Kidney health in Down syndrome: जब भी डाउन सिंड्रोम की बात होती है, तो अक्सर दिल की बीमारियां, सीखने से जुड़ी चुनौतियां या विकास संबंधी मुद्दे चर्चा में रहते हैं। लेकिन एक जरूरी अंग, किडनी, अक्सर इस बातचीत से बाहर रह जाती है। अब डेनमार्क की एक बड़ी और अहम स्टडी ने इस अनदेखे पहलू पर रोशनी डाली है और बताया है कि डाउन सिंड्रोम से जूझ रहे लोगों में किडनी से जुड़ी समस्याओं का खतरा आम लोगों के मुकाबले कहीं ज्यादा है।
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डेनमार्क की बड़ी स्टडी ने खोली आंखें (Kidney health in Down syndrome)
यह रिसर्च “Acute kidney injury and chronic kidney disease in individuals with Down syndrome” नाम से 2025 में Clinical Kidney Journal में प्रकाशित हुई है। इस स्टडी का नेतृत्व आरहूस यूनिवर्सिटी हॉस्पिटल की फ्रीया लियोनोरे उह्ड वेल्डिंग और उनकी टीम ने किया। टीम ने डेनमार्क के नेशनल हेल्थ रिकॉर्ड्स का गहराई से विश्लेषण किया।
इस अध्ययन में 1961 से 2021 के बीच जन्मे 2,815 ऐसे लोगों को शामिल किया गया, जिनमें डाउन सिंड्रोम की पुष्टि हो चुकी थी। इन सभी के ब्लड क्रिएटिनिन लेवल 1990 के दशक से लेकर 2024 तक ट्रैक किए गए। तुलना के लिए, समान उम्र और लिंग के 28,150 ऐसे लोगों को शामिल किया गया, जिन्हें डाउन सिंड्रोम नहीं था। किडनी से जुड़ी समस्याओं की पहचान के लिए अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मान्य KDIGO गाइडलाइंस का इस्तेमाल किया गया।
आंकड़े जो चौंका देते हैं
स्टडी के नतीजे वाकई गंभीर हैं। आंकड़ों के मुताबिक, 20 साल की उम्र तक पहुंचते-पहुंचते डाउन सिंड्रोम वाले करीब 29 फीसदी लोगों को Acute Kidney Injury (AKI) का सामना करना पड़ा। वहीं, सामान्य आबादी में यह आंकड़ा सिर्फ 1 से 2 फीसदी के बीच था।
40 साल की उम्र तक यह अंतर और बढ़ जाता है डाउन सिंड्रोम वाले करीब 33 फीसदी लोग AKI से जूझ चुके होते हैं, जबकि बाकी लोगों में यह संख्या करीब 5 फीसदी रहती है। 70 साल की उम्र तक पहुंचते-पहुंचते डाउन सिंड्रोम वाले आधे से ज्यादा लोगों को AKI हो चुका होता है।
Chronic Kidney Disease (CKD) के मामले में भी तस्वीर कुछ अलग नहीं है। 20 साल की उम्र में जहां डाउन सिंड्रोम वाले करीब 1 फीसदी लोग CKD से प्रभावित पाए गए, वहीं सामान्य लोगों में यह लगभग न के बराबर था। 40 की उम्र में यह आंकड़ा 4 फीसदी तक पहुंच गया और 70 साल तक आते-आते 23 फीसदी डाउन सिंड्रोम वाले लोग CKD से जूझ रहे थे।
दिलचस्प बात यह है कि जब दिल की जन्मजात बीमारियों से जुड़े मामलों को अलग भी कर दिया गया, तब भी किडनी की समस्या का खतरा बना रहा। इससे साफ होता है कि इसकी जड़ें डाउन सिंड्रोम की जैविक बनावट में कहीं गहरी हैं।
किडनी की समस्या का रोज़मर्रा की ज़िंदगी पर असर
किडनी हमारे शरीर में दिन-रात काम करती हैं खून को साफ करना, पानी और नमक का संतुलन बनाए रखना और ब्लड प्रेशर कंट्रोल करना। जब किडनी कमजोर पड़ती हैं, तो थकान, पैरों या आंखों के आसपास सूजन, बार-बार इंफेक्शन और दिल पर अतिरिक्त दबाव जैसी दिक्कतें सामने आती हैं।
डाउन सिंड्रोम वाले बच्चों और बड़ों में अक्सर किडनी का आकार छोटा होना या यूरिनरी ट्रैक्ट से जुड़ी बनावट की समस्याएं पाई जाती हैं। इससे बार-बार संक्रमण या यूरिन रुकने जैसी दिक्कतें होती हैं, जो समय के साथ किडनी को नुकसान पहुंचाती हैं। इसके अलावा, अतिरिक्त क्रोमोसोम 21 किडनी को दवाओं, बुखार या डिहाइड्रेशन जैसी स्थितियों के प्रति ज्यादा संवेदनशील बना देता है।
किडनी को सुरक्षित रखने के आसान उपाय
डॉक्टरों का मानना है कि डाउन सिंड्रोम वाले लोगों में युवावस्था से ही नियमित रूप से ब्लड क्रिएटिनिन टेस्ट को हेल्थ चेकअप का हिस्सा बनाया जाना चाहिए। लगातार थकान, झागदार पेशाब, आंखों के आसपास सूजन या बार-बार यूरिन इंफेक्शन जैसे संकेतों को हल्के में नहीं लेना चाहिए।
रोजमर्रा की आदतें भी काफी मदद कर सकती हैं पर्याप्त पानी पीना, ज्यादा नमक और प्रोसेस्ड फूड से बचना, हल्की-फुल्की फिजिकल एक्टिविटी और नियमित ब्लड प्रेशर चेक करना किडनी की सेहत के लिए फायदेमंद है।
बेहतर भविष्य की ओर एक कदम
यह स्टडी डॉक्टरों और हेल्थ पॉलिसी बनाने वालों के लिए एक अहम संकेत है कि डाउन सिंड्रोम की देखभाल में किडनी हेल्थ को भी गंभीरता से शामिल किया जाए। समय रहते जांच और सही देखभाल से डायलिसिस जैसी गंभीर स्थितियों को सालों तक टाला जा सकता है।
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