Muslism Eat sikh Langar: जब 15वी सदी में सिख धर्म की शुरुआत हुई थी तब उनकी सबसे मजबूत स्तंभ मानवता की सेवा करना था..जातपात और धर्म का भेद खत्म करने और सिख धर्म की महानता को दर्शाने के लिए सबसे बेहतर तरीका था सामूहिक रूप से लंगर.. जिसे हर सिख अपनी कमाई का एक हिस्सा देकर करने की पेशकश रखता आया है। लंगर जो कि हर छोटे बड़े गुरुद्वारों में करने की शुरुआत की गई, जहां हर धर्म के, हर मजहब के, हर जाति के लोगो को आकर एक ही पंक्ति में बैठकर खाने की इजाजत होती है… गुरू साहिब की ये कोशिश भेदभाव के खिलाफ ही शुरु हुई थी। जो आज भी गुरुद्वारों में जारी है।
गुरुद्वारों में लंगर के लिए कभी किसी से कोई पैसा नहीं लिया जाता है.. जिसके कारण ये लंगर और ज्यादा खास हो जाते है, अमीर से अमीर सिख भी संगत सेवा करता है.. जो बताता है कि मालिक के दरबार में सब एक समान है, कोई राजा नहीं कोई रंक नहीं..सिखों से ज्यादा हिंदूओं को आपने गुरुद्वारे में जाते देखा होगा..लंगर खाते देखा होगा..लेकिन एक सवाल अभी भी आपके मन में उठता होगा कि प्रथम गुरु गुरु नानक देव जी ने इस्लाम धर्म को मानने वाले भाई मरदाना जी के साथ दुनिया की यात्रा की थी, लेकिन आज के समय में हिंदुओं की तरह मुसलमान भी लंगर खा सकते है या नहीं.. क्या है इस्लामिक उलेमा।
सिख गुरुओ की हत्या
सिखों और मुसलमानों की कभी आपस में खास बनी नहीं…कुछ ऐसी ही छवि अब तक दुनिया में बनी हुई है… मुगलो के कारण सिख गुरुओ की हत्याओं ने इस भ्रांति को और ज्यादा हवा दी थी, लेकिन सच तो ये है कि सिख धर्म की शुरुआत और उसके प्रचार में गुरु साहिब के साथ सायें की तरह रहे थे भाई मरदाना। इसके अलवा पवित्र ग्रंथ श्री गुरू ग्रंथ साहिब में भी सिख गुरुओ के साथ साथ इस्लामिक सूफियों को भी जगह मिली है।
यानि कि ये तो तय है कि सिखों ने कभी भी इस्लाम से नफरत या फिर कोई बैर नहीं रखा.. हां ये भी सच है कि सिखों ने इस्लामिक दमनकारी ताकतों के आगे घुठने नहीं टेकें। खासकर जब मुगलो ने जबरन लोगो को धर्म परिवर्तन करने के लिए मजबूर किया तब भी सिखों ने डर का नहीं साहस का रास्ता चुना था, जिससे दोनो धर्मों के लोगो में एक दूसरे के प्रति कहीं न कहीं एक दूरी बन गई, जो वक्त के साथ बढ़ती चली गई। अब सवाल ये ही क्या मुसलमान लंगर खा सकते है..
क्या मुसलमान लंगर खा सकते है?
सिख धर्म और इस्लाम दोनो में ही मूर्ति पूजा निषेध है। दोनो ही धर्मों में किसी मूर्ति, या देवी देवता की पूजा नहीं होती बल्कि जहां इस्लाम में पवित्र कुरान की इबादत की जाती है, कुरान की बातों का ही अनुसरण करके चला जाता है तो वहीं सिख धर्म में भी पवित्र श्री गुरु ग्रंथ साहिब की अरदास होती है.. और 10 गुरुओ के बताये रास्ते पर चलने वाला ही सच्चा सिख कहलाता है.. ऐसे में सिखो की परंपरा के अनुसार क्या मुसलमान लंगर खा सकते है.. तो इसका जवाब कई उलेमाओं ने दिया है।
सिख धर्म से जुड़े रीति रिवाज में शामिल नहीं होते
इस्लामिक उलेमाओं का कहना है कि अगर कोई इस्लाम को फॉलो करता है तो उसे किसी और मजहबी के प्रार्थना स्थल में जाने की इजाजत नहीं है। हालांकि इस्लाम को मानने वाला किसी से भी दोस्ती कर सकती है, ये केवल इंसानियत के नाते होना चाहिए…वहीं अगर किसी मुसलमान को केवल ये जानना है कि गुरुद्वारे में कैसे अरदास होती है, तो केवल जानकारी के लिए जा सकते है, लेकिन आप उनके पवित्र ग्रंथ के आगे सिर नहीं झुका सकते है। केवल जानकारी या रिसर्च के परपस से जा सकते है, लेकिन जो सिखों धर्म से जुड़े रीति रिवाज है उसमें शामिल नहीं हो सकते है। जिसमें उनका बांटा जा रहा लंगर खाना भी शामिल है। ये एक तरह से सिखों द्वारा अर्पित प्रसाद ही होता है और मुसलमान इसका सेवन नहीं कर सकते है। यानि की कुल मिलाकर इस्लाम को मानने वाले सिख धर्म हो या कोई और धर्म, वो किसी और धर्म के रीति रिवाजो को न तो फॉलो कर सकते है और न ही उनके क्रियाकलापो से जुड़े किसी कार्य में हिस्सा लें सकते है।






























