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Chhattisgarh News: छत्तीसगढ़ में सवालों के घेरे में विकास: खेती की ज़मीन पर क्यों लग रही हैं सीमेंट फैक्ट्रियां?

Nandani | Nedrick News

Published: 09 Jan 2026, 02:04 PM | Updated: 09 Jan 2026, 02:04 PM

Chhattisgarh News: छत्तीसगढ़ में जल–जंगल–ज़मीन को लेकर चल रहा विरोध अब एक बार फिर तेज होता दिख रहा है। सरगुजा जिले में माइंस के खिलाफ जोरदार आंदोलन के बाद अब खैरागढ़ जिले के छुईखदान क्षेत्र में किसानों और ग्रामीणों ने प्रस्तावित सीमेंट फैक्ट्री के खिलाफ मोर्चा खोल दिया है। श्री सीमेंट लिमिटेड की संडी चूना पत्थर खदान परियोजना को लेकर शुरू हुआ यह विरोध बीते तीन दिनों से लगातार तेज हो रहा है। 7 दिसंबर 2025 को यह आंदोलन उस वक्त उग्र हो गया जब शांतिपूर्ण प्रदर्शन के बीच अचानक हालात बिगड़ गए।

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शांत प्रदर्शन से तनावपूर्ण माहौल तक (Chhattisgarh News)

छुईखदान में 6 दिसंबर की सुबह तक किसानों और ग्रामीणों का प्रदर्शन पूरी तरह शांतिपूर्ण था। लोग नारेबाजी करते हुए अपनी मांगें रख रहे थे और प्रशासन से जनसुनवाई रद्द करने की अपील कर रहे थे। लेकिन शाम होते-होते स्थिति बदलने लगी। पुलिस द्वारा ट्रैक्टर-ट्रालियों को रोके जाने के बाद ग्रामीणों में नाराजगी फैल गई और विरोध धीरे-धीरे उग्र रूप लेने लगा।

40 गांवों से हजारों ग्रामीण हुए शामिल

करीब 40 गांवों से हजारों की संख्या में किसान और ग्रामीण छुईखदान पहुंचे। 200 से अधिक ट्रैक्टर-ट्रालियों के काफिले में महिलाएं, युवा और बुजुर्ग सभी शामिल थे। ग्रामीणों का कहना है कि 11 दिसंबर 2025 को प्रस्तावित जनसुनवाई को किसी भी हाल में रद्द किया जाना चाहिए, क्योंकि प्रभावित गांव पहले ही इस परियोजना को सिरे से खारिज कर चुके हैं।

“सीमेंट फैक्ट्री से बर्बाद होगा गांव का भविष्य”

ग्रामीणों का आरोप है कि अगर खदान और सीमेंट फैक्ट्री शुरू हुई तो इससे इलाके में भारी मात्रा में धूल फैलेगी, जिससे पर्यावरण को नुकसान पहुंचेगा और लोगों की सेहत पर भी बुरा असर पड़ेगा। खेती, पशुपालन और जलस्रोतों पर इसका सीधा असर पड़ेगा। इसी वजह से खदान क्षेत्र के 39 गांव पहले ही लिखित रूप में अपना विरोध दर्ज करा चुके हैं।

संडी, पंडारिया, विचारपुर और भरदागोड़ की पंचायतों ने ग्रामसभा में प्रस्ताव पारित कर साफ कर दिया है कि वे इस परियोजना को किसी भी सूरत में मंजूरी नहीं देंगे। ग्रामीणों का कहना है कि जब लोगों की राय पहले से साफ है, तो फिर जनसुनवाई कराने का कोई औचित्य नहीं है।

पुलिस बैरिकेडिंग से भड़के किसान

जब किसानों का काफिला छुईखदान नगर सीमा पर पहुंचा तो पुलिस ने बैरिकेड लगाकर ट्रैक्टर-ट्रालियों को रोक दिया। इससे हालात तेजी से बिगड़ गए। नाराज किसानों ने सड़क पर बैठकर विरोध शुरू कर दिया और नारेबाजी करने लगे। करीब आधे घंटे तक पुलिस और किसानों के बीच बातचीत चली, लेकिन जब कोई समाधान नहीं निकला तो किसान ट्रैक्टर वहीं छोड़कर पैदल ही जुलूस की शक्ल में आगे बढ़ गए।

ग्रामीणों का कहना है कि पुलिस की यही कार्रवाई आंदोलन के उग्र होने की सबसे बड़ी वजह बनी। उनका आरोप है कि वे शांतिपूर्ण तरीके से अपनी बात रखना चाहते थे, लेकिन उन्हें जानबूझकर रोका गया।

एसडीएम कार्यालय तक पहुंचा विरोध

पैदल मार्च करते हुए ग्रामीण सीधे एसडीएम कार्यालय पहुंचे और वहां ज्ञापन सौंपा। ज्ञापन में 11 दिसंबर को प्रस्तावित जनसुनवाई को तत्काल रद्द करने की मांग की गई। किसानों का कहना है कि इस परियोजना से इलाके के जलस्रोत, बोरवेल रिचार्ज, खेती-बाड़ी और पशुपालन सभी खतरे में पड़ जाएंगे।

सड़क जाम और लाठीचार्ज, हालात बेकाबू

ज्ञापन सौंपने के बाद ग्रामीणों ने राजनांदगांव–कवर्धा मुख्य मार्ग पर बैठकर सड़क जाम कर दिया। जब पुलिस ने उन्हें हटाने की कोशिश की तो दोनों पक्षों के बीच झड़प हो गई। स्थिति संभालने के लिए पुलिस ने लाठीचार्ज किया, लेकिन इससे हालात और बिगड़ गए। गुस्साए प्रदर्शनकारियों ने बैरिकेड तोड़ दिए और पुलिस को पीछे हटना पड़ा।

“तीन फसल वाली जमीन पर फैक्ट्री मतलब किसानों की हत्या”

दैनिक भास्कर की रिपोर्ट के अनुसार, तहसील कार्यालय के बाहर किसानों को संबोधित करते हुए किसान नेता सुरेश टिकम ने कहा कि जहां साल में तीन फसल होती है, वहां फैक्ट्री लगाना सीधे-सीधे किसानों की हत्या के बराबर है। उन्होंने आरोप लगाया कि सरकार सौ लोगों को नौकरी देने के नाम पर हजारों किसानों की रोजी-रोटी छीनने पर आमादा है।

आंदोलन और तेज करने की चेतावनी

ग्रामीणों ने प्रशासन को साफ चेतावनी दी है कि अगर 11 दिसंबर को होने वाली जनसुनवाई रद्द नहीं की गई तो आंदोलन और तेज किया जाएगा। अब तक विरोध शांतिपूर्ण रहा है, लेकिन अनदेखी जारी रही तो हालात और बिगड़ सकते हैं। ग्रामीणों का कहना है कि वे अपने जल, जमीन और पर्यावरण की रक्षा के लिए किसी भी हद तक जाने को तैयार हैं।

जल–जंगल–जमीन की लड़ाई और मजबूत

छत्तीसगढ़ में जंगलों की कटाई और प्राकृतिक संसाधनों को बचाने की लड़ाई कोई नई नहीं है। वर्षों से लोग अपनी जमीन और हक के लिए सड़कों पर उतरते रहे हैं। छुईखदान की हालिया घटनाओं ने साफ कर दिया है कि यह संघर्ष अब और मजबूत हो रहा है और स्थानीय लोग पहले से ज्यादा एकजुट होकर अपने भविष्य की लड़ाई लड़ने के लिए तैयार हैं।

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Nandani

nandani@nedricknews.com

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