Iran vs USA Conflict: पिछले 16 दिनों से ईरान की सड़कों पर हिंसा और सरकार विरोधी प्रदर्शन जारी हैं। ईरान की बढ़ती महंगाई, खराब आर्थिक हालत और आम जनता के गुस्से ने देश को अशांति के किनारे ला खड़ा किया है। शुरू में यह प्रदर्शन स्थानीय मुद्दों से जुड़े थे, लेकिन अब यह सीधे ईरान के सर्वोच्च नेता आयातुल्लाह रूहुल्ला खामेनेई और उनकी सरकार को चुनौती देने का रूप ले चुका है। रिपोर्टों के अनुसार, अब तक देशभर में 500 से अधिक लोगों की मौत हो चुकी है और हजारों आंदोलनकारी गिरफ्तार किए जा चुके हैं।
आंदोलन का पैमाना और हिंसक टकराव (Iran vs USA Conflict)
ईरान की 100 से अधिक शहरों में सुरक्षा बल और प्रदर्शनकारियों के बीच हिंसक टकराव हो रहा है। यह हालात इतने गंभीर हैं कि विश्वभर की मीडिया के लिए देश के अंदर की वास्तविक स्थिति को रिपोर्ट करना कठिन हो गया है। विशेषज्ञ इसे 1979 की इस्लामिक क्रांति के बाद का सबसे बड़ा सरकार विरोधी आंदोलन मान रहे हैं।
ईरान के जनरल प्रॉसिक्यूटर मोहम्मद काजिम मोवाहेदी आजाद ने देशभर की अदालतों को आदेश दिया है कि आंदोलन में शामिल सभी लोगों पर मुकदमा तेजी से चलाया जाए। उन्होंने साफ कहा कि आरोप “खुदा के खिलाफ जंग छेड़ना” का है, जो ईरान में मौत की सजा के तहत आता है।
अमेरिका की दखलअंदाजी और धमकियां
जैसे ही ईरान के अंदरूनी हालात बिगड़े, अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने सख्त चेतावनी दी है कि अगर ईरानी सरकार प्रदर्शनकारियों पर कठोर कार्रवाई करती है, तो इसका परिणाम गंभीर होगा। ट्रंप ने तो यहां तक कहा कि अमेरिका को युद्ध की स्थिति के लिए भी तैयार रहना चाहिए।
साथ ही अमेरिकी मानवाधिकार संगठन भी ईरान की स्थिति पर चिंता जता चुके हैं और इसे असामान्य बताते हुए स्थिति पर नजर रखने की मांग कर रहे हैं।
हालांकि, ईरान के नेताओं ने साफ कर दिया है कि अमेरिका का कोई भी दखल खतरनाक परिणाम ला सकता है। पिछले साल ईरान और इजरायल के बीच हुई 12 दिन की जंग में भी अमेरिका ने हस्तक्षेप किया था और इसके बाद ईरान के परमाणु ठिकानों पर हमले भी किए थे।
अमेरिका और ईरान के बीच पुरानी दुश्मनी
ईरान और अमेरिका की दुश्मनी नई नहीं है। इसे समझने के लिए इतिहास में पीछे लौटना जरूरी है।
पर्शियन साम्राज्य से लेकर आधुनिक ईरान
ईरान, जिसे पर्शियन साम्राज्य के नाम से जाना जाता है, पिछले 2500 सालों से विभिन्न राजाओं की सरकार का केंद्र रहा है। 1950 में ईरान की जनता ने धर्मनिरपेक्ष नेता मोहम्मद मुसादिक को प्रधानमंत्री चुना। मुसादिक ने तेल कंपनियों का राष्ट्रीयकरण कर देश की संपत्ति सीधे जनता के लिए सुरक्षित करने की कोशिश की।
लेकिन अमेरिका और ब्रिटेन ने 1953 में मिलकर मुसादिक का तख्तापलट किया और ईरान में शाह मोहम्मद रजा पहेलवी को सत्ता में बिठा दिया। 22 साल का शाह अपने अय्याश और फिजूलखर्च जीवन के लिए मशहूर था। उसकी नीतियों ने आम जनता के जीवन को असहनीय बना दिया।
शाह की सरकार और विरोध
शाह ने सवाक, अपनी आंतरिक सुरक्षा एजेंसी स्थापित की, जो किसी भी विरोध को कुचलने में माहिर थी। इसके बावजूद, 1960 और 1970 के दशक में शाह की खुली पश्चिमी नीतियों और अय्याशियों ने जनता में गुस्सा भड़का दिया। ईरान में फैशन, विलासिता और विदेशी संस्कृति के आदान-प्रदान ने धार्मिक और सामाजिक समूहों का विरोध जन्मा दिया।
इस विरोध के नेता बने आयातुल्लाह रूहुल्ला खुमैनी, जिन्हें 1964 में गिरफ्तार कर जेल भेजा गया। उन्हें देश छोड़ने की मजबूरी हुई और 14 साल तक इराक, तुर्की और फ्रांस में निर्वासन में रहे। वहीं उन्होंने बाहर से ही शाह के खिलाफ आंदोलन का नेतृत्व किया।
ईरानी क्रांति और अमेरिका
1978 में शाह की नीतियों और आर्थिक असमानता के खिलाफ बड़े पैमाने पर विरोध शुरू हुआ। छात्रों और आम जनता ने सड़कों पर उतरना शुरू किया। शाह ने विरोध को दबाने के लिए आंतरिक बलों का इस्तेमाल किया, लेकिन आंदोलन और भी तेज़ हो गया।
1 फरवरी 1979 को, निर्वासन से लौटे आयातुल्लाह खुमैनी का स्वागत लाखों ईरानियों ने किया। शाह पहेलवी अमेरिका चले गए और ईरान में इस्लामिक सरकार की स्थापना हुई। इसके बाद अमेरिका और ईरान के बीच दुश्मनी लगातार बढ़ती रही।
अमेरिकी दूतावास संकट
1979 में छात्रों ने तेहरान में अमेरिकी दूतावास पर कब्ज़ा कर 52 अमेरिकी कर्मचारियों को 444 दिन तक बंधक बनाया। यह उस समय का प्रतिशोध था जब अमेरिका ने शाह को शरण दी थी। इस घटना के बाद अमेरिका ने ईरान को कमजोर करने के लिए कई आर्थिक और राजनीतिक दबाव डाले।
भौगोलिक और रणनीतिक महत्व
ईरान का भौगोलिक महत्व किसी भी देश की तुलना में अधिक है। यह देश उत्तर में तुर्कमेनिस्तान और कैस्पियन सागर, पश्चिम में तुर्की और इराक, पूर्व में पाकिस्तान और अफगानिस्तान, और दक्षिण में फारस और ओमान की खाड़ी से घिरा है।
खासकर स्ट्रेट ऑफ हार्मुज, जो फारस और ओमान की खाड़ी को जोड़ता है, सिर्फ 55 किलोमीटर चौड़ा है। दुनिया के तेल का लगभग 20 फीसदी इसी रास्ते से गुजरता है। इसलिए अमेरिका और पश्चिमी देशों के लिए ईरान का नियंत्रण बेहद महत्वपूर्ण है।
आधुनिक संघर्ष और परमाणु मुद्दा
पिछले 47 सालों में अमेरिका ने ईरान पर लगातार आर्थिक प्रतिबंध लगाए। बावजूद इसके ईरान ने अमेरिका के सामने झुकने से इंकार किया। 2015 में पी-5 प्लस वन समझौता हुआ, जिसमें ईरान ने अपने परमाणु कार्यक्रम को सीमित किया और बदले में आर्थिक प्रतिबंध हटाए जाने का वादा मिला।
लेकिन डोनाल्ड ट्रंप के राष्ट्रपति बनने के बाद अमेरिका ने समझौते से बाहर निकलते हुए ईरान पर दबाव और सैन्य धमकियां बढ़ा दीं। सऊदी अरब और इज़राइल के दबाव में अमेरिका ईरान को कमजोर करने के लिए हर मौका तलाश रहा है।
मौजूदा आंदोलन और भविष्य की आशंका
अभी हाल ही में शुरू हुए आंदोलन ने एक बार फिर से अमेरिका और ईरान के बीच तनाव को बढ़ा दिया है। ईरानी जनता अपनी सरकार और सर्वोच्च नेता से नाराज है, जबकि अमेरिकी सरकार और मानवाधिकार संगठन इस स्थिति पर नजर बनाए हुए हैं।
विशेषज्ञों का कहना है कि अगर अमेरिका ने सीधे हस्तक्षेप किया, तो परिणाम खतरनाक हो सकते हैं। इतिहास, भौगोलिक स्थिति और तेल संसाधनों के महत्व को देखते हुए यह संघर्ष सिर्फ ईरान और अमेरिका तक सीमित नहीं रह सकता।
ईरान में जारी आंदोलन, अमेरिका-ईरान तनाव और देश की आर्थिक कठिनाइयाँ मिलकर इस क्षेत्र को वैश्विक राजनीति का संवेदनशील बिंदु बना रही हैं। पिछले 47 वर्षों में अमेरिका और ईरान के बीच दुश्मनी कई मोड़ों से गुज़री है, लेकिन अब तक कोई भी पक्ष पूरी तरह विजयी नहीं हुआ है।
मौजूदा आंदोलन और अमेरिका की धमकियों के बीच सवाल यही है कि क्या ईरान इस बार भी अपनी संप्रभुता बनाए रख पाएगा या फिर इस संघर्ष का असर पूरे मध्य पूर्व और वैश्विक तेल मार्केट पर पड़ेगा।




























