Five brave Brothers Sacrifice: सिख लड़ाकों और मुगलों के बीच हमेशा से ही छत्तीश का आंकड़ा रहा था। सिखो की अपने धर्म के प्रति निष्ठा को झुकाने और उन्हें तोड़ने की तमाम कोशिशें की लेकिन बड़े तो बड़े छोटे छोटे सिख बच्चों तक को मुगल झुका नहीं सकें, जिसकी चिढ़ उन्हें हमेशा रही थी। मुगलों के अत्याचार का सामना करने के लिए ही छठे गुरु हरगोबिंद साहिब ने हथियार उठाया था, और उनके बाद दसवें गुरु साहिब गुरु गोबिंद सिंह की भी मुगलों के खिलाफ आजीवन लड़ते रहें। उन्होंने सिखो को सिख होने का सही अर्थ समझाने के लिए ही खालसा की स्थापना की थी, पंज प्यारों को बनाया था।
दसवें गुरु के जीवन से जुड़े, उनके परिवार से जुड़े, उनकी शहीदी से जुड़े कई किस्से अपने कईयों बार सुने होंगे, लेकिन गुरु साहिब की चमक के आगे उनके उन भाइयों की शहादत के बारे में बातें ही नहीं होती, जिन्होंने मात्र 19 साल के गुरु साहिब की रक्षा में अपने प्राणों को न्योछावर कर दिया। अपने इस वीडियो में हम दसवें गुरु साहिब के उन वीर चेहरे भाइयों के बारे में जानेंगे जिन्होंने गुरु साहिब के लिए एक पिता की भूमिक अदा की थी। जिन्होंने गुरु साहिब को न केवल संरक्षित किया था बल्कि उन्हें मुगलों के खिलाफ मजबूत भी किया था। आइए जानते है कि कौन थे गुरु साहिब के वो वीर और साहसी भाई ।।
गुरु साहिब के पांच भाई
सिखों के दसवें गुरु गुरू गोबिंद सिंह जी के पिता औऱ नौवे गुरू तेग बहादुर जी को आरंगजेब ने 1675 में शहीद कर दिया था, उस वक्त दसवे गुरु साहिब मात्र 9 साल के थे.. लेकिन उनकी आध्यत्मिक शक्ति के कारण पिता की मृत्यु के बाद मात्र 10 साल की उम्र में ही वैशाखी के दिन 29 मार्च 1676 को दसवां गुरु घोषित कर दिया गया। गुरु बनने के बाद भी वो शिक्षा युद्द कौशल सिखते रहे.. इस दौरान वो पाओंटा नाम की जगह पर रहे थे.. गुरु साहिब के इस प्रशिक्षण में उनकी बुआ बीबी वीरो का प्रभाव भी काफी रहा था.. बीवी वीरो छठे गुरु साहिब गुरु हरगोबिंद साहिब की बेटी थी।
बीबी वीरो जिनका जन्म 1615 में हुआ था उनका विवाह भाई साधु से हुआ था, जो मल्ला गाँव के एक खोसिया खत्री सिख से हुआ था। जिसके बाद उनकी पांच संताने सांगो शाह, जीत मल, गुलाब चंद, महरी चंद और गंगा राम हुए.. वैसे तो गुरु साहिब के सानिध्य में रहने वाला हर एक शख्स भी उनकी तरह अजर अमर हो गया लेकिन बीबी वीरो के बेटों का दसवे गुरु की जिंदगी में क्या महत्व था.. इस पर चर्चा कम होती है.. वहीं गुरु साहिब को पहली जीत दिलाने में इन पांच भाईयो का योगदान ही गुरु साहिब को हमेशा के लिए अजर अमर बना गया..
भंगानी का युद्ध – The Battle of Bhangani
ये बात सितंबर 1688 की है, उस वक्त गुरु साहिब की उम्र 22 साल थी.. वो गुरु गद्दी की जिम्मेदारियों को बखूबी संभाल रहे थे, लेकिन अब बारी थी उनके तलवार की ताकत दिखाने की.. श्रीनगर गढ़वाल के राजा फतेह शाह जो पहले गुरु साहिब के भक्त हुआ करते थे, उन्होंने बेटी के विवाह का वादा किया था, लेकिन राजा भीमचंद ने फतेह शाह को भड़का दिया.. क्योंकि गुरू साहिब ने भीमचंद को हाथी और हथियार देने से इंकार कर दिया था, इस अपमान का बदला लेने के लिए उसने फतेह शाह और गुरु साहिब के बीच खटास पैदा कर दी और शादी का वादा भी तुड़वा दिया।
साथ ही फतेह शाह को उनके खिलाफ युद्ध के लिए खड़ा कर दिया.. जिसके बाद गुरु साहिब ने फतेह शाह के साथ 18 सितंबर 1688 के दिन पोंटा से 11 किमी दूर स्थित भंगानी नाम की जगह, जो कि इस वक्त हिमाचल प्रदेश के वर्तमान सिरमौर जिले में पोंटा साहिब गुरुद्वारे से 11 किलोमीटर दूर स्थित है, वहां पर युद्ध शुरु कर दिया।
गुरु साहिब की जीत का किला
जिसे भंगानी का युद्ध कहा जाता है। ये गुरु साहिब की जिंदगी का पहला युद्ध था… लेकिन गुरु साहिब के साथ ढाल की तरह ख़ड़े थे उनके पांचो भाई..जो अपनी माता की आज्ञा से गुरु साहिब के साथ युद्ध लड़ने पहुंच गए थे। कहा जाता है कि इस युद्ध के पहले गुरु साहिब की सेवा में लगे पठान लड़ाको ने गुरु साहिब का साथ छोड़ कर मुगलो का दामन थाम लिया था, जिससे गुरु साहिब अकेले पड़ गए थे, लेकिन तब ये पांचो भाई गुरु साहिब के सबसे मजबूत योद्धा बने। इस युद्ध में भाई सांगो गुरु साहिब की सेना के कमांडर थे, तो वहीं बाकी के चार भाई सेना की तरह लड़े थे, पांचो भाईयो ने अपनी बहादुरी का परचम लहराते हुए युद्ध को मैदान को गुरु साहिब की जीत का किला बना दिया।
भाई सांगो शाह और भाई जीत मल वीरगति को प्राप्त हुए
हालांकि इस युद्ध के दौरान दुश्मनों से लड़ते हुए भाई सांगो शाह और भाई जीत मल वीरगति को प्राप्त हुए थे… लेकिन ये वीरगति हमेशा के लिए उन्हें अमर कर गई…जो दसवें गुरु के पहले युद्ध में जीत की कहानी बने थे। गुरु साहिब ने ये युद्ध जीता और उन राजाओं को भी करारा जवाब दिया जो उन्हें कमजोर आकर उनके खिलाफ जाने की कोशिश कर रहे थे। गुरु साहिब के पांचो भाईयों ने ये साबित किया था कि केवल खून के रिश्ते से ही रिश्ता नहीं निभाया जाता है, बल्कि सच्ची भक्ति तभी है जब आप पूरी निष्ठा से निडर होकर गुरु की सेवा में अपना जीवन अर्पित करें। ये प्रतीक है सिखो के गौरव की.. उनकी निष्ठा की.. उनके बलिदान की.. हालांकि अफसोस है कि ये ऐसे जाबांज है जिनके बारे में बातें कम ही होती है।





























