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जानें कैसे दलित समुदाय से निकलकर सिंगिंग इंडस्ट्री के बादशाह बनें दलेर मेहंदी

vickynedrick@gmail.com | Nedrick News

Published: 25 Apr 2024, 12:00 AM | Updated: 25 Apr 2024, 12:00 AM

‘तुनक तुनक तुन’, ‘बोलो ता रा रा’, ‘जियो रे बाहुबली’, ‘ना ना ना ना ना रे’ जैसे सुपरहिट गाने गाने वाले दलेर मेहंदी को कौन नहीं जानता। उन्होंने अपने जीवन में बहुत संघर्ष किया और हिंदी पॉप कलाकारों के बीच अपनी जगह बनाई। हालांकि, यह सफर उनके लिए बहुत कठिन था क्योंकि वह अनुसूचित जाति से हैं। इस पगड़ीधारी कलाकार का जन्म 18 अगस्त 1967 को बिहार के पटना में एक दलित परिवार में हुआ था। दलित होने के कारण उन्हें अपने जीवन में बहुत कुछ झेलना पड़ा, लेकिन उनकी आवाज़ का जादू दुनिया के सिर पर इस कदर चढ़ने लगा कि लोग उनकी जाति को भूल गए और उनके गाने ही याद रखने लगे। सामाजिक रूप से पिछड़े और शोषित लोगों की आवाज, जिसे समाज कभी सुनना नहीं चाहता था, आज उसी समाज के दलित पॉप की आवाज पर दुनिया झूमती नजर आती है।

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पंजाब में दलित

पंजाब में भारत में अनुसूचित जाति (एससी) समुदायों की सबसे बड़ी आबादी है, जो पूरी आबादी का लगभग 32 प्रतिशत है। मजहबी, रविदासिया, रामदासिया और धर्मी जैसे समुदाय पंजाब की अनुसूचित जाति की आबादी का लगभग 87 प्रतिशत हिस्सा हैं। इसके अलावा, एससी समुदाय मुख्य रूप से ग्रामीण है, जिनमें से लगभग 70 प्रतिशत लोग गांवों में रहते हैं। इसी भीड़ से निकलकर अपनी अलग पहचान बनाने वाले दलेर मेहंदी पर उनके समुदाय के लोगों को गर्व है।

बचपन से ही गाने का शौक

सूत्रों के मुताबिक, गायन की परंपरा दलेर मेहंदी के परिवार में सात पीढ़ियों से चली आ रही है। दलेर को बचपन में उनके माता-पिता ने ‘राग’ और ‘सबद’ सिखाया था। उन्हें बचपन से ही गायन का शौक रहा है। दलेर मेहंदी ने संगीत की शिक्षा पटना सिटी के संगीत सदन और मुकुट संगीत विद्यालय से प्राप्त की। दलेर के पिता सरदार अजमेर सिंह चंदन गुरु कीर्तन कराते थे। उन्हें शास्त्रीय संगीत की गहन समझ थी। दलेर ने तख्त श्री हरमंदिर साहिब में शबद कीर्तन करने में भी काफी समय बिताया। एक इंटरव्यू में दलेर ने बताया कि शुरुआत में वह एक रुपये के लिए गाना गाते थे। दलेर मेहंदी ने महज छठी या सातवीं कक्षा की पढ़ाई पूरी की। कहा जाता है कि गायन सीखने के लिए उन्होंने घर भी छोड़ दिया था। जब वह 11 साल के थे तो गाने के लिए घर से भाग गए और गोरखपुर के रहने वाले उस्ताद राहत अली खान साहब के पास चले गए। इसके दो साल बाद ही यानी 13 साल की उम्र में दलेर मेहंदी ने जौनपुर में 20 हजार लोगों के सामने अपनी पहली स्टेज परफॉर्मेंस दी। इस तरह से वह धीरे-धीरे सिंगिंग में अपना करियर बनाते चले गए। लोगों में उनके गानों को लेकर क्रेज़ बढ्ने लगा और वह पुंजाबी इंडस्ट्री के फ़ेमस गायक बन गए।

इस तरह हुई बॉलीवुड में एंट्री

दलेर मेहंदी ने पंजाबी इंडस्ट्री में तो तहलका मचा दिया था, लेकिन उन्होंने बॉलीवुड में डेब्यू नहीं किया। दरअसल, वह चाहते थे कि अमिताभ बच्चन उन्हें फोन करें और गाने के लिए कहें। दलेर के ऐसा कहने के दो महीने बाद बिग बी ने उन्हें फोन किया, जिसके बाद उन्होंने अमिताभ की फिल्म मृत्युदाता में ना ना ना रे गाना गाया और ये गाना काफी हिट रहा। इसके बाद वह बॉलीवुड के बेहतरीन सिंगर भी बन गये।

आपको बाते दें कि, दलेर मेहंदी नाम के पीछे एक कहानी है। दरअसल उनके माता-पिता ने डाकू दलेर सिंह के नाम पर उनका नाम दलेर सिंह रखा था। लेकिन समय बदला और जब वह बड़े हुए तो मशहूर गायक परवेज मेहंदी से इतने प्रभावित हुए कि उन्होंने अपना नाम दलेर सिंह से दलेर मेहंदी रख लिया।

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