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Modi government failures: खाते में 15 लाख, बुलेट ट्रेन और अच्छे दिन… अधूरे वादों का लंबा हिसाब! मोदी सरकार के दावों और हकीकत के बीच फंसा देश

Nandani | Nedrick News

Published: 09 Jan 2026, 04:49 PM | Updated: 09 Jan 2026, 04:49 PM

Modi government failures:आज से ठीक 11 साल पहले, 2014 में नरेंद्र मोदी ने देश के प्रधानमंत्री के तौर पर पहली बार शपथ ली थी। तब देश में एक बड़ा बदलाव देखने की उम्मीद जगी थी। “अच्छे दिन”, “भ्रष्टाचार मुक्त भारत”, “महंगाई से राहत”, “रोज़गार की भरमार” और “विश्वगुरु भारत” जैसे नारों ने जनता को आकर्षित किया। इन 11 वर्षों में मोदी सरकार ने कई बड़े फैसले लिए, कई योजनाएं शुरू कीं और कुछ क्षेत्रों में काम भी हुआ, लेकिन उतनी ही सच्चाई यह भी है कि कई बड़े वादे आज भी अधूरे हैं या ज़मीन पर वह असर नहीं दिखा पाए, जैसा प्रचार में बताया गया।

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भ्रष्टाचार मुक्त सरकार का वादा, लेकिन सवाल बरकरार (Modi government failures)

बीजेपी ने 2014 के चुनाव में सबसे बड़ा वादा किया था कि भ्रष्टाचार के खिलाफ निर्णायक लड़ाई। कांग्रेस शासन के घोटालों को मुद्दा बनाकर सत्ता में आई बीजेपी से लोगों को उम्मीद थी कि सिस्टम बदलेगा। हालांकि 11 साल बीतने के बाद भी भ्रष्टाचार को जड़ से खत्म करने के लिए कोई ऐसा ठोस और व्यापक कानून सामने नहीं आया, जिसे गेमचेंजर कहा जा सके। विपक्ष का आरोप है कि सत्ता में आने के बाद एजेंसियों का इस्तेमाल राजनीतिक विरोधियों के खिलाफ ज्यादा हुआ, जबकि व्यवस्था में पारदर्शिता लाने वाले सुधार पीछे रह गए।

काला धन: वादा बड़ा, नतीजा छोटा

2014 में बीजेपी नेताओं ने दावा किया था कि विदेशों में जमा काला धन 150 दिनों के भीतर भारत लाया जाएगा। यहां तक कहा गया कि यह पैसा देश की कल्याणकारी योजनाओं में लगेगा। खुद नरेंद्र मोदी ने चुनावी मंच से काले धन पर सख्त बातें कही थीं। लेकिन 11 साल बाद हालात यह हैं कि बीजेपी के ही सांसद निशिकांत दुबे सार्वजनिक रूप से कह चुके हैं कि विदेशों से काला धन लाना संभव नहीं है।
हालांकि विशेष जांच दल (SIT) बना, रिपोर्ट भी आई, लेकिन काले धन की वापसी को लेकर कोई समयबद्ध और ठोस योजना आज तक सामने नहीं आ सकी।

15 लाख का वादा और जनता का इंतजार

लोकसभा चुनाव 2014 के दौरान नरेंद्र मोदी ने एक रैली में कहा था कि अगर विदेशों में जमा काला धन वापस आ जाए, तो देश के हर गरीब के खाते में 15–20 लाख रुपये तक आ सकते हैं। यह बयान आज भी बीजेपी के लिए सबसे असहज सवालों में से एक है। 11 साल बीत गए, लेकिन जनता के खातों में वह रकम नहीं आई। बीजेपी इसे जुमला बताती है, लेकिन विपक्ष का कहना है कि यह सिर्फ चुनावी सपना दिखाने की राजनीति थी।

महंगाई: मुद्दा वही, सरकार बदली

यूपीए सरकार के समय महंगाई को लेकर सड़क से संसद तक हंगामा करने वाली बीजेपी सत्ता में आने के बाद इस मोर्चे पर बड़ी राहत नहीं दे सकी। खाने-पीने की चीजें, सब्जियां, दालें और गैस सिलेंडर आज भी आम आदमी की जेब पर भारी हैं। कुछ समय खाद्य मुद्रास्फीति में सुधार जरूर दिखा, लेकिन ज़मीनी हकीकत यह है कि रसोई का बजट अब भी आम परिवार के लिए चुनौती बना हुआ है।

घुसपैठ का वादा, समाधान अधूरा

नरेंद्र मोदी ने चुनाव से पहले अवैध घुसपैठ, खासकर बांग्लादेश से आने वाले घुसपैठियों को लेकर सख्त रुख दिखाया था। कहा गया था कि इस समस्या का स्थायी समाधान निकाला जाएगा। लेकिन एक दशक से ज्यादा समय बीतने के बाद भी इस मुद्दे पर कोई ठोस और द्विपक्षीय समाधान सामने नहीं आ सका। यह मुद्दा आज भी राजनीतिक भाषणों में ज़्यादा दिखता है, नीति में कम।

पांच ट्रिलियन डॉलर इकॉनमी का सपना

सितंबर 2018 में पीएम मोदी ने ऐलान किया था कि भारत 2022 तक पांच ट्रिलियन डॉलर की अर्थव्यवस्था बन जाएगा। यह दावा चुनावी मंचों और सरकारी कार्यक्रमों में बार-बार दोहराया गया। लेकिन अब 2025 खत्म हो चुका है और भारत की अर्थव्यवस्था करीब 4.18 ट्रिलियन डॉलर पर ही अटकी हुई है। लक्ष्य बड़ा था, लेकिन समय पर पूरा नहीं हो सका।

बुलेट ट्रेन: सपना तेज़, रफ्तार धीमी

2017 में जापान के प्रधानमंत्री शिंजो आबे के साथ पीएम मोदी ने मुंबई-अहमदाबाद बुलेट ट्रेन प्रोजेक्ट की आधारशिला रखी थी। कहा गया था कि 15 अगस्त 2022 तक देश की पहली बुलेट ट्रेन दौड़ने लगेगी। लेकिन 2025 तक भी यह सपना पूरा नहीं हुआ। अब रेल मंत्री अश्विनी वैष्णव कह रहे हैं कि बुलेट ट्रेन 15 अगस्त 2027 से चलेगी। सवाल यह है कि जो वादा 2022 का था, वह 2027 तक क्यों खिसक गया?

बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ: नीयत अच्छी, क्रियान्वयन कमजोर?

‘बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ’ योजना 2015 में बड़े मकसद के साथ शुरू की गई थी…लैंगिक भेदभाव खत्म करना और लड़कियों को सशक्त बनाना। आंकड़ों में कुछ सकारात्मक बदलाव जरूर दिखते हैं। लड़कियों का स्कूलों में नामांकन बढ़ा और ड्रॉपआउट दर घटी।
लेकिन आलोचना यह है कि योजना के बजट का बड़ा हिस्सा जागरूकता और प्रचार पर खर्च हुआ। 2017-18 में कुल बजट का करीब 84 फीसदी विज्ञापनों पर चला गया। इससे सवाल उठते हैं कि क्या जमीनी सुधार से ज्यादा फोकस प्रचार पर रहा?

स्किल इंडिया: लक्ष्य बड़ा, नतीजे फीके

प्रधानमंत्री कौशल भारत योजना का लक्ष्य था 2022 तक 40 करोड़ युवाओं को प्रशिक्षित करना। यह मोदी सरकार का ड्रीम प्रोजेक्ट बताया गया। लेकिन तय समय तक यह लक्ष्य हासिल नहीं हो सका। बेरोजगारी आज भी देश की बड़ी समस्याओं में शामिल है और स्किल इंडिया उस उम्मीद पर खरी नहीं उतर सकी, जो युवाओं को दिखाई गई थी।

स्मार्ट सिटी मिशन: कागजों में स्मार्ट?

2014 में शुरू हुआ स्मार्ट सिटी मिशन 100 शहरों को आधुनिक बनाने का सपना लेकर आया था। 9 साल से ज्यादा समय बीतने के बाद भी कई शहरों में यह योजना अधूरी पड़ी है। आलोचकों का कहना है कि स्मार्ट सिटी का विचार ज्यादा प्रचार में रहा, ज़मीन पर कम।

नमामि गंगे: पैसा खर्च, गंगा अब भी मैली

गंगा को साफ करने के लिए ‘नमामि गंगे’ योजना 2014 में शुरू की गई थी। शुरुआती पांच साल में 20 हजार करोड़ रुपये खर्च करने का लक्ष्य रखा गया। पैसे खर्च हुए, योजनाएं बनीं, दिल्ली में बीजेपी की सरकार बनी, लेकिन गंगा की हालत आज भी गंभीर है। कई जगहों पर प्रदूषण जस का तस है।

11 साल बाद सबसे बड़ा सवाल

मोदी सरकार ने इन 11 वर्षों में मजबूत नेतृत्व और बड़े फैसलों की छवि जरूर बनाई, लेकिन वादों और हकीकत के बीच का फासला भी उतना ही बड़ा है। सवाल यही है कि क्या देश को सिर्फ नारों और सपनों से चलाया जा सकता है, या अब अधूरे वादों का जवाब देने का वक्त आ गया है? जनता ने भरोसा किया था, उम्मीद की थी। अब 11 साल बाद वही जनता हिसाब मांग रही है वादों का, योजनाओं का और उन सपनों का, जो अब तक पूरे नहीं हो सके।

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