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Sikhism in Majha: सिखों का वह गढ़ जो भारत-पाक बंटवारे की सबसे बड़ी त्रासदी बना

Shikha | Nedrick News

Published: 03 Jan 2026, 10:15 AM | Updated: 03 Jan 2026, 10:15 AM

Sikhism in Majha: भारत के बंटवारे से पहले पंजाब भारत का सबसे बड़ा क्षेत्र था, आज का पंजाब तो केवल 44 प्रतिशत हिस्सा है, जिसका 46 प्रतिशत पाकिस्तान के पास है तो वहीं रही सही कसर 1 नवंबर 1966 को पूरी हो गई जब 44 प्रतिशत पंजाब को भी तीन हिस्सो में बांटा गया और हरियाणा और हिमाचल प्रदेश अस्तित्व में आया है। पंजाब इतना बड़ा था कि एक ही राज्य तीन अलग अलग हिस्सो में बंटा हुआ था.. पहला था दोआबा, दूसरा है मांझा और तीसरा है मालवा।

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मांझा में मौजूद सिख धर्म

इसमे मांझा सबसे खास है, हालांकि मांझा क्षेत्र मौजूदा समय में भारतीय पंजाब के हिस्से में काफी कम आया और ज्यादा हिस्सा पाकिस्तानी पंजाब के हिस्से में चला गया लेकिन फिर भी मांझा क्षेत्र बाकि के मालवा और दोआवा क्षेत्र से बेहद खास है। मांझा क्षेत्र ऐसा है जो ऐतिहासिक रूप से भी बेहद अहम माना गया क्योंकि मांझा को हम भारत का चौखट भी कह सकते है, जिसके जरिये भारत में घुसा जा सकता है। तो चलिए इस लेख में जानते है कि मांझा में मौजूद सिख धर्म के बारे में, साथ ही क्यों मांझा बाकि के क्षेत्रों से ज्यादा खास माना जाता है।

मांझा शब्द असल में मंझला शब्द से निकला है, जिसका मतलब होता है कि बीच वाला। मांझा भी दोआबा और मालवा के बीच है। इसे तब से मांझा कहा जाता है जब भारत अविभाजित ही थी, और ब्यास और रावी नदियों के बीच स्थित बारी दोआब का ऊपरी हिस्सा मांझा कहलाया। मांझा जिसे सेंटर कहा जाता है, असल में ब्रिटिश काल हो, या मुगलो का समय हो..लाहौर असल में उनका सेंटर क्षेत्र हुआ करता था।

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पठानकोट और गुरदासपुर मांझा का हिस्सा

महाराजा रणजीत सिंह की राजधानी भी लाहौर सीटी हुआ करती थी। लेकिन बंटवारे में सबसे ज्यादा असर मांजा क्षेत्र पर पड़ा और आज के समय में पंजाब के हिस्से में चार जिले अमृतसर, तरणतारन, पठानकोट और गुरदासपुर मांझा का हिस्सा है। वहीं पाकिस्तान को मांझा में ज्यादा मिला और पाकिस्ताव को लाहौर, सियालकोट, गुजरांवाला और शेखूपुरा, कसूर, नरोवाल, नानकाना साहिब, हाफिजाबाद, और वजिराबाद मिला।

मांझा क्षेत्र का रहन सहन, यहां की बोली, भाषा, सबकुछ बाकी के हिस्सों से अलग है। 2011 में हुए जनगणना के अनुसार मांझा में करीब 3.21 करोड़ की आबादी मांझा क्षेत्र से आती है। मांझा क्षेत्र में मांझी बोली बोली जाती है, जिसे टसाली भी कहा जाता है। मांझा असल में जो पंजाबी लिखी जाती है, उससे काफी करीब है। यानि की जिस तरह से शुद्ध तरीके से लिखा जाता है, वैसे ही लोग बोलचाल में इस्तेमाल करते है। साथ ही कई शब्दों और उच्चरणों को अलग तरीके से इस्तेमाल किया जाता है। जो केवल मांझा में ही इस्तेमाल किया जाता है।

महाराजा रणजीत सिंह जी भी मांझा के हिस्से से आते

मांझा का अपना बहुत बहादुरी भरा इतिहास है। कहा जाता है कि मांझा असल में वो एरिया है जहां से अक्सर विदेशी ताकते भारत में घुसने की कोशिश करते थे। वहीं पहले सिख शासक महाराजा रणजीत सिंह जी भी मांझा के हिस्से से आते थे। मांझा एक ऐसा क्षेत्र रहा है जो हमेशा वीर योद्धाओं की धरती रहा है। क्योंकि जो भी विदेशी ताकते भारत में घुसने की कोशिश करती थी, उनका सामना पहले मांझा के ही लड़ाको से होता था।

मांझा की मिट्टी में ही बहादुरी, जज्बा, और देश के लिए कुछ भी कर गुजरने की इच्छा शक्ति कूट कूट कर भरी हुई है। मांझा की बोली हो या लोग, उनमें अग्रेशन नजर आता है। आपको बता दें, मौजूदा समय में मांझा अभी भी अपनी मूल पहचान को बनाये रखे हुए है। जो हर सिख के लिए बेहद गर्व करने वाली बात है।

Shikha

shikha@nedricknews.com

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