दलित कवयित्री सुकीरथरिणी: दलितों के दर्दों को मुखरता से उठाने वाली ‘एकमात्र’ दलित कवयित्री
जब भी जाति व्यवस्था जैसे चीजें मेरे सामने आती है, तो मन में बैचनी पैदा होती है. जीवन की कुछ ऐसी घटनाएँ सामने आने लगती है, जो हमारे असमानता भरे समाज में दलित होकर जीना बहुत मुश्किल होता है. कहने को समय बदल रहा है, हमारा देश चाँद पर भी पहुंच गया है. लेकिन जाति...
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