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Buddhist monks shaved heads: बौद्ध भिक्षु सिर क्यों मुंडवाते हैं? जानिए इस परंपरा के पीछे की असली वजह

vickynedrick@gmail.com | Nedrick News

Published: 19 Nov 2025, 12:00 AM | Updated: 19 Nov 2025, 12:00 AM

Buddhist monks shaved heads: क्या आपने कभी सोचा है कि बौद्ध भिक्षुओं के सिर पर बाल क्यों नहीं होते? आखिर क्यों वे अपना सिर पूरी तरह मुंडवा लेते हैं? दिखने में यह एक साधारण-सी प्रैक्टिस लगती है, लेकिन इसके पीछे गहरी आध्यात्मिक सोच और हजारों साल पुरानी परंपरा छिपी है। दरअसल, बौद्ध भिक्षु बनने का मतलब है दुनियावी शोर-शराबे, दिखावे और इच्छाओं से दूरी बनाकर एक शांत, अनुशासित और आध्यात्मिक जीवन अपनाना। इस नए जीवन की शुरुआत ही सिर मुंडवाने से होती है, जिसे बौद्ध परंपरा में बेहद पवित्र और महत्वपूर्ण माना जाता है।

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भिक्षु बनने का मतलब: एक नए जीवन की शुरुआत

जब कोई व्यक्ति भिक्षु बनता है, तो वह अपने पुराने जीवन को पीछे छोड़ देता है। परिवार, नौकरी, सामाजिक पहचान और भौतिक सुख सबसे दूरी बना लेता है। यह एक आध्यात्मिक यात्रा की शुरुआत होती है, जिसमें मन की शांति और आत्मज्ञान प्राथमिक लक्ष्य बन जाते हैं। सिर मुंडवाना इसी नई शुरुआत का सबसे पहला और महत्वपूर्ण कदम माना जाता है।

बाल अहंकार और दिखावे का प्रतीक (Buddhist monks shaved heads)

बौद्ध मान्यताओं के अनुसार बाल इंसान में घमंड, दिखावे और सौंदर्य की आसक्ति को बढ़ाते हैं। सुंदर बाल या अलग-अलग हेयरस्टाइल व्यक्ति को अपनी खूबसूरती या सामाजिक छवि के प्रति जागरूक रखते हैं। भिक्षुओं के लिए यह सब मन को भटकाने वाला माना जाता है। इसलिए जब वे भिक्षु बनने की दीक्षा लेते हैं, तो अपने बालों को त्यागकर यह दर्शाते हैं कि, “अब मैं अहंकार और दिखावे से मुक्त होकर आध्यात्मिक मार्ग पर चल रहा हूँ।”

भौतिक जीवन से दूरी का प्रतीक

सिर मुंडवाना इस बात का संकेत भी है कि भिक्षु अब सामान्य सामाजिक जीवन से पूरी तरह अलग हो चुका है। यह एक तरह का आध्यात्मिक त्याग है कि “अब मेरा जीवन साधना, सेवा और शांति के लिए समर्पित है।” यह बदलाव न सिर्फ बाहरी रूप में दिखता है, बल्कि मनोवैज्ञानिक रूप से भी व्यक्ति को नई राह पर स्थापित करता है।

बुद्ध ने भी बाल त्यागकर किया था ज्ञान का मार्ग शुरू

बौद्ध धर्म में इस प्रथा का सबसे बड़ा कारण बुद्ध का उदाहरण है। कहानी के अनुसार, जब सिद्धार्थ महल और राजसी जीवन छोड़कर ज्ञान की खोज में निकले, तो उन्होंने तलवार से अपने बाल काट लिए। यह उनका पहला बड़ा त्याग था, जो दर्शाता था कि वे अब राजकुमार नहीं, बल्कि एक साधक हैं। आज भी भिक्षु उसी परंपरा का पालन करते हुए सिर मुंडवाते हैं ताकि बुद्ध के मार्ग के और करीब आ सकें।

दिखावे और फैशन से मुक्ति

जब सिर पर बाल नहीं होते तो भिक्षु को न तो हेयरस्टाइल की चिंता रहती है, न फैशन के पीछे भागने की। यह साधारण-सा परिवर्तन उनके मन से कई तरह के तनाव और बाहरी चिंताओं को खत्म कर देता है। क्योंकि जितना कम ध्यान रूप-रंग पर लगेगा, उतनी अधिक ऊर्जा ध्यान और साधना में लगाई जा सकेगी। यही कारण है कि मुंडन को साधना के लिए एक महत्वपूर्ण कदम माना जाता है।

विनय पिटक में सख्त नियम

वहीं, बौद्ध भिक्षुओं के लिए बने नियमों की पुस्तक विनय पिटक में सिर मुंडवाने को अनिवार्य बताया गया है। इसमें ये बातें खास तौर पर लिखी हैं जैसे:

  • बाल रेज़र से हटाए जाएँ
  • बालों को रंगना या स्टाइल करना मना है
  • बालों को संवारना या उनका ध्यान रखना भी अनुचित माना गया है

इन नियमों का पालन भिक्षु के अहंकार को नियंत्रित करने और सरलता बनाए रखने के लिए किया जाता है।

समानता और समुदाय का प्रतीक

मुंडा हुआ सिर भिक्षुओं की पहचान भी है। इससे सभी भिक्षु बिना किसी भेदभाव के एक समान दिखते हैं। न धन का फर्क, न जाति का, न सामाजिक स्तर का सभी एक ही समुदाय का हिस्सा माने जाते हैं। यह समानता बौद्ध धर्म के मूल सिद्धांतों में से एक है।

मानसिक शांति और ध्यान में आसानी

कई अध्ययनों और अनुभवों से पता चला है कि जब व्यक्ति दिखावे और रूप-रंग से मुक्त होता है, तो मन अधिक शांत और स्थिर रहता है। भिक्षुओं का जीवन भी इसी सिद्धांत पर आधारित है। मुंडन से वे मानसिक रूप से हल्के और केंद्रित महसूस करते हैं, जिससे ध्यान लगाना आसान होता है।

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