आखिर कहाँ है स्वर्ण मंदिर में स्वर्ग का द्वार? इन 5 गूढ़ रहस्यों से अब तक अंजान हैं दुनिया – Harmandir Sahib Hidden Places

Shikha Mishra | Nedrick News Punjab Published: 09 Apr 2026, 10:22 AM | Updated: 09 Apr 2026, 10:22 AM

Harmandir Sahib Hidden Places: आपने ये तो सुना ही होगा कि अमृतसर का महान औऱ सबसे बड़े गुरुद्वारा श्री हरमंदिर साहिब को आज का रूप देने में सबसे बड़ा योगदान शेर एक पंजाब महाराजा रणजीत सिंह जी का है। जिन्होंने हरमंदिर साहिब समेत 7 धरोहरो को सोना दान दिया किया, जिसके बाद ये स्वर्ण मंदिर भी कहलाया, तो वहीं उसके मूल मंदिर का निर्माण पांचवे सिख गुरु गुरु अर्जन देव जी ने 1588 से लेकर 1604 के बीच कराया था। हरमंदिर साहिब में करीब 162 किलो सोने की परत लगाई गई थी.. जो अमृतसर आते है वो स्वर्ण मंदिर के दर्शन न करें ऐसा हो ही नहीं सकता है। दुनिया के सबसे बड़ी सार्वजनिक रसोई भी गुरुद्वारा हरिमंदिर साहिब में मौजूद है। हर सिख के सबसे पवित्र स्थलों में से एक हरमंदिर साहिब गुरुद्वारा भले ही बाहर से ऐसा लगता हो जैसे आप उनके बारे में सब जानते है लेकिन जैसे जैसे आप उसके अंदर जाते जायेंगे आपको अहसास होगा स्वर्ण मंदिर कई रहस्यों से भरा है। यहां असल में कई ऐसे रहस्यमई चीजे है जिनके बारे में बेहद कम लोग जानते है। अपने इस लेख में हरमंदिर साहिब में मौजूद रहस्यों के बारे में जानेंगे.. औऱ किनसे जुड़े है ये रहस्य।

पवित्र सरोवर के साथ बनी ये 16 सीढ़िया

हरमंदिर साहिब का पहला रहस्य है हर की पौड़ी .. जिसे सिख धर्म को मानने वाले स्वर्ग की सीढ़िया कहते है। कहा जाता है कि गुरुद्वारा हरमंदिर साहिब के बीच पवित्र सरोवर के साथ बनी ये 16 सीढ़िया.. जिसे खुद निरंकार परमात्मा बनाने के लिए धरती पर आये थे। इस गुरुद्वारे का निर्माण पांचवे गुरु गुरु अर्जन देव जी करवाना शुरु किया था.. ये स्थान गुरुद्वारे के ठीक सामने है, जहां पवित्र जल श्रोत है, जहां से गुरुद्वारे में आने वाली संगते जल चखती है.. ये स्थान हर की पौड़ी कहलाता है। जिसमें 16 सीढ़िया सरोवर के अंदर तक जाती है। चाहे कोई भी मौसम हो, लेकिन सरोवर का पानी कभी भी हर की पौड़ी से ऊपर नहीं जाता है। खुद गुरु अर्जन देव जी ने सबसे पहले इस स्थान से अमृत चखा था। इस जल श्रोत से संगते केवल जल लेकर कुछ दूर जाकर पी सकती है, लेकिन उसे जूठा नहीं कर सकती है। सिक्खी इतिहास के मुताबिक इस स्थान को बनाने के लिए खुद निरंकार परमात्मा आये थे..जिनके साथ आये सिख संगत किसी देवआत्मा से कम नहीं लग रहे थे..और ऐसा महसूस हो रहा था कि जैसे खुद देवता हरमंदिर साहिब के निर्माण में मदद करने आये थे। गुरु अर्जन देव जी ने ही इस स्थान को हर की पौड़ी नाम दिया था।

गुरुद्वारे का पहले गुरु नानक देव जी से भी गहरा संबंध

अब बात करते है 68 तीरथ गुरु चरण की.. वैसे तो हरमंदिर साहिब का निर्माण पांचवे गुरु ने करवाना शुरू किया था, लेकिन बहुत कम लोग जानते है कि इस गुरुद्वारे का पहले गुरु नानक देव जी से भी गहरा संबंध है। सिख धर्म में माना जाता है कि बाहरी तीर्थ यात्राओं के बजाये गुरु चरण ही सबसे पवित्र धाम है, और गुरु सेवा से ही  दुनिया के सभी तीर्थों को घूमने का पुण्य हासिल होता है। 68 तीरथ गुरु चरण वहीं स्थान है जहां एक साथ आपको गुरु सेवा का फल मिलता है। ये स्थान एक बेरी के पेड़ के नीचे है, जिसे दुख भंजनी बेरी कहा जाता है, इसे थड़ा साहिब भी कहा जाता है.. पेड़ के नीचे एक पवित्र चबूतरा है, जहां बैठकर ही पांचवे गुरु गुरुद्वारे के निर्माण कार्य का सारा काम देखते थे।

गुरूद्वारा 68 साहिब

लेकिन सबसे पहले इस स्थान पर गुरु नानक देव जी भी सुल्तानपुर से फतेहाबाद होते हुए यात्रा कर रहे थे तब वो भी इसी बेरी के पेड़ के नीचे आकर आराम करने के लिए रूके थे। उस वक्त गांव के चौधरी भाई तारा के सामने उस स्थान पर एक महान और पवित्र स्थान भविष्य में बनाने की बात की थी। इसके बाद गुरु साहिब अंगद देव जी और गुरु अमरदास जी भी यहीं आकर रूके थे। और यहीं तय किया गया था कि भविष्य में लोगो की मुक्ति के लिए यहां पवित्र गुरुद्वारा होना चाहिए। जिसके बाद चौथे गुरु रामदास जी ने अमृतसरोवर का निर्माण कराया था..जो गुरुद्वारा हरमंदिर साहिब आते है उन्हें गुरूद्वारा 68 साहिब में भी माथा टेकना चाहिए।

भोरा साहिब नौवे गुरु गुरु तेग बहादुर की यात्रा

इसके बाद बात करेंगे..भोरा साहिब- भोरा साहिब नौवे गुरु गुरु तेग बहादुर की उस यात्रा का प्रतीक है जब गुरु साहिब हरमंदिर साहिब आये थे, लेकिन गुरु अर्जनदेव जी के बड़े भाई के पोते हर जी ने हरमंदिर साहिब पर कब्जा किया हुआ था और गुरु साहिब के आगमन के बारे में सुनकर तारों दरवाजो पर ताला लगा कर चाभी सरोवर में फेंक दी थी, जब गुरु साहिब को पता चला तो वो हरमंदिर साहिब के अंदर गए बिना ही सरोवर में स्नान करके गुरुद्वारे के सामने बनी दर्शनी स्थान में ही साधना की.. इस स्थान पर एक बेसमेंट बना है, जहां स्थित है भोरा साहिब.. इस स्थान पर गुरु साहिब ने बैठकर आराम किया था, गुरु साहिब वहीं से लौट गए थे, लेकिन वो अंतिम गुरु थे जो हरमंदिर साहिब आये थे क्योंकि दसवें गुरु गोबिंद सिंह जी कभी भी हरमंदिर साहिब नहीं गए। ये स्थान गुरु साहिब के आने से और ज्यादा पवित्र माना जाता है. यहां आने वाले भोरा साहिब में मत्था जरूर टेंके।

श्री गुरु ग्रंथ साहिब का प्रकाश – Sri Guru Granth Sahib

500 साल पुराना बेरी का पेड़ जिसे लाची पेड़ कहा जाता है। हरमंदिर साहिब में प्रसाद वितरण करने वाले स्थान पर एक हरा भरा विशाल 500 साल पुराना बेरी का पेड़ है, जिसे लाची पेड़ भी कहा जाता है, ये नाम पांचवे गुरू अर्जन देव जी ने दिया था। क्योंकि इस पेड़ में बेहद छोटे इलाइची की तरह बेर होते थे। इसे लाची पेड़ साहिब कहा जाता है…यहां हर रोज श्री गुरु ग्रंथ साहिब का प्रकाश किया जाता है.. इसकी अरदास करने से मान की शांति मिलती है।

इसके बाद बात करेंगे रामगढ़िया बूंगा की.. लाल रंग की ये इमारत अंदर से तो आम महलो जैसी है, जो कि महान सिख योद्धा जस्सा सिंह रामगढ़िया का किला हुआ करता था। यहां मौजूद है आरंगजेब का सिंहासन.. जिसे जस्सा सिंह रामगढ़िया दिल्ली फतह के बाद उखाड़ अमृतसर लाये थे। जिसे हरमंदिर साहिब से काफी नीचे स्थान पर रखा गया है। जो ये प्रतीक है कि भले ही मुगलो ने अपनी ताकत की बहुत नुमाइश की हो लेकिन वो निरंकार परमात्मा के आगे पैर की धूल के बराबर है। इस महल के नीचे बेसमेंट में जस्सा सिंह रामगढ़िया का बैठने का स्थान है। वो यहीं पर मिसल हेड होने के नाते फैसले लेते थे। वो मानते थे कि उनका स्थान हरमंदिर साहिब से नीचे ही रहना चाहिए। जब भी आप जाये तो  मुगलो के अहंकार को तोड़ने वाला ये तख्ते ताउस जरूर देंखे साथ ही जस्सा सिंह रामगढ़िया के महान फैसलो का स्थान भी जरूर देखे।

Shikha Mishra

shikha@nedricknews.com

शिखा मिश्रा, जिन्होंने अपने करियर की शुरुआत फोटोग्राफी से की थी, अभी नेड्रिक न्यूज़ में कंटेंट राइटर और रिसर्चर हैं, जहाँ वह ब्रेकिंग न्यूज़ और वेब स्टोरीज़ कवर करती हैं। राजनीति, क्राइम और एंटरटेनमेंट की अच्छी समझ रखने वाली शिखा ने दिल्ली यूनिवर्सिटी से जर्नलिज़्म और पब्लिक रिलेशन्स की पढ़ाई की है, लेकिन डिजिटल मीडिया के प्रति अपने जुनून के कारण वह पिछले तीन सालों से पत्रकारिता में एक्टिव रूप से जुड़ी हुई हैं।

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