Sikhism in Kashmir: आज के समय में कश्मीर की सबसे ज्यादा चर्चा कश्मीरी पंडितो के विस्थापन और वहां इस्लामिक कट्टरपंथियों के शासन पर होती है, लेकिन कश्मीरी पंडितो के विस्थापन के साथ साथ वहां रहने वाले उस एक वर्ग को लगभग भुला दिया गया, जिनका इतिहास करीब 600 साल पुराना था, जी हां, हम बात कर रहे है सिखों की… कश्मीरी पंडितो के साथ साथ सिखों ने भी अपना घर छोड़ा था, आज भी कश्मीर में सिखों को लेकर कोई खास चर्चा नहीं की जाती है, लेकिन सच तो ये है कि कश्मीर सिखों के लिए बेहद महत्वपूर्ण रहा है।
उसका इतिहात शेर ए पंजाब महाराजा रणजीत सिंह जी से जुड़ा है। धरती का स्वर्ग कहलाने वाले कशमीर पर किसकी नजर लगी..जिसने इस स्वर्ग को मासूमो के रक्त से रंजित कर दिया था अपने इस वीडिय़ो में हम कश्मीर में मौजूद सिक्खिज्म की कहानी को जानेंगे कि कैसे कभी यहां एक महत्वपूर्ण धार्मिक संगठन के रूप में स्थापित होने वाला सिख धर्म आज बेहद कम संख्या में रह गए है। क्या है कश्मीर के सिखों की कहानी..उनके फलने फूलने और फिर पतन की कहानी… और आज किस स्थिति में है कश्मीर में रहने वाले सिख।
कश्मीर के बारे में जानकारी
कश्मीर अकेले एक राज्य नहीं है, उसी का हिस्सा है जम्मू। कश्मीर जहां इस्लामिक बहुल है तो वहीं जम्मू में सभी धर्म के लोग रहते है। कश्मीर भारत के सबसे उत्तरी क्षेत्र में स्थित है, जो कि हिमालय पर्वतमालाओं का एक हिस्सा है। 19वी सदी के शुरुआत में कश्मीर घाटी मात्र ग्रेट हिमालय और पीर पंजाल रेंज के बीच का हिस्सा था, जो कि वक्त के साथ भारत-प्रशासित जम्मू और कश्मीर और लद्दाख के इलाके, पाकिस्तान-प्रशासित आज़ाद कश्मीर और गिलगित-बाल्टिस्तान के इलाके, और चीन-प्रशासित अक्साई चिन और ट्रांस-काराकोरम ट्रैक्ट के इलाके भी इसमें शामिल हो गया।
यानि की आज का कश्मीर बहुत बड़े भाग में फैला है। कश्मीर को आधिकारिक राज्य का दर्जा 14 मई 1954 को दिया गया था। कश्मीर का कुल क्षेत्रफल 222,236 वर्ग किलोमीटर है, जिसमें 106,500 वर्ग किलोमीटर पर भारत का शासन है, और 78,000 sq km पर पाकिस्तान का और 37,000 sq kmअक्साई चीन के पास है। वहीं केवल कश्मीर की आबादी की बात करें तो 2025 में 80 लाख के आसपास इसकी आबादी है। जिसमें 97 प्रतिशत आबादी मुसलमानों की है, जबकि उसी से सटे जम्मू में हिंदू बहुल है। 1990 में कश्मीरी पंडितो और सिखों के नरसंहार के बाद से यहां इस्लामिक आबादी तेजी से बढ़ी, और साथ ही बढ़ा आतंकवाद। पाकिस्तान से सटे होने का नुकसान कश्मीर को बहुत ज्यादा उठाना पड़ा..और ये आज भी कट्टरपंथियों से अछूता नहीं है।
कश्मीर में सिख धर्म शुरुआत
कश्मीर और सिखों का रिश्ता तो प्रथम गुरु गुरु नानक देव जी के यहां आने से ही जुड़ गया था। 1518 में गुरु नानक देव जी की पहली उदासी के दौरान गुरु साहिब ने कश्मीर की यात्रा की थी, गुरु साहिब से प्रभावित होकर वहां रहने वाले कश्मीरी पंडितो ने सिख धर्म अपनाया था। धीरे धीरे वहां सिखो की आबादी बढ़ती गई, हालांकि कश्मीर में रहने वाले सिख पहाड़ी पंजाबी बोलते है जो कि पंजाब की पंजाबी से अलग ही होता है। कश्मीरी पंडितो की कहानी सिखों के नौवें गुरु गुरु तेग बहादुर जी से भी जुड़ी है, जिन्होंने धर्मांतरण के खिलाफ गुरु साहिब से मदद की गुहार लगाई था, क्योंकि उस वक्त औरंगजेब लगातार उन्हें इस्लाम अपनाने के लिए प्रताड़ित करता था, ऐसे में जब गुरु तेग बहादुर ने आवाज उठाई तो औरंगजेब ने उनकी सिर धड़ से अलग करवा दिया था, लेकिन इससे कश्मीरी पंडितो के दिल में सिख धर्म के प्रति आस्था और ज्यादा बढ़ गई।
सिख साम्राज्य ने कश्मीर घाटी पर अपना शासन
वहीं 1819 में, शेर ए पंजाब महाराजा रणजीत सिंह के नेतृत्व में सिख साम्राज्य ने कश्मीर घाटी पर अपना शासन शुरु किया, जहां खालसा सेना का दबदबा बढ़ा और 1846 तक कश्मीर में सिखों का ही शासन था। हालांकि महाराजा की मौत के बाद 1846 एंग्लो-सिख युद्ध में सिख हार गए.. अमृतसर की संधि के तहत अंग्रेजों ने इस क्षेत्र को खरीद लिया..और जम्मू के राजा गुलाब सिंह जम्मू और कश्मीर के नए शासक बन गए। उनके वंशजों का शासन 1947 में भारत के विभाजन तक चला था। तब भी कश्मीर में सिखों की संख्या अच्छी खासी थी। कश्मीर में रहने वाले सिख अमूमन डोगरी, पंजाबी और पूंछी जैसे कई स्थानीय पहाड़ी बोलियाँ बोलते है, जो पंजाब की पंजाबी से अलग है। 1947 के बंटवारे के बाद भी सिखों ने कश्मीर में रहना चुना था लेकिन 1990 में जब कश्मीरी पंडितो का विस्थापन हुआ तब सिखों को भी बड़ा धक्का लगा था, हालांकि फिर भी कुछ सिखों ने कश्मीर में रहना चुना, और कुछ पंजाब और जम्मू की तरफ आ गए।
मौजूदा समय में कश्मीर में बड़ी संख्या में सिख
मौजूदा समय में मुज़फ़्फ़राबाद, मीरपुर, बारामूला, पुंछ, रावलकोट और कोटली में बड़ी संख्या में रहने वाले सिख रहते है जो कि असल में कभी ब्राह्मण हुआ करते थे, और आकड़ो के अनुसार छठे गुरु के समय या राजा सुख जीवन मल के शासनकाल में सिख धर्म अपनाया था। हालांकि ये सिख बाली, इस्सर, दत्ता, सासन, रैना, रीन, सूदन और अन्य ब्राह्मण सरनेम इस्तेमाल करते है लेकिन धर्म ये लोग सिख ही मानते है। हरि सिंह नलवा, भीम सिंह और शेर सिंह जम्मू कश्मीर के ही मजबूत संपन्न सिखों में शामिल थे। 2011 के आकड़ो की बात करे तो जम्मू कश्मीर सिखों की आबादी तब 235000 के आसपास थी, जिसमें से करीब 56000 सिख कश्मीर में रह गए है, और बाकि जम्मू में रहते है।
हालांकि इस्लामिक कट्टरपंथियों के बढ़ने से सिख धर्म और उसकी धरोहरों को नुकसान तो हुआ है लेकिन फिर भी घाटी में सिख गुरुद्वारे मौजूद है। जिसमें छठे गुरु को समर्पित गुरूद्वारा हर गोबिंद साहिब, गुरुद्वारा छठी पातशाही, गुरुद्वारा तपो अस्थान, गुरु द्वारा सिंह सभा, गुरुद्वारा छेविन पातशाही जैसे की प्रमुख गुरुद्वारे है, जो न केवल कश्मीर में सिखों की साहस की कहानी कह रहे है, बल्कि वो इस इतिहास के रूप में भी खड़े है जो कश्मीर में सिखों के शासन का आधार बना था।






























