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जानिए क्या ईसाई थे आदिवासी समाज के भगवान बिरसा मुंडा

vickynedrick@gmail.com | Nedrick News

Published: 15 Jan 2024, 12:00 AM | Updated: 15 Jan 2024, 12:00 AM

बिरसा मुंडा जिन्हें आदिवासी समाज ने भगवान का दर्जा दिया है क्योंकि बिरसा मुंडा एक ऐसे शख्स थे जिन्होंने अंग्रेजों के शोषण के खिलाफ आंदोलन शुरू किया. वहीं इस शोषण के खिलाफ आवाज उठाने के दौरान अपनी शहादत के बाद आदिवासी समाज के लोग उन्हें भगवान की तरह पूजा करते हैं लेकिन बिरसा मुंडा के धर्म को लेकर कई सारे सवाल उठते हैं और कहा ये भी जाता तह कि वो ईसाई थे. वहीं इस पोस्ट के जरिए हम आपको इस बात की जानकारी देने जा रहे हैं.

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इस वजह से अपनाना पड़ा ईसाई धर्म

बिरसा मुंडा आदिवासी समाज से थे और उनका जन्म 15 नवंबर 1875 में बिहार प्रदेश के रांची जिले के उलीहातू गांव में हुआ था. उस दौरान झारखंड और बिहार एक ही राज्य हुआ करते थे और बंगाल का भी विभाजन नहीं हुआ था. उन्होंने अपनी शुरुआती पढ़ाई साल्गा गांव में की, जिसके बाद वो चाईबासा इंग्लिश मिडल स्कूल में पढ़ने आये. उन्होंने वहां पर क्रिश्चियनिटी को करीब से जाना और महसूस किया कि आदिवासी समाज हिंदू धर्म को सही से नहीं समझ रहा.

मीडिया रिपोर्ट के अनुसार, बिरसा मुंडा के माता-पिता ईसाई धर्म स्वीकार कर चुके थे. बिरसा का परिवार गरीब था जिसके कारण वो अपने मामा के गांव चले गए जहाँ पर उन्होंने दो साल तक शिक्षा ग्रहण की. स्कूल के संचालक जयपाल नाग के कहने पर बिरसा मुंडा ने जर्मन मिशन स्कूल में दाखिला ले लिया. लेकिन ईसाई स्कूल होने के कारण उन्हें ईसाई धर्म अपनाना पड़ा. इसके बाद बिरसा मुंडा का नाम बिरसा डेविड हो गया. बाद में यह नाम बिरसा दाउद हो गया.

बीबीसी की एक रिपोर्ट के अनुसार, ईसाई धर्म अपनाने के बाद वो जर्मन मिशन स्कूल में पढ़ रहे थे. इस दौरान उनके एक टीचर ने मुंडा जाति को लेकर एक अपमानजनक बात कही और ये बात सुनकर बिरसा मुंडा को गुस्सा आ गया. वहीं इसके बाद उन्होंने स्कूल और ईसाई धर्म दोनों ही छोड़ दिया.

1900 में हुई उनकी मौत 

आपको बता दें, जब ब्रिटिश शासन काल में आदिवासियों पर जुल्म हो रहा था और संस्कृति को नष्ट कर रहे थे साथ ही उनके खेतों अंग्रेजों का कब्जा होता जा रहा था. तब बिरसा मुंडा को यह देखकर बुरा लगा जिसके बाद उन्होंने अंग्रेजों के खिलाफ आवाज उठाई.

25 साल की उम्र में चक्रधरपुर में बिरसा की गिरफ्तारी हुई ये माना जाता है कि अंग्रेजों के खिलाफ व्यापक असर को देखते हुए कारागार में उन्हें जहर दे दिया गया था. लेकिन लोगों से कहा कि कारागार में हैजे की वजह से उनकी मौत हो गई. उन्होंने 9 जून 1900 में अपनी अंतिम सांस ली.

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