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Atul Subhash Suicide Case: एक साल बाद भी इंसाफ का इंतजार, क्या उसकी अस्थियां मिलेगा न्याय या गटर में बह जाएगा इंतजार?

vickynedrick@gmail.com | Nedrick News

Published: 10 Dec 2025, 12:00 AM | Updated: 10 Dec 2025, 12:00 AM

Atul Subhash Suicide Case: अतुल सुभाष का नाम, जो एक साल पहले बेंगलुरु में आत्महत्या करने वाले सॉफ्टवेयर इंजीनियर के रूप में सामने आया था, आज भी लोगों के दिलों में सवालों और यादों के साथ ताजा है। 9 दिसंबर 2024 को अतुल ने अपनी जिंदगी का अंत कर लिया, लेकिन उसकी मौत के साथ जो कहानी जुड़ी है, वह इंसाफ की प्रतीक्षा में अब भी खत्म नहीं हुई है। एक साल बाद भी अतुल की आखिरी ख्वाहिशें और उसके द्वारा छोड़ी गई मौत के पैकेट का इंतजार जारी है, जो न्याय की तलाश में घर के कोने में बंद पड़ा है।

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अतुल की आत्महत्या ने सिर्फ उसके परिवार को ही नहीं, बल्कि समाज और न्याय प्रणाली को भी सवालों के घेरे में ला दिया था। एक सुसाइड नोट और 81 मिनट के सुसाइड वीडियो के जरिए उसने अपनी मौत के लिए जिम्मेदार लोगों के नाम भी बताए थे। इस पूरे मामले की सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि अब तक, एक साल बाद भी, उसे न्याय नहीं मिला है।

अतुल का सुसाइड नोट और वीडियो (Atul Subhash Suicide Case)

अतुल सुभाष ने अपनी मौत से पहले एक 24 पन्नों का सुसाइड नोट लिखा था, जिसमें उसने अपनी मौत के लिए अपनी पत्नी, सास, ससुर और कुछ अन्य लोगों को जिम्मेदार ठहराया था। उसने अपनी मौत के बाद न्याय मिलने तक अपनी अस्थियों को सुरक्षित रखने की इच्छा जताई थी। अगर अदालत उसे इंसाफ नहीं देती, तो उसने अपनी अस्थियों को अदालत के बाहर किसी गटर में बहाने की इच्छा जताई थी।

अतुल के इस अंतिम संदेश को सुनते हुए हर किसी के दिल में यह सवाल उठता है कि क्या हमारे देश में किसी व्यक्ति को इंसाफ पाने के लिए अपनी जान तक की कीमत चुकानी पड़ती है? क्या किसी की जिंदगी और मौत को भी सत्ताधीशों के फैसलों पर निर्भर रहना पड़ता है?

पहली सुनवाई का इंतजार

अतुल सुभाष की मौत के एक साल बाद, उसकी अस्थियां एक कलश में बंद होकर घर के कोने में रखी हैं, जो अब भी न्याय की प्रतीक्षा कर रही हैं। आपको यह जानकर हैरानी होगी कि अतुल की मौत के 90 दिनों के भीतर जिस अदालत में चार्जशीट दायर होनी चाहिए थी, वह चार्जशीट 11 महीने बाद 6 नवंबर 2005 को दायर की गई। और जब कोर्ट ने चार्जशीट दायर करने के बाद पहली सुनवाई की तारीख तय की, तो वह तारीख भी एक साल बाद यानी 20 नवंबर 2026 की दी गई।

सिर्फ यही नहीं, अदालत ने थोड़ी रियायत दी और कहा कि यह तारीख बहुत दूर है, तो मार्च 2026 में पहली सुनवाई कर ली जाएगी। फिर, अंत में अदालत ने दिसंबर 2025 में तारीख मुकर्रर की, जिससे यह साफ हो गया कि न्याय का सफर शुरू होने में ही इतना लंबा वक्त लग रहा है।

अतुल की आखिरी ख्वाहिशें

अतुल ने अपनी मौत से पहले 12 ख्वाहिशें जताई थीं। इनमें से कुछ ख्वाहिशें न्याय के रास्ते पर हैं, जिनमें से एक थी कि उसकी अस्थियों को तब तक न बहाया जाए जब तक उसे इंसाफ न मिल जाए। और अगर अदालत इंसाफ नहीं देती है, तो उसकी अस्थियों को किसी गटर में बहा दिया जाए। अतुल ने अपनी बीवी और ससुराल वालों के खिलाफ कई गंभीर आरोप लगाए थे, जिनमें सबसे प्रमुख था उसके ऊपर लगाए गए झूठे मुकदमे और मानसिक उत्पीड़न।

इस पूरे प्रकरण में एक सबसे दुखद पहलू यह है कि अतुल की पत्नी निकिता, सास और ससुराल वाले पहले ही जमानत पर बाहर हैं, और उनकी जिंदगी सामान्य चल रही है, जबकि अतुल की अस्थियां अभी भी न्याय के इंतजार में हैं। अतुल के बेटे को कोर्ट ने उसकी मां को दे दिया था, और वह अपनी मां के पास रह रहा है। अतुल ने अपने बेटे के नाम एक लेटर और पैकेट छोड़ा था, जिसमें उसने कहा था कि जब उसका बेटा 18 साल का हो जाएगा, तब वह पैकेट खोलेगा।

अदालत का निश्चय और न्याय का इंतजार

अतुल के मामले ने एक बार फिर भारतीय न्यायपालिका की गति और गंभीरता पर सवाल उठाए हैं। अगर न्याय के लिए एक साल का इंतजार करना पड़ता है, तो सोचिए बाकी मामलों का क्या होता होगा? इसका सबसे बड़ा उदाहरण यह है कि जहां अतुल की मौत के बाद उसके केस की चार्जशीट 11 महीने बाद दाखिल की जाती है, वहीं पहली सुनवाई की तारीख एक साल बाद दी जाती है। यह स्थिति न सिर्फ पीड़ित के परिवार के लिए अत्यधिक कठिन है, बल्कि यह समाज में न्याय के प्रति अविश्वास को भी बढ़ाती है।

अतुल के सुसाइड की कहानी

अतुल की आत्महत्या की कहानी सिर्फ एक मौत की कहानी नहीं है, बल्कि यह रिश्तों, संघर्षों और असमानताओं की कहानी है। शादी के बाद अतुल और उसकी पत्नी के बीच विवाद शुरू हो गए थे। इसका मुख्य कारण था पैसों का दबाव और सास का हस्तक्षेप। अतुल अपनी पत्नी और ससुराल वालों को पहले ही पैसे दे चुका था, लेकिन फिर भी उसके ऊपर अतिरिक्त पैसे मांगने का दबाव डाला गया। इस समस्या के कारण अतुल मानसिक रूप से परेशान हो गया था।

अतुल का मानना था कि वह और उसका परिवार कानूनी लड़ाई के इस लंबे सिलसिले में फंसे हुए थे, जिसमें बार-बार तारीखें टलती जा रही थीं। अतुल के सुसाइड नोट में उसने लिखा था कि वह अब इस सिस्टम में नहीं रह सकता, क्योंकि उसे लगता था कि उसकी मेहनत और पैसों का गलत इस्तेमाल हो रहा था।

समाज और न्यायपालिका के लिए एक बड़ा सवाल

अतुल की मौत ने समाज और न्यायपालिका दोनों को एक बड़ा सवाल दिया है। क्या किसी इंसान को न्याय पाने के लिए अपनी जान देनी पड़ती है? क्या यह सिर्फ एक व्यक्ति का मुद्दा है, या यह एक सिस्टम की विफलता का परिणाम है? क्या हमारी न्यायपालिका इतनी धीमी और संवेदनहीन हो गई है कि एक इंसान की आखिरी ख्वाहिश को पूरा करने में भी एक साल का वक्त लगता है?

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