Chhawla Rape Case: छावला गैंगरेप और मर्डर केस एक बार फिर देश की बहस के केंद्र में है। साल 2026 आ चुका है, लेकिन इस जघन्य अपराध की पीड़िता को आज भी इंसाफ का इंतज़ार है। जिस केस ने कभी पूरे देश को झकझोर दिया था, वह आज फिर से चर्चा में है, वजह बनी हैं एंटी रेप एक्टिविस्ट योगिता भयाना। योगिता ने हाल ही में सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर एक वीडियो साझा करते हुए इस केस में दोबारा जांच यानी री-इन्क्वायरी की मांग की है। उन्होंने साफ कहा है कि वह पीड़िता के लिए इंसाफ की लड़ाई एक बार फिर लड़ेंगी और इस मामले को यूं ही दबने नहीं देंगी।
क्या है छावला रेप केस? (Chhawla Rape Case)
यह मामला साल 2012 का है, जब दिल्ली के छावला इलाके में रहने वाली 19 साल की एक लड़की, जिसे अदालतों में ‘अनामिका’ नाम दिया गया, के साथ गैंगरेप और फिर बेरहमी से हत्या कर दी गई थी। अनामिका मूल रूप से उत्तराखंड के पौड़ी जिले की रहने वाली थीं और दिल्ली में काम के सिलसिले में रह रही थीं।
9 फरवरी 2012 की शाम वह अपनी नौकरी से लौट रही थीं, तभी तीन लोगों ने उनका अपहरण कर लिया। पुलिस जांच में राहुल, रवि और विनोद नाम के तीन युवकों को आरोपी बनाया गया। पूछताछ के बाद 14 फरवरी 2012 को हरियाणा के रेवाड़ी जिले के एक खेत से अनामिका का शव बरामद किया गया। पुलिस के मुताबिक, शव की हालत बेहद खराब थी।
जांच में सामने आईं रोंगटे खड़े कर देने वाली बातें
पुलिस के अनुसार, अनामिका के साथ गैंगरेप किया गया था और फिर उनकी बेहद क्रूर तरीके से हत्या की गई। आरोप था कि उनके शरीर को सिगरेट और गर्म लोहे से दागा गया, चेहरे और आंखों में तेजाब डाला गया। यह विवरण सामने आने के बाद पूरे देश में गुस्सा और आक्रोश देखने को मिला था। यह वही दौर था जब निर्भया कांड ने भी देश को हिला कर रख दिया था।
निचली अदालत और हाईकोर्ट का फैसला
करीब दो साल की सुनवाई के बाद, साल 2014 में निचली अदालत ने तीनों आरोपियों को दोषी ठहराते हुए फांसी की सजा सुनाई। अदालत ने इसे ‘रेयरेस्ट ऑफ रेयर’ मामला माना। इसके बाद दिल्ली हाईकोर्ट ने भी निचली अदालत के फैसले को बरकरार रखा। उस वक्त ऐसा लगा कि पीड़िता और उसके परिवार को आखिरकार इंसाफ मिल गया है।
सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला और चौंकाने वाला मोड़
हालांकि, कहानी यहीं खत्म नहीं हुई। आरोपियों ने हाईकोर्ट के फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी। लंबी सुनवाई के बाद 7 नवंबर 2022 को सुप्रीम कोर्ट ने तीनों आरोपियों को बरी कर दिया। यह फैसला आते ही हर तरफ हैरानी और नाराजगी देखने को मिली।
सुप्रीम कोर्ट की तीन जजों की बेंच जस्टिस यूयू ललित, जस्टिस रविंद्र भट्ट और जस्टिस बेला त्रिवेदी ने इस मामले की सुनवाई की थी। 6 फरवरी 2022 को फैसला सुरक्षित रखा गया और नवंबर में इसे सुनाया गया।
सुप्रीम कोर्ट ने क्यों किया बरी?
सुप्रीम कोर्ट ने अपने 40 पन्नों के फैसले में कहा कि अभियोजन पक्ष आरोपियों के खिलाफ आरोप साबित करने में नाकाम रहा। अदालत ने जांच और ट्रायल में कई गंभीर खामियों की ओर इशारा किया। कोर्ट ने कहा कि पुलिस ने आरोपियों के डीएनए सैंपल तो लिए, लेकिन उन्हें बिना किसी सुरक्षा के 11 दिनों तक पुलिस मालखाने में रखा गया। यह एक बड़ी लापरवाही मानी गई। इसके अलावा, 49 गवाहों में से 10 का क्रॉस एग्जामिनेशन तक नहीं कराया गया।
सुप्रीम कोर्ट ने यह भी कहा कि निचली अदालत और हाईकोर्ट ने डीएनए रिपोर्ट की तकनीकी विश्वसनीयता की ठीक से जांच नहीं की। कोर्ट के मुताबिक, आरोपियों को निष्पक्ष ट्रायल का अधिकार नहीं मिला, जो कानून के तहत उनका मूल अधिकार है।
अदालत ने माना कि अपराध बेहद घिनौना था, लेकिन सबूतों की कमी के चलते आरोपियों को सजा देना कानूनन संभव नहीं था। कोर्ट ने साफ कहा कि सिर्फ शक और नैतिक आधार पर किसी को दोषी नहीं ठहराया जा सकता।
परिवार का दर्द और गुस्सा
फैसले के बाद अनामिका के परिवार पर मानो दुखों का पहाड़ टूट पड़ा। उनके पिता ने कहा कि उन्होंने कभी सोचा भी नहीं था कि सुप्रीम कोर्ट से ऐसा फैसला आएगा। उन्होंने कहा, “सुप्रीम कोर्ट तो न्याय देने के लिए है। कलयुग आ गया है, लेकिन इतना भी नहीं होना चाहिए। अब न्याय के लिए कहां जाएं?”
परिवार का मानना है कि इस फैसले से अपराधियों के हौसले बुलंद होंगे और समाज में गलत संदेश जाएगा।
वकील और सामाजिक कार्यकर्ताओं की प्रतिक्रिया
पीड़िता की वकील चारु खन्ना ने सुप्रीम कोर्ट के फैसले को बेहद निराशाजनक बताया। उनका कहना है कि इतने गंभीर अपराध में इस तरह का फैसला अपराधियों का मनोबल बढ़ा सकता है। उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि फैसले में बहुत कम समय लिया गया और बिना ठोस आधार के निचली अदालत और हाईकोर्ट के फैसलों को पलट दिया गया।
सामाजिक कार्यकर्ता और एंटी रेप एक्टिविस्ट योगिता भयाना ने कहा कि 11 साल बाद भी परिवार को इंसाफ नहीं मिला। उन्होंने बताया कि फैसले के बाद पूरा परिवार टूट चुका है और सबसे बड़ी चिंता उनकी सुरक्षा को लेकर है, क्योंकि आरोपी उसी इलाके में रहते हैं। योगिता ने कहा कि वह दिल्ली पुलिस से परिवार की सुरक्षा की मांग करेंगी।
निर्भया केस से तुलना पर अलग-अलग राय
कई लोग इस केस की तुलना निर्भया कांड से करते हैं, लेकिन एमिकस क्यूरी रहीं वरिष्ठ वकील सोनिया माथुर इससे सहमत नहीं हैं। उनका कहना है कि निर्भया केस में एक जख्मी चश्मदीद गवाह था, जबकि अनामिका केस पूरी तरह परिस्थितिजन्य साक्ष्यों पर आधारित था। उन्होंने कहा कि इस मामले में अलग-अलग एजेंसियों और गवाहों के बयान भी एक जैसे नहीं थे।
न्याय बनाम कानून की बहस
दिल्ली हाईकोर्ट के पूर्व जज जस्टिस आरएस सोढ़ी ने कहा कि यह फैसला कानून के आधार पर हुआ है, न कि भावनाओं के आधार पर। वहीं पटना हाईकोर्ट की पूर्व जज जस्टिस अंजना प्रकाश का कहना है कि ऊपरी अदालतों में फांसी की सजा का पलटना कोई नई बात नहीं है। उन्होंने कहा कि कई बार पुलिस गलत व्यक्ति को आरोपी बना देती है और अदालत का काम है सच को देखना।
अब फिर उठी इंसाफ की उम्मीद
अब, साल 2026 में योगिता भयाना की री-इन्क्वायरी की मांग ने इस केस को फिर से जिंदा कर दिया है। सवाल वही है क्या अनामिका को कभी इंसाफ मिलेगा? क्या जांच में हुई खामियों की भरपाई संभव है? और क्या सिस्टम इस बार पीड़िता की आवाज सुनेगा?




























