समाज में जातिगत भेदभाव के विषयों को बहुत शिद्दत से लिखने वाले दलित साहित्यकार सूरजपाल चौहान
“दावत खाने के बाद एक-एक आदमी अपनी जूठी पत्तल उठाए मां की ओर आता गया और डलिया के पास डाल कर आगे बढ़ता गया. मां दोनों हाथों से जूठन बटोरने में लगी हुई थी और … कुत्ते मेरे ऊपर गुर्रा रहे थे. लेकिन डंडे की डर से दूर खड़े थे. कुत्तों का गुर्राना उचित था,...
Read more 
