BMC Elections 2026: बृहन्मुंबई महानगरपालिका यानी बीएमसी के चुनाव इस बार सिर्फ नगर निकाय का चुनाव नहीं रह गए हैं, बल्कि उन्होंने महाराष्ट्र की राजनीति को ऐसे झकझोर दिया है, जैसा असर कई बार विधानसभा चुनाव भी नहीं डाल पाते। 227 वार्डों वाली यह देश की सबसे अमीर नगरपालिका है, जिसका बजट 74 हजार करोड़ रुपये से ज्यादा है। जाहिर है, इतनी ताकतवर संस्था पर कब्जे के लिए सियासत भी उतनी ही आक्रामक और कई बार मर्यादाओं से बाहर नजर आ रही है। इन चुनावों में गठबंधन, विचारधारा और राजनीतिक नैतिकता सब कुछ सवालों के घेरे में आ गया है।
मराठी अस्मिता फिर केंद्र में, लेकिन क्या असर बाकी है? (BMC Elections 2026)
बीएमसी चुनाव में सबसे ज्यादा शोर मराठी अस्मिता को लेकर सुनाई दे रहा है। करीब 20 साल बाद उद्धव ठाकरे और राज ठाकरे एक मंच पर आए हैं और ‘मराठी माणूस’ की सुरक्षा को सबसे बड़ा मुद्दा बना रहे हैं। दोनों इसे मुंबई की आखिरी लड़ाई तक कह रहे हैं। ठाकरे बंधुओं का आरोप है कि बीजेपी मुंबई को महाराष्ट्र से अलग करने की सोच रखती है और हिंदी थोपकर गैर-मराठी हितों को बढ़ावा दे रही है।
हालांकि, सवाल यह है कि क्या यह मुद्दा आज के वोटर को उतना प्रभावित करता है? मराठी वोटर अभी भी अहम हैं, लेकिन मुंबई की आबादी में उत्तर भारतीय, गुजराती और अन्य समुदायों की हिस्सेदारी भी बड़ी है। युवा वोटर खासकर सड़क, कचरा प्रबंधन, हवा की गुणवत्ता और बुनियादी सुविधाओं को प्राथमिकता दे रहे हैं। ऐसे में मराठी अस्मिता चुनावी मंच पर जितनी गर्म दिखती है, वोटिंग मशीन तक पहुंचते-पहुंचते उसका असर कम भी हो सकता है।
महायुति की एकजुटता की असली परीक्षा
राज्य में सत्ता संभाल रही महायुति बीजेपी, शिंदे गुट की शिवसेना और अजित पवार की एनसीपी बीएमसी चुनाव में पूरी तरह एक सुर में नजर नहीं आ रही। बीजेपी और शिंदे शिवसेना के बीच सीटों का बंटवारा तय है, लेकिन अजित पवार की एनसीपी ने कई जगह अलग राह पकड़ ली है। इसका सीधा मतलब है वोटों का बंटवारा, जिसका फायदा विरोधियों को मिल सकता है।
हालांकि, बीजेपी और शिंदे गुट का तालमेल मजबूत दिखता है। संयुक्त रैलियां और साझा घोषणापत्र इसका संकेत हैं। लेकिन अगर महायुति 150 से ज्यादा सीटें नहीं जीत पाती, तो यह साफ हो जाएगा कि अंदरूनी खींचतान ने गठबंधन को नुकसान पहुंचाया है। वहीं, अगर बीजेपी अकेले बेहतर प्रदर्शन करती है, तो भविष्य में राज्य की राजनीति एक बार फिर एकल दल की ओर झुक सकती है।
क्या महा विकास अघाड़ी का खेल खत्म?
बीएमसी चुनाव महा विकास अघाड़ी के लिए किसी अग्निपरीक्षा से कम नहीं हैं। कांग्रेस, शिवसेना (यूबीटी) और एनसीपी (शरद पवार) अब एक साथ मैदान में नहीं हैं। कांग्रेस ने वंचित बहुजन अघाड़ी के साथ गठबंधन किया है, जबकि उद्धव ठाकरे ने राज ठाकरे के साथ हाथ मिलाया है। एनसीपी के दोनों गुट अलग-अलग रणनीति अपना रहे हैं।
2019 में जिस गठबंधन ने सरकार बनाई थी, वह अब बिखरता नजर आ रहा है। अगर इस चुनाव में एमवीए के घटक दल कमजोर साबित होते हैं, तो यह माना जाएगा कि इस गठबंधन का अध्याय लगभग खत्म हो चुका है। हालांकि, कांग्रेस-वंचित गठबंधन अगर ठीक-ठाक प्रदर्शन करता है, तो यह विपक्षी राजनीति के लिए नई दिशा भी दिखा सकता है।
ठाकरे बंधुओं का साथ: मजबूरी या भविष्य की रणनीति?
उद्धव और राज ठाकरे का साथ आना राजनीतिक रूप से बड़ा घटनाक्रम है, लेकिन सवाल यह है कि यह साथ कितना टिकाऊ है। उद्धव की छवि अपेक्षाकृत संतुलित रही है, जबकि राज ठाकरे के बयान अक्सर आक्रामक और विवादित रहे हैं। हिंदी, गुजराती या दक्षिण भारतीयों को लेकर की गई टिप्पणियां कई वोटरों को नाराज भी कर सकती हैं।
दोनों नेताओं ने कहा है कि यह साथ लंबे समय के लिए है, लेकिन राजनीतिक इतिहास बताता है कि चुनावी मजबूरी से बने रिश्ते अक्सर नतीजों के बाद बदल भी जाते हैं। जीत हो या हार, यह देखना दिलचस्प होगा कि ठाकरे बंधुओं की यह जोड़ी कितने दिन साथ रहती है।
बाहरी बनाम स्थानीय की बहस
इस चुनाव में ‘बाहरी’ शब्द भी खूब उछाला जा रहा है। अडानी-अंबानी, गुजराती और तमिल समुदाय को लेकर बयानबाजी ने माहौल और गरमा दिया है। ठाकरे गुट का आरोप है कि बड़े कॉर्पोरेट हितों के लिए मुंबई को गिरवी रखा जा रहा है। वहीं, महायुति सभी समुदायों को साथ लेकर चलने की बात कर रही है।
मुंबई जैसी बहुभाषी और बहुसांस्कृतिक शहर में यह मुद्दा दोधारी तलवार साबित हो सकता है। मराठी वोटर एकजुट हो सकते हैं, लेकिन गैर-मराठी समुदायों का विरोध भी उतना ही मजबूत हो सकता है।
कुल मिलाकर, बीएमसी चुनाव सिर्फ नगर निगम का चुनाव नहीं है। यह महाराष्ट्र की आने वाली राजनीति की दिशा तय करने वाला मुकाबला बन चुका है। गठबंधनों की मजबूती, अस्मिता की राजनीति और विकास के मुद्दों के बीच वोटर किसे चुनता है, यही तय करेगा कि मुंबई और महाराष्ट्र की राजनीति आगे किस रास्ते पर जाएगी।




























