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Who is IFS Sanjiv Chaturvedi: 12 ट्रांसफर, 200 केस और रामोन मैग्सेसे अवॉर्ड… IFS संजीव चतुर्वेदी की कहानी

Nandani | Nedrick News

Published: 08 Jan 2026, 09:37 AM | Updated: 08 Jan 2026, 09:38 AM

Who is IFS Sanjiv Chaturvedi: जब भी देश में ईमानदार अफसरों और भ्रष्टाचार के खिलाफ खड़ी आवाज़ों की बात होती है, तो IFS अधिकारी संजीव चतुर्वेदी का नाम जरूर सामने आता है। 2002 बैच के इंडियन फॉरेस्ट सर्विस (IFS) अधिकारी संजीव चतुर्वेदी आज सिर्फ अपने काम की वजह से नहीं, बल्कि सिस्टम से टकराती उनकी लंबी लड़ाई के कारण भी चर्चा में रहते हैं। उत्तराखंड कैडर के इस अधिकारी की कहानी आसान नहीं रही, लेकिन उन्होंने हर मोड़ पर पीछे हटने से इनकार किया।

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इंजीनियरिंग से सिविल सर्विस तक का सफर (Who is IFS Sanjiv Chaturvedi)

संजीव चतुर्वेदी का जन्म 21 दिसंबर 1974 को हुआ था। उनकी शुरुआती पढ़ाई उत्तर प्रदेश में हुई। पढ़ाई में शुरू से ही मेधावी रहे संजीव ने 1995 में मोतीलाल नेहरू नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी (MNNIT), प्रयागराज से इलेक्ट्रिकल इंजीनियरिंग में ग्रेजुएशन किया। यह संस्थान देश के टॉप इंजीनियरिंग कॉलेजों में गिना जाता है।
हालांकि, इंजीनियरिंग की डिग्री लेने के बाद भी संजीव का सपना कॉरपोरेट दुनिया तक सीमित नहीं था। वे देश की सेवा करना चाहते थे और इसी सोच ने उन्हें सिविल सर्विसेज की ओर मोड़ा।

UPSC की कठिन परीक्षा और IFS में चयन

देश की सबसे कठिन परीक्षाओं में गिनी जाने वाली UPSC सिविल सर्विसेज परीक्षा को पास करना आसान नहीं होता। संजीव ने कड़ी मेहनत के साथ यह चुनौती स्वीकार की और 2002 में IFS में चयनित हुए। यह सेवा IAS और IPS के साथ तीनों ऑल इंडिया सर्विसेज में शामिल है।
IFS में चयन के लिए नेचुरल रिसोर्सेज, फॉरेस्ट मैनेजमेंट और पर्यावरण से जुड़े विषयों की गहरी समझ जरूरी होती है। संजीव की इंजीनियरिंग बैकग्राउंड और मजबूत तैयारी ने उन्हें इस मुकाम तक पहुंचाया।

ट्रेनिंग और करियर की शुरुआत

चयन के बाद संजीव को देहरादून स्थित इंदिरा गांधी नेशनल फॉरेस्ट अकादमी में दो साल की ट्रेनिंग मिली। यहां उन्होंने फॉरेस्ट मैनेजमेंट, वाइल्डलाइफ कंजर्वेशन और प्रशासनिक कामकाज की बारीकियां सीखीं। शुरुआत में उन्हें हरियाणा कैडर मिला, जहां उन्होंने 2005 से 2012 तक सेवाएं दीं। बाद में उनका ट्रांसफर उत्तराखंड कैडर में हुआ। फिलहाल वे हल्द्वानी में चीफ कंजर्वेटर ऑफ फॉरेस्ट (रिसर्च) के पद पर तैनात हैं।

7 साल में 12 ट्रांसफर और भ्रष्टाचार के खिलाफ जंग

हरियाणा में कार्यकाल के दौरान संजीव चतुर्वेदी लगातार सुर्खियों में रहे। वजह थी भ्रष्टाचार के खिलाफ उनकी सख्त कार्रवाई। हिसार और झज्जर में पेड़ लगाने की योजनाओं में फंड के गलत इस्तेमाल और गड़बड़ियों को उन्होंने उजागर किया। इसके बाद हालात उनके लिए आसान नहीं रहे। 7 साल में उनका 12 बार ट्रांसफर किया गया। कभी पोस्टिंग से दूर रखा गया, कभी गैर-कैडर पोस्ट पर भेजा गया और चार्जशीट भी दी गई। हालांकि, केंद्र सरकार ने दो बार हस्तक्षेप कर राज्य सरकार के फैसलों को पलटा। इसके बावजूद संजीव CBI जांच की मांग पर डटे रहे।

AIIMS से रामोन मैग्सेसे अवॉर्ड तक

2012 से 2016 के बीच AIIMS में रहते हुए संजीव चतुर्वेदी ने 200 से ज्यादा भ्रष्टाचार के मामलों को उजागर किया। उनके इस साहसिक काम के लिए उन्हें 2015 में प्रतिष्ठित रामोन मैग्सेसे अवॉर्ड से सम्मानित किया गया। लेकिन ईमानदारी की इस राह में उन्हें ट्रांसफर, सस्पेंशन और कोर्ट केस जैसी मुश्किलों का सामना भी करना पड़ा।

नया विवाद और जजों का हटना

नवंबर 2023 में संजीव एक बार फिर चर्चा में आए, जब उन्होंने CAT जज मनीष गर्ग के खिलाफ आपराधिक मानहानि का केस दायर किया। आरोप था कि 16 अक्टूबर 2023 को कोर्ट में उनके साथ अभद्र भाषा का इस्तेमाल किया गया। इस केस की सुनवाई कर रहीं नैनीताल की ACJM जस्टिस नेहा कुशवाहा ने भी खुद को मामले से अलग कर लिया। उन्होंने बताया कि CAT जज डीएस महरा से उनके पारिवारिक संबंध हैं, इसलिए वे निष्पक्षता बनाए रखने के लिए केस नहीं सुनेंगी।
इसके बाद नवंबर 2024 में संजीव ने डीएस महरा के खिलाफ भी मानहानि की याचिका दायर की, क्योंकि उनकी बेंच ने संजीव को मानहानि का नोटिस भेजा था।

2013 से अब तक 14 जज क्यों हटे?

यह सिलसिला नया नहीं है। 2013 से अब तक इस मामले से 14 जज खुद को अलग कर चुके हैं। सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस रंजन गोगोई (2013) और जस्टिस यूयू ललित (2016) भी संजीव की CBI जांच वाली याचिका से दूरी बना चुके हैं।
2018 में शिमला कोर्ट के एक जज ने भी मानहानि केस से खुद को अलग किया था। 2019 में CAT चेयरमैन जस्टिस नरसिम्हन रेड्डी ने “अनचाहे घटनाक्रम” का हवाला देकर सुनवाई से हटने का फैसला लिया। हाल ही में फरवरी 2025 में CAT जज हर्विंदर कौर ओबेरॉय और बी आनंद भी बिना वजह बताए केस से हट गए।

कोर्ट का अब तक का रुख

2018 में उत्तराखंड हाई कोर्ट ने आदेश दिया था कि संजीव चतुर्वेदी के सर्विस से जुड़े मामले सिर्फ नैनीताल बेंच में ही सुने जाएं। साथ ही केंद्र सरकार पर 25 हजार रुपये का जुर्माना भी लगाया गया, जिसे सुप्रीम कोर्ट ने बरकरार रखा।
2021 में हाई कोर्ट ने इस आदेश को दोहराया, लेकिन केंद्र सरकार ने इसे सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी। यह मामला मार्च 2023 से बड़ी बेंच के पास लंबित है।

IFS संजीव चतुर्वेदी की कहानी सिर्फ एक अफसर की नहीं, बल्कि उस सिस्टम से जूझने की कहानी है, जहां ईमानदारी कई बार मुश्किलें लेकर आती है। फिर भी, वे लगातार डटे हुए हैं और यही वजह है कि उनका नाम आज भी चर्चा में बना रहता है।

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Nandani

nandani@nedricknews.com

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