्रभावी बचाव नहीं कर सकते।

उन्होंने संविधान के अनुच्छेद 22(1) और 22(5) का हवाला देते हुए कहा कि हिरासत में लिए गए व्यक्ति को उसके खिलाफ लगाए गए कारणों की पूरी जानकारी मिलनी चाहिए और उसे कानूनी सलाह लेने का अधिकार भी है।

“कानूनी सलाहकार सिर्फ वकील नहीं होता”

कपिल सिब्बल ने अदालत में यह भी साफ किया कि “कानूनी सलाहकार” का मतलब केवल वकील नहीं होता, बल्कि इसमें जीवनसाथी या कोई करीबी व्यक्ति भी शामिल हो सकता है। इस मामले में वांगचुक की पत्नी डॉ. गीतांजली आंग्मो को यह अधिकार मिलना चाहिए था।

उन्होंने बताया कि हिरासत के आधार 29 सितंबर को दिए गए, लेकिन चारों वीडियो नहीं दिए गए। इसके अलावा हिरासत के आधार देने में करीब 28 दिनों की देरी हुई, जो कानून के खिलाफ है।

NSA की धारा 5A पर सरकार की दलील पर सवाल

सिब्बल ने सरकार द्वारा NSA की धारा 5A पर भरोसा किए जाने पर भी आपत्ति जताई। यह धारा कहती है कि अगर हिरासत कई आधारों पर आधारित हो और कुछ आधार गलत निकल जाएं, तब भी हिरासत वैध रह सकती है।

इस पर सिब्बल ने कहा, “मेरे संविधानिक अधिकार को धारा 5A के जरिए खत्म नहीं किया जा सकता। अगर चार वीडियो ही हटा दिए जाएं, तो हिरासत कैसे टिकेगी?”

उन्होंने यह भी कहा कि धारा 5A तभी लागू हो सकती है जब हिरासत से जुड़ी सारी सामग्री पहले ही उपलब्ध कराई गई हो।

जिला मजिस्ट्रेट पर ‘कॉपी-पेस्ट’ का आरोप

सिब्बल का दूसरा बड़ा तर्क यह था कि लेह के जिला मजिस्ट्रेट ने हिरासत आदेश जारी करते समय स्वतंत्र रूप से दिमाग नहीं लगाया। उन्होंने आरोप लगाया कि जिला मजिस्ट्रेट ने केवल एसएसपी की रिपोर्ट को शब्दशः कॉपी कर लिया।

सिब्बल ने बताया कि उन्हें 26 सितंबर 2025 की एसएसपी रिपोर्ट का सिर्फ पहला पन्ना ही मिला है, जिससे यह संदेह पैदा होता है कि पूरे मामले में सोच-विचार नहीं किया गया।

पुराने मामलों और अधूरी जांच पर सवाल

तीसरी दलील में कपिल सिब्बल ने कहा कि हिरासत के समर्थन में जिन मामलों का हवाला दिया गया है, उनमें से कई 2024 के पुराने हैं और अब उनका कोई सीधा संबंध नहीं बनता। कुछ एफआईआर अज्ञात लोगों के खिलाफ दर्ज हैं, जबकि सितंबर 2025 की हिंसा से जुड़ी एफआईआर में अब तक कोई ठोस प्रगति नहीं हुई।

एक वीडियो में वांगचुक द्वारा आत्मदाह का जिक्र किए जाने पर सिब्बल ने सफाई दी कि यह केवल अंतरराष्ट्रीय उदाहरणों के संदर्भ में कहा गया था। उन्होंने कहा कि वांगचुक ने अंत में गांधीवादी तरीके से शांतिपूर्ण भूख हड़ताल की बात कही थी।

कोर्ट ने वीडियो की उपलब्धता पर पूछे सवाल

सुनवाई के दौरान कोर्ट ने पूछा कि चारों वीडियो कहां उपलब्ध हैं। इस पर सिब्बल ने बताया कि केवल एक वीडियो ऑनलाइन मौजूद है, जबकि बाकी वीडियो वह पेन ड्राइव में कोर्ट को सौंपेंगे। पिछली सुनवाई में सिब्बल ने एक वीडियो अदालत में चलाया था, जिसमें वांगचुक शांति और अहिंसा की अपील करते नजर आ रहे थे।

सिब्बल ने कहा कि यह वीडियो साफ दिखाता है कि वांगचुक राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए खतरा नहीं थे, लेकिन हिरासत देने वाले अधिकारियों ने इस पहलू को नजरअंदाज कर दिया।

अब तक की कानूनी स्थिति

यह याचिका संविधान के अनुच्छेद 32 के तहत हैबियस कॉर्पस के रूप में दाखिल की गई है। इसमें जोधपुर सेंट्रल जेल में बंद सोनम वांगचुक की रिहाई की मांग की गई है। केंद्र सरकार, लद्दाख प्रशासन और जोधपुर जेल अधीक्षक इस मामले में प्रतिवादी हैं।

6 अक्टूबर को नोटिस जारी करते वक्त कपिल सिब्बल ने कहा था कि हिरासत के आधार नहीं दिए गए। हालांकि, सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने तब कहा था कि पत्नी को आधार देने की कोई कानूनी बाध्यता नहीं है। बाद में सिब्बल ने स्पष्ट किया कि चुनौती हिरासत की वैधता को लेकर है, न कि सिर्फ दस्तावेज न मिलने को लेकर।

कल भी जारी रहेगी सुनवाई

लेह के जिला मजिस्ट्रेट ने हलफनामा दाखिल कर हिरासत को वैध बताया है, जबकि जोधपुर जेल अधीक्षक ने कहा है कि पत्नी, भाई और वकीलों को मुलाकात की अनुमति दी गई है। सुप्रीम कोर्ट ने पहले ही पत्नी को वांगचुक के नोट्स देने की इजाजत दे दी है। अब इस अहम मामले में सुप्रीम कोर्ट में कल भी सुनवाई जारी रहेगी और सभी की नजरें अदालत के अगले रुख पर टिकी हुई हैं।

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