Mini Punjab in Jaipur: सिख धर्म की स्थापना और उसके फलने फूलने की कहानी तो आपने न जाने कितनी बार सुनी होगी, लेकिन क्या हो जब हम आपको ये कहे कि भारत की एक खूबरसूरत नगरी है, जो अस्तित्व में आने के साथ ही सिखों के लिए काफी महत्वपूर्ण हो गई। जहां के राजा ने स्वयं सिखों को वहां ले जाकर न केवल बसाया बल्कि उनके लिए उनका साधना स्थल गुरुद्वारे को भी बनवाने में मदद की। जी हां, हम बात कर रहे पिंक सिटी जय पुर की। जब भी आप जयपुर का नाम सुनते है तो सबसे पहले हमारे जेहन में क्या आता है। बिल्कुल खूबसूरत गुलाबी नगरी, पारंपरिक परिधान में सजे लोग, बड़े बड़े महल और उन महलों में साहस की कहानी कहती दीवारें।
जयपुर की हवाओं में ही भारतीय संस्कृति और रंगबिरंगे अनूठी परंपरा का समागम नजर आता है। जिसमें यहां मौजूद सिखों की मौजूदगी भी जयपुर को और ज्यादा खास बनाती है। जयपुर में सिखो का एक छोटा सा समूह है लेकिन काफी प्रभावशाली समूह है, जो यहां के स्थानीय और सामूहिक विकास में भी अहम योगदान दे रहे है। अपने इस वीडियो में हम जयपुर में मौजूद सिख धर्म और उनके बसाए गए मिनी पंजाब के बारे में जानेंगे।
जयपुर के बारे में जानकारी
जयपुर भारत के सबसे बड़े राज्य राजस्थान की राजधानी है, जिसे गुलाबी नगरी के नाम से पूरी दुनिया में जाना जाता है। जयपुर को असल में आमेर के राजा सवाई जयसिंह ने 18 नवंबर 1727 को बसाया था, और वो खुद भी जयपुर आकर रहने लगे थे। जयपुर की ऐतिहासिक खूबसूरती के कारण जुलाई 2019 में जयपुर को वर्ल्ड हेरिटेज सिटी का दर्जा दिया गया है। वहीं बात करें जयपुर का क्षेत्रफल की तो 484.64 वर्ग किलोमीटर फैला है। वहीं 2024 के आंकड़ों के अनुसार इसकी आबाजी करीब 4 करोड़ 309,000 के आसपास है। जयपुर राजपुताना इतिहास की कहानी को अपने में समेटे हुए है।
जयपुर में सिख धर्म शुरुआत कब हुई?
जयपुर में सिख धर्म के बसने के इतिहास की बात करें तो जब राजा मानसिंह ने जयपुर को बसाया तो उन्होंने आमेर में रह रहे सिख जिन्हें वो अफगानियों से युद्ध के बाद लाहौर से लेकर आए थे, उन्हें भी जयपुर में बसने का मौका दिया था। 16वीं सदी में जयपुर में सिख समुदाय आकर बसने लगे थे। इस दौरान सिखो को बसाने के लिए जयपुर के आमेर रोड पर एक गुरुद्वारा बसाया गया, जिसे हिदा की मोरी। कहां जाता है ये गुरुद्वारा जयपुर का पहला गुरुद्वारा है, इसके आसपास अब काफी व्यस्त बाजार है लेकिन आज भी यहां आने वाले लोग एक अलग ही शांति को महसूस कर सकते है। जयपुर में सिखों के लिए आध्यात्मिक केंद्र और सामुदायिक केंद्र के रूप में ये गुरुद्वारे लगातार काम कर रहे है। इसके आसपास प्रसिद्ध हवामहल, आमेर किला भी मौजूद है।
राजा ने सिखो के लिए गुरुद्वारा बनवाया
इस गुरुद्वारे को लेकर कहा जाता है कि सिख समुदाय इस जगह पर मौजूद कुएं से पानी लेने आते थे जिससे वो लंगर का प्रसाद तैयार करते थे। और इसी स्थान पर राजा ने सिखो के लिए गुरुद्वारा बनवाया था, जो प्रतीक था कि उनकी नजरों में ही सिखो के लिए कितना सम्मान था। आज के समय में भी इसी गुरुद्वारे के आसपास सिखो की आबादी बसी हुई है। सिख अपनी धार्मिक संस्कृति को बनाये रखने और अपनी तीज त्योंहारों को बड़े धूम धाम से मनाने के लिए फेमस है। सभी गुरुद्वारो में सिखों की सबसे मजबूत परंपरा लंगर को बिना रूके फॉलो किया जाता है।
जयपुर में आज के समय 10 से भी ज्यादा गुरुद्वारे मौजूद
परोपकार और मानव सेवा की भावना के कारण जयपुर के सिख यहां की बाकि के समुदाय में अपनी अलग पहचान बनाने में कामयाब हो गये है। 2011 की जनगणना के अनुसार जयपुर में तब 17,787 सिखो की संख्या थी। जो वक्त के साथ बढ़ी ही है। वहीं यहां अब 10 से भी ज्यादा गुरुद्वारे मौजूद है, जिसमें गुरूद्वारा श्रीगुरु सिंह सभा, गुरुद्वारा श्री गुरु नानक सत्संग सभा, गुरुद्वारा श्री गुरुनानक दरबार, गुरुद्वारा दमदमा साहिब कलगीधर, जैसे प्रमुख गुरुद्वारे शामिल है। जो सिखो की प्रमुख उपस्थिति को दर्शाते है। जयपुर का सम्बन्ध तो सिखो से तब से है जब खुद जयपुर अस्तित्व में आया था। इसलिए यहां रहने वाले सिखो के लिए जयपुर बेहद खास है, जो उन्हें उनके जमीन से जोड़े रखता है। सिख समुदाय लगातार इन गुरुद्वारों और संस्थानों के जरिए सिखों को अपने धर्म के प्रति समर्पित होना सिखाते है।






























