Guru Nanak Dev Ji and Treta Yuga: जब आप सिखों पवित्र ग्रंथ श्री गुरु ग्रंथ साहिब को जानेंगे, समझेंगे तो पायेंगे कि गुरू साहिबानों ने हमेशा यहीं कहा कि मनुष्य का जो जीवन है, वो ही सबसे बेहतर है। उनके अंदर सोचने समझने, लोगो की सेवा करने, गुरूओ की वाणी का अनुसरण करके मोक्ष का रास्ता चुनने की समझ होती है। सिख गुरुओ ने माना कि जो जीवन हमें मिला है, हमें जो करना है अभी करना है इसी जीवन में करना है..क्योंकि पुनर्जन्म किसने देखा है.. और किसे याद रहता है कि पुनर्जन्म होता भी है या नहीं..लेकिन क्या आपने ये सोचा है कि एक गुरु जिन्होंने सिख जैसे महान धर्म की नींव रखी है, वो स्वयं किसी का पुनर्जन्म हो सकते है।
भले ही सिख धर्म की स्थापना के बाद कहा गया कि गुरू साहिबानो का पुनर्जन्म नहीं हुआ बल्कि उनकी आत्मिक शक्ति एक गुरु से दूसरे गुरु में समाहित हो गई. और अंतिम गुरु गोबिंद सिंह जी की शक्ति ही गुरु ग्रंथ साहिब में समाहित है। इसलिए वो सिखों के 11वें और अंतिम गुरु है। अपने इस वीडियो में हम प्रथम गुरु गुरु नानक देव जी के पुनर्जन्म की कहानी जानेंगे.. कि क्या वो वाकई में गुरु साहिब बनने से पहले किसी और रूप में भी जन्में थे।
चारों युग से गुरु साहिब का रिश्ता
सिख धर्म में पवित्र ग्रंथ श्री गुरु ग्रंथ साहिब जितनी मान्य है , उसकी ही तरह ही भाई बाले वाली ‘‘जन्म साखी’’ भी एक मान्य और पवित्र ग्रंथ है। जिसमें कही गई हर बात को सिखों के लिए परन सत्य माना जाता है। दरअसल जन्म साखी में भाई बाला जी के उन अनुभवो को लिखा गया है जो उन्होंने आँखों देखा कानों सुना ज्ञान अर्जित किया था। ये ज्ञान उन्हें आदि गुरु गुरु नानक देव जी ने दिया था, और भाई बाला जी ने उन्हें शब्दों में पिरोया था। इसी जन्म साखी में पेज नंबर 423 के साखी अजिते रंधावे’ (अजीता रंधावा) के तहत गुरु नानक देव जी के पिछले जन्मों के बारे में बताया गया है।
इस पृष्ठ पर लिखे वर्णनो के हिसाब से गुरु नानक देव जी हर युग में जन्में थे। जिसमें सबसे पहले वो सतयुग में राजा अम्बरीश के रूप में जन्में थे। राजा अम्बरीश सूर्यवंशी राजा थे जो विष्णु जी के परम भक्त थे। हिंदू धर्म में एकादशी के व्रत की महिमा को उनकी भक्ति से ही जाना जा सकता है। उन्होंने ही महर्षि दुर्वासा ऋषि के क्रोध को भी सहा, राजधर्म निभाया और पानी पी कर एकादशी का व्रत भी खंडित नहीं होने दिया था..कहानी की माने तो एकादशी का व्रत पूरा करने के लिए जब राजा तैयार हुए तो महर्षि ने उनसे भोजन कराने की इच्छा जाहिर की और वो नहाने चले गए, लेकिन बहुत देर तक नहीं लौटे, राजा को डर था कि कहीं व्रत खोलने का मुहुर्त न निकल जायें वहीं खा लेते तो अतिथि धर्म का उल्लंघन होगा।
दुर्वासा ऋषि और राजा अम्बरीश
बस उन्होंने पानी पी लिया, लेकिन दुर्वासा ऋषि ने उन पर अपनी शक्ति से हमला कर दिया..और उन्हें बचाने के लिए स्वंय़ विष्णु जी ने अपना सुदर्शन चक्र भेज दिया, जिससे बचने के लिए दुर्वासा ऋषि को राजा अम्बरीश से ही मदद मांगनी पड़ी। राजा अम्बरीश ने बताया था कि कैसे राजधर्म, भक्ति, अतिथिधर्म सबको एक साथ निभाया जा सकता है। वहीं अब बात करते है त्रेता युग की..त्रेता युग में वो विष्णु अवतार श्री राम जी के ससुर और लक्ष्मी स्वरूप सीता जी के पिता राजा जनक के रूप में जन्में थे। राजा जनक, जिन्होंने राजा और ऋषि दोनो बन कर एक न्याय प्रिय राज्य को स्थापित किया। उन्होंने अष्टावक्र से आध्यात्मिक ज्ञान प्राप्त किया था। वो आध्यात्म और तत्वज्ञान के महान ज्ञानी थे। यानि की एक ऋषि रहते हुए भी उन्होंने राजधर्म निभाया था।
वैराग्य धारण करने की जरूरत नहीं
इसके बाद गुरु साहिब का जन्म द्वापर युग राजा हरीशचंद्र के रूप में हुआ था। हालांकि राजा हरीशचंद्र वैसे तो त्रेता युग में जन्मे थे, और भगराम के ही पूर्वज थे, लेकिन द्वापर युग में उनका कई जगह जिक्र है। लेकिन जन्म साखी में लिखी गई बातों को माने तो गुरु साहिब एक जन्म में राजा हरीशचंद्र भी थे। उनका चौथा जन्म गुरु नानक देव जी के रूप में हुआ था, जिन्होंने सिख धर्म की न केवल स्थापना की बल्कि ये भी दुनिया को बचाया कि संत बनने के लिए आपको वैराग्य धारण करने की जरूरत नहीं है। आप गृहस्थ होकर भी धर्म के मार्ग पर चल सकते है।
22 सितंबर 1539 को गुरु नानक देव जी शशरीर सचखंड चले गए थे, जिन्हें स्वयं भगवान लेने आये थे, और अब वो हमेशा के लिए सचखंड में ही रहते है। भले ही सिख धर्म पुनर्जन्म नहीं मानता है लेकिन भाई बाले वाली ‘‘जन्म साखी’’ के अनुसार गुरु नानक देव जी भी चार जन्मों के चक्र से गुजरे थे। गुरु नानक देवी जी से जुड़ी ये जानकारी आपको कैसी लगी हमें कमेंट करके जरूर बतायें।






























