Live-in Relationship Law: इलाहाबाद हाईकोर्ट के लिव-इन रिलेशनशिप पर हालिया फैसले ने उन सवालों को हवा दे दी है, जो शायद अब कभी शांत न हों। इसका खामियाजा अंततः समाज को ही भुगतना पड़ सकता है। अक्सर लोग विवाद होने पर कहते हैं’ आई विल सी यू इन कोर्ट’ क्योंकि उनका भरोसा कानून की निष्पक्षता पर होता है। लेकिन क्या हो जब कोर्ट पहुँचने पर पता चले कि जिस इंसाफ की उम्मीद थी, वहां कानून की व्याख्या ‘जेंडर’ (लिंग) देखकर बदल रही है? क्या हमारा कानून पुरुषों और महिलाओं के लिए अलग-अलग पैमानों पर खड़ा है? जब अदालतें शादीशुदा पुरुषों और महिलाओं के लिव-इन मामलों में अलग-अलग तर्क देने लगें, तो यह भरोसा डगमगाने लगता है। क्या कानून अब ‘संवैधानिक अधिकारों’ के बजाय ‘सामाजिक नैतिकता’ के आधार पर भेदभाव कर रहा है?
एक तरफ न्यायपालिका का यह सिद्धांत है कि उसका काम कानून के दायरे में फैसला देना है, न कि सामाजिक या पारिवारिक नैतिकता के आधार पर। लेकिन दूसरी ओर, जब कुछ फैसलों में ‘पारिवारिक मूल्यों’ की दुहाई देकर महिलाओं के प्रति कठोर रुख अपनाया जाता है, तो सवाल उठना लाजिमी है। क्या इस तरह के दोहरे मापदंड (Double Standards) न्यायपालिका की निष्पक्ष छवि और उसकी गरिमा को ठेस नहीं पहुंचाते?
क्या कहा कोर्ट ने?
जस्टिस जेजे मुनीर और जस्टिस अरुण सक्सेना की बेंच ने स्पष्ट कहा अगर कोई कृत्य कानून के तहत अपराध नहीं है, तो महज समाज की नजर में ‘गलत’ होने की वजह से कोर्ट उसे गलत नहीं ठहरा सकता। यानी कोर्ट केवल ‘कानून की किताब’ देखेगा, न कि ‘लोगों की सोच’। लेकिन यहाँ एक बड़ा और चुभता हुआ सवाल खड़ा होता है जब मामला महिलाओं का आता है, तो यही अदालत ‘कानून’ के बजाय ‘पारिवारिक मूल्यों’ की दुहाई क्यों देने लगती है? क्या कानून की व्याख्या जेंडर (लिंग) के आधार पर बदल जानी चाहिए? क्या इंसाफ की तराजू अब इस आधार पर झुकेगी कि कटघरे में खड़ा व्यक्ति पुरुष है या महिला? यह सवाल आज न्यायपालिका की साख के सामने खड़ा है।
शादीशुदा आदमी का लिव-इन में रहना अपराध नहीं
कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि यदि कोई विवाहित पुरुष किसी बालिग महिला के साथ आपसी सहमति से लिव-इन रिलेशनशिप (Live-in Relationship) में रहता है और इसमें किसी कानून का उल्लंघन नहीं हो रहा, तो इसे अपराध नहीं माना जाएगा। लेकिन यहाँ न्याय के तराजू पर एक बड़ा सवाल खड़ा होता है: अगर विवाहित पुरुष का बालिग महिला के साथ रहना अपराध नहीं है, तो एक विवाहित महिला के लिए यही नियम ‘अवैध’ या ‘अनैतिक’ क्यों हो जाता है? क्या संविधान का अनुच्छेद 14 (समानता का अधिकार) जेंडर के आधार पर बदल जाता है? सुप्रीम कोर्ट ने 2018 के जोसेफ शाइन केस में स्पष्ट कहा था कि पति अपनी पत्नी का ‘मालिक’ नहीं है। ऐसे में, जो राहत पुरुष को मिल रही है, वही सुरक्षा महिला का भी संवैधानिक अधिकार है।
किस मामले पर कोर्ट का फैसला
यह मामला एक ऐसे कपल का है जो लिव-इन रिलेशनशिप में रह रहा है। महिला ने पुलिस को बताया वह बालिग है और अपनी मर्जी से अपने पार्टनर के साथ रह रही है, लेकिन उसके परिवार वाले इस रिश्ते से नाराज हैं। उन्हें लगातार धमकियां दी जा रही हैं। दिलचस्प बात यह है कि इस मामले में पुरुष पहले से विवाहित (Married) है, फिर भी कोर्ट ने महिला की बालिग होने की दलील और उनकी ‘निजी स्वतंत्रता’ को सर्वोपरि माना और उन्हें सुरक्षा देने का आदेश दिया।
वहीं इलाहाबाद हाईकोर्ट ने हाल के कुछ मामलों (जैसे नवंबर और दिसंबर 2025 ) में शादीशुदा महिलाओं को लिव-इन पार्टनर के साथ पुलिस सुरक्षा देने से इनकार किया था। साथ ही अदालत का तर्क था कि यदि वह ऐसे जोड़ों को पुलिस सुरक्षा प्रदान करती है, तो यह अप्रत्यक्ष रूप से ‘अवैध संबंधों’ को मान्यता देने जैसा होगा। कोर्ट ने कहा कि बिना तलाक लिए किसी और के साथ रहना कानूनन ‘द्विविवाह’ (Bigamy) के अपराध की श्रेणी में आ सकता है, और अदालत ऐसे किसी भी कृत्य को सुरक्षा नहीं दे सकती जो कानून की नजर में अपराध हो। तो इससे अब आम जनता ये समझे की अदालतों में भी लिंग देख कर फैसले होंगे।
ऑनर किलिंग का खतरा
इस मामले में महिला ने स्पष्ट किया कि उसे और उसके साथी को ‘ऑनर किलिंग’ का खतरा है। पुलिस की निष्क्रियता पर हाईकोर्ट ने कड़ी नाराजगी भी जताई। लेकिन यहाँ एक बड़ा विरोधाभास (Contradiction) दिखता है एक तरफ कोर्ट जान के खतरे पर पुलिस को फटकार लगाता है, तो दूसरी तरफ (पुराने फैसलों में) ‘पारिवारिक मर्यादा’ की आड़ लेकर सुरक्षा देने से इनकार कर देता है। क्या जान की कीमत जेंडर या सामाजिक सोच तय करेगी?
पुलिस को सख्त निर्देश
कोर्ट ने साफ कहा कि दो बालिगों की सुरक्षा करना पुलिस की जिम्मेदारी है और शाहजहांपुर के एसपी को व्यक्तिगत रूप से इसके लिए जवाबदेह बनाया। लापरवाही पर कार्रवाई की चेतावनी भी दी। लेकिन यहाँ सवाल यह है कि जहाँ अदालत पुलिस की चूक पर फटकार लगाती है, वहीं खुद अपने पिछले फैसलों में ‘नैतिकता’ के नाम पर सुरक्षा देने से हाथ खींच लेती है। जब न्याय का पैमाना ही एक समान न हो, तो अदालतों की इस चूक पर सवाल कौन उठाएगा?
गिरफ्तारी पर भी रोक
लड़की के परिवार की शिकायत पर पुलिस ने इस कपल के खिलाफ अपहरण (Kidnapping) और अन्य धाराओं में एफआईआर (FIR) दर्ज की थी। लेकिन हाईकोर्ट ने इस मामले में दखल देते हुए कपल को बड़ी राहत दी है। अदालत ने साफ निर्देश दिया है कि अगली सुनवाई तक दोनों की गिरफ्तारी पर रोक रहेगी और पुलिस उनके खिलाफ कोई भी दंडात्मक कार्रवाई नहीं करेगी।
सुप्रीम कोर्ट का क्या है स्टैंड?
सुप्रीम कोर्ट ने शक्ति वाहिनी बनाम भारत संघ (2018) के ऐतिहासिक मामले में स्पष्ट निर्देश दिए हैं कि जब भी किसी कपल की जान को खतरा हो, तो पुलिस का यह ‘संवैधानिक कर्तव्य’ है कि उन्हें सुरक्षा दे। कोर्ट ने बार-बार दोहराया है कि बालिगों की सुरक्षा करते समय उनकी ‘नैतिकता’ का टेस्ट नहीं होना चाहिए। यहाँ तक कि नंदकुमार बनाम केरल राज्य मामले में भी कोर्ट ने कहा था कि बालिगों को बिना शादी के भी साथ (Live-in Relationship) रहने का पूरा हक है। ऐसे में सवाल उठना लाजिमी है कि जब देश की सबसे बड़ी अदालत सुरक्षा को मौलिक अधिकार मानती है, तो हाईकोर्ट महिलाओं और पुरुषों के मामले में अलग-अलग ‘नैतिक चश्मा’ क्यों लगा रहा है?
आम लोगों के लिए क्या मतलब?
इस फैसले से अदालत ने यह तो साफ कर दिया है कि बालिगों को अपनी पसंद से जीने का पूरा अधिकार है। समाज या परिवार की नाराजगी की वजह से उनके संवैधानिक अधिकार नहीं छीने जा सकते और उनकी सुरक्षा करना सरकार व पुलिस की प्राथमिक जिम्मेदारी है। लेकिन यहाँ ‘समानता’ के दावे पर सवाल खड़ा होता है क्योंकि जब मामला महिलाओं का आता है, तो न्याय की भाषा बदल जाती है। तब ‘व्यक्तिगत आजादी’ के ऊपर ‘लोक-लाज’, ‘समाज’ और ‘पारिवारिक मूल्यों’ को रखा जाता है। क्या आम जनता यह समझे कि कानून की ढाल पुरुष के लिए मजबूत और महिला के लिए कमजोर है?
सवाल अब भी वही
कुल मिलाकर जहाँ एक ओर इलाहाबाद हाईकोर्ट ने यह साफ किया कि ‘कानून’ सर्वोपरि है, ‘समाज की सोच’ नहीं, वहीं दूसरी ओर महिलाओं के मामलों में अक्सर ‘पारिवारिक मूल्यों’ को संवैधानिक अधिकारों से ऊपर रख दिया जाता है। क्या यह सुप्रीम कोर्ट के उन फैसलों को दरकिनार करने जैसा नहीं है जो बराबरी की वकालत करते हैं? अंततः सवाल वही खड़ा होता है क्या इंसाफ की तराजू का झुकाव ‘जेंडर’ देखकर तय होगा? और क्या हमारा कानून वास्तव में उन ‘समान अधिकारों’ की रक्षा कर पा रहा है जिसका वादा संविधान करता है?





























