Trending

Gig Workers Protest: नए साल पर गिग वर्कर्स की हड़ताल, ‘दस मिनट डिलीवरी सिस्टम बंद करो, इंसान को इंसान समझो!’

Nandani | Nedrick News

Published: 02 Jan 2026, 10:54 AM | Updated: 02 Jan 2026, 10:54 AM

Gig Workers Protest: देश के प्रमुख डिलीवरी और ई-कॉमर्स प्लेटफॉर्म से जुड़े गिग वर्कर्स संगठनों ने नए साल के मौके पर बुधवार, 31 दिसंबर को देशव्यापी हड़ताल का ऐलान किया है। इस हड़ताल में शामिल होने वालों में मोबिलिटी प्लेटफॉर्म (उबर, ओला, रैपीडो) के ऐप-आधारित टैक्सी ड्राइवर और बाइक राइडर्स, लॉजिस्टिक्स और ई-कॉमर्स प्लेटफॉर्म (डंजों, डेलीवेरी, शैडोफैक्स, अमेज़न, फ्लिपकार्ट) के डिलीवरी एजेंट, फूड डिलीवरी प्लेटफॉर्म (जोमैटो, स्विगी) के कर्मी और गिग मार्केटप्लेस प्लेटफॉर्म (अर्बन कंपनी, हाउसजॉय) से जुड़े लाखों कामगार शामिल होंगे।

और पढ़ें: Jaipur Chomu Bulldozer Action: चौमूं में फिर चला बुलडोजर, पथराव वाले इलाके में भारी पुलिस बल के बीच अतिक्रमण हटाने की कार्रवाई

गिग वर्कर संगठनों ने साफ किया कि यह विरोध प्रदर्शन ग्राहकों को परेशान करने के लिए नहीं, बल्कि उनके काम की मुश्किलों और बढ़ती असमानताओं पर ध्यान दिलाने के लिए किया जा रहा है। इन संगठनों की मांग है कि प्लेटफॉर्म कंपनियां उनके साथ बातचीत करें, उचित वेतन संरचना लागू करें, सामाजिक सुरक्षा लाभ उपलब्ध कराएं और पारदर्शी नीतियां अपनाएं।

पहले भी 25 दिसंबर को कुछ संगठनों ने काम बंद करने का ऐलान किया था। इस बार नए साल के मौके पर यह हड़ताल महाराष्ट्र, कर्नाटक, दिल्ली-एनसीआर, पश्चिम बंगाल और तमिलनाडु के कई हिस्सों में समर्थित है।

‘दस मिनट डिलीवरी सिस्टम’ पर असंतोष | Gig Workers Protest

गिग एंड प्लेटफॉर्म सर्विस वर्कर यूनियन (GIPSWU) के निर्मल गोराना ने बताया कि हड़ताल की सबसे बड़ी वजह घटती कमाई, बढ़ता काम का बोझ और बुनियादी श्रम सुरक्षा की कमी है। उन्होंने कहा, “हम चाहते हैं कि दस मिनट डिलीवरी सिस्टम खत्म किया जाए। डिलीवरी करने वाले लोग मशीन नहीं हैं। कोई भी मौसम या ट्रैफिक स्थिति में इतनी जल्दी सेवा उपलब्ध नहीं कर सकता।”

गोराना ने आगे बताया कि अगर डिलीवरी के दौरान किसी वर्कर की मौत हो जाती है, तो उन्हें मुआवजा मिलना चाहिए क्योंकि यह काम के दौरान हुआ होता है। वहीं, संगठन का कहना है कि कंपनियां गिग वर्कर्स को ‘पार्टनर’ बताकर कर्मचारियों के अधिकार नहीं देती हैं। सरकार का लेबर विभाग भी इस मुद्दे पर चुप्पी साधता है, क्योंकि यह स्पष्ट नहीं है कि गिग वर्कर्स किस श्रेणी में आते हैं।

महिला कामगारों की सुरक्षा और बदसलूकी

अर्बन क्लैप से जुड़ी सुनिता (बदला हुआ नाम) बताती हैं कि वह ब्यूटीशियन के रूप में काम करती हैं, लेकिन कई बार घरों में उन्हें नौकर जैसी नजर से देखा जाता है, शौचालय तक उपयोग नहीं करने दिया जाता और बदसलूकी की जाती है। उन्होंने कहा, “कंपनी में शिकायत करने पर कहा जाता है कि ज्यादा दिक्कत है तो काम छोड़ दो। हम कर्मचारी नहीं हैं। थोड़ी सी देरी पर पैसे काट लिए जाते हैं। फिर भी हमें काम करना पड़ता है, क्योंकि कमाएंगे नहीं तो क्या खाएंगे?”

हड़ताल का स्वरूप और असर

31 दिसंबर को जोमैटो, स्विगी, ब्लिंकिट, जेप्टो, अमेज़न और फ्लिपकार्ट के डिलीवरी पार्टनर्स ने ऐप से लॉग ऑफ करने या काम कम करने की योजना बनाई। तेलंगाना गिग एंड प्लेटफॉर्म वर्कर्स यूनियन (TGPWU) के आकाश रंजन ने बताया कि 25 दिसंबर की हड़ताल के दौरान कंपनियों ने थर्ड-पार्टी एजेंसियों और इंसेंटिव का इस्तेमाल कर इसे विफल करने की कोशिश की।

उन्होंने बताया कि डिलीवरी पार्टनर्स को ज्यादा घंटे काम करने के लिए मजबूर किया जाता है, जबकि प्रति ऑर्डर भुगतान लगातार कम होता है। इसके अलावा बीमा कवरेज की कमी, असुरक्षित काम करने की स्थिति, मनमाने जुर्माने और नौकरी की सुरक्षा की कमी भी चिंता का विषय है।

गिग वर्कर्स के साथ गलत व्यवहार

इंडियन फेडरेशन ऑफ ऐप-बेस्ड ट्रांसपोर्ट वर्कर्स (IFAT) से जुड़े अमित सिंह ने कहा कि कंपनियों द्वारा गिग वर्कर्स को पार्टनर बताकर उनकी मेहनत का शोषण किया जाता है। प्रति ऑर्डर मुश्किल से 20–25 रुपये मिलते हैं, और कई बार इसमें झिक-झिक होती है। उन्होंने मांग की कि काम के घंटे और पैसे प्रति किलोमीटर के हिसाब से तय किए जाएं, इमरजेंसी छुट्टी और मातृत्व अवकाश का लाभ मिले, फोटो अपलोड की बाध्यता हटाई जाए और महीने के अंत में बेसिक सैलरी दी जाए।

ब्लिंकिट में काम करने वाले सुमित कुमार ने कहा कि यूनियनों ने साल के व्यस्त दिनों में हड़ताल का ऐलान किया ताकि कंपनियों को एहसास हो कि उनकी सेवाएं वर्कर्स पर निर्भर हैं।

केंद्र सरकार से तत्काल कार्रवाई की मांग

गिग वर्कर्स का कहना है कि कुछ राज्यों में कानून बनाए गए हैं, लेकिन इनका पालन नहीं हो रहा। केंद्र सरकार का नया लेबर कोड गिग वर्कर्स को शामिल करता है, लेकिन उनके अधिकार स्पष्ट नहीं हैं। यूनियनों की मांग है कि सरकार प्लेटफॉर्म कंपनियों को रेगुलेट करे, उत्पीड़न रोकें और सही वेतन, सुरक्षा और सामाजिक लाभ सुनिश्चित करे।

कंपनियों का पक्ष

वहीं इस बढ़ते विवाद के बीच, जोमैटो के सीईओ दीपिंदर गोयल ने कहा कि 10 मिनट डिलीवरी सिस्टम वर्कर्स पर दबाव डालने के लिए नहीं है। ऑर्डर मिलने के बाद उसे पिक और पैक करने में औसतन 2.5 मिनट लगते हैं और डिलीवरी पार्टनर लगभग 2 किलोमीटर की दूरी तय करता है। उन्होंने कहा कि ऐप में कोई टाइमर नहीं है और लाखों लोग स्वेच्छा से इस काम को चुनते हैं।

गोयल ने स्वीकार किया कि कोई भी सिस्टम पूरी तरह परफेक्ट नहीं है, लेकिन कंपनी इसे लगातार बेहतर बनाने की दिशा में काम कर रही है।

गिग इकोनॉमी और युवा भागीदारी

बता दें, नीति आयोग की 2022 की रिपोर्ट के अनुसार, 2020 में भारत में लगभग 77 लाख गिग वर्कर्स थे, जो 2030 तक बढ़कर 2.35 करोड़ होने का अनुमान है। 16–23 साल के युवाओं की भागीदारी 2019–2022 में आठ गुना बढ़ी है। अधिकांश पढ़ाई कर रहे या नौकरी तलाश रहे युवा हैं, जो पार्ट टाइम काम के लिए गिग प्लेटफॉर्म से जुड़ते हैं।

कई युवाओं का कहना है कि उन्हें सप्ताह में छुट्टी नहीं मिलती, कमाई काफी नहीं है और प्लेटफॉर्म फीस और कटौतियों के कारण उनकी आमदनी और सुरक्षा प्रभावित होती है।

और पढ़ें: Rule Change From 1st January: 1 जनवरी 2026 से बदल जाएंगे ये 10 बड़े नियम, आपकी जेब, नौकरी और रोजमर्रा की जिंदगी पर पड़ेगा सीधा असर

Nandani

nandani@nedricknews.com

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Recent News

Trending News

Editor's Picks

Latest News

©2025- All Right Reserved. Designed and Developed by  Marketing Sheds