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राजनीति में नया नहीं है चाचा-भतीजे के बीच सियासी लड़ाई, इन बड़ी पार्टियों में भी पड़ चुकी है फूट

vickynedrick@gmail.com | Nedrick News

Published: 15 Jun 2021, 12:00 AM | Updated: 15 Jun 2021, 12:00 AM

बिहार की राजनीति में इन दिनों हलचलें काफी तेज है। पिछले चुनाव में एनडीए गठबंधन से अलग होकर चुनाव लड़ने वाली और नीतीश कुमार को टक्कर देने का दावा करने वाली लोक जनशक्ति पार्टी अब बिखरती नजर आ रही है। पार्टी के अध्यक्ष चिराग पासवान अलग थलग पड़ गए हैं। 

पार्टी के संस्थापक राम विलास पासवान के भाई पशुपति पारस ने पार्टी के बाकी नेताओं को तोड़ते हुए पार्टी पर कथित तौर पर कब्जा जमा लिया है। एलजेपी के 6 सांसदों में से 5 सांसद पशुपति पारस को अपना नेता मान चुके हैं और स्पीकर ने इस पर मुहर भी लगा दी है। पार्टी के टूटने के साथ ही चाचा-भतीजे के रिश्ते में दरार आ गई है। 

लेकिन आपको जानकर आश्चर्य होगा कि देश की सियासत में ऐसा पहली बार नहीं हुआ…इससे पहले भी कई मौकें आए जब चाचा-भतीजे के बीच राजनीतिक विरासत को लेकर जंग देखने को मिली। कई बड़ी पार्टियों में ऐसा देखने को मिल चुका है।

ठाकरे परिवार

महाराष्ट्र की सियासत में ऐसा दो दफा हो चुका है। सबसे पहले हम बात करेंगे ठाकरे परिवार की….ठाकरे परिवार की दूसरी पीढ़ी में सबसे पहले उद्धव ठाकरे और राज ठाकरे का नाम आता है। राज ठाकरे बालासाहेब ठाकरे के भाई के बेटे हैं। लेकिन जब साल 2006 में बालासाहेब ठाकरे ने अपनी विरासत और पार्टी की कमान उद्धव ठाकरे को सौंपने का फैसला किया था, तब राज ठाकरे ने नाराजगी जताई थी और उन्होंने अलग हटकर महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना के नाम से अपनी नई पार्टी बना ली थी।

शरद पवार और अजीत पवार

यहीं कलह शरद पवार की पार्टी एनसीपी में भी देखने को मिली। महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव 2019 के बाद राज्य में मचे बवाल ने प्रदेश की राजनीति का रुख मोड़ दिया था। चुनाव के बाद बीजेपी और शिवसेना अलह हो गए। 

कुछ दिनों बाद शिवसेना, कांग्रेस और एनसीपी ने मिलकर सरकार बनाने का फैसला लिया। लेकिन एक सुबह अजीत पवार ने बीजेपी के साथ मिलकर राज्य के उपमुख्यमंत्री पद की शपथ ले ली। जिसके बाद शरद पवार और अजीत पवार के बीच की तल्खी जग जाहिर हो गई।

दरअसल, लोकसभा चुनाव 2019 में अजीत पवार को हार मिली थी। उनके हार के पीछे की वजह पार्टी से तल्ख होना बताया जा रहा था। वहीं, जब अजीत पवार को ईडी का नोटिस मिला तब भी एनसीपी का कोई नेता आगे नहीं आया। 

जिसकी वजह से वह पार्टी से नाराज बताए जा रहे थे। हालांकि, बीजेपी के साथ मिलकर सरकार बनाने के कुछ ही घंटो बाद उन्होंने उप मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा दिया, तब शिवसेना, कांग्रेस और एनसीपी ने मिलकर महाराष्ट्र में सरकार बनाई।

समाजवादी पार्टी

उत्तर प्रदेश की सियासत में भी ऐसा देखने को मिल चुका है। यूपी विधानसभा चुनाव 2017 से ठीक पहले अखिलेश यादव और शिवपाल यादव के बीच कलह देखने को मिली। तत्कालीन सीएम होने के बावजूद पार्टी में अखिलेश यादव का कद अपने चाचा शिवपाल यादव से कहीं नीचे था। जिसे लेकर बवाल मचा हुआ था। तब शिवपाल ने अलग पार्टी बनाकर चुनाव लड़ा और सपा को बड़ा नुकसान पहुंचाया था। नतीजतन सपा चुनाव हार गई थी।

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